सद्चिंतन
आज का सद्चिंतन मित्रो ! तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दुःखी करते हो और कहते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दुःख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ बक दिया, तुमने मान लिया यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो। सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किंतु उसने दूसरों की राय न मानी। दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना, मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है। स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या करत...