सिस्टम नंगा है।
राजा को छोड़ कर सब देख रहे हैं कि सिस्टम नंगा है राजा को दिव्य वस्त्र पहनाए गए थे। कहा गया था कि ये कोई साधारण कपड़ा नहीं है। इसे वही देख सकता है जो मन का सच्चा हो। जो ईमानदार हो। जो पवित्र हो। बाकी सबको राजा नंगा दिखाई देगा। राजा आईने के सामने खड़ा था। उसे खुद अपना ढीला लटका हुआ शरीर दिख रहा था। उसे दिख रहा था कि उसके तन पर कुछ नहीं है। लेकिन वो ये कैसे मान लेता कि वो मन का झूठा है? उसने खुद को समझाया कि नहीं, वस्त्र हैं। दिव्य हैं। अलौकिक हैं। और फिर वो निकल पड़ा साम्राज्य घूमने। दरबारियों ने देखा। दोस्तों ने देखा। सबको दिख रहा था, राजा नंगा है। लेकिन सबने कहा, “अद्भुत। दिव्य। अलौकिक।” कुछ ने तो कहा, “महाराज आप पर तो स्वर्ग उतर आया है।” सच सबको दिख रहा था। झूठ सब बोल रहे थे। सच बोलने में खतरा था। राजा घूमता रहा। किसी में हिम्मत नहीं थी कि कह दे कि महाराज, शरीर की पूरी बायलोजी साफ दिख रही है। कोई कैसे कह देता सच? इस देश में सच से ऊपर नौकरी है, कुर्सी है, पोस्टिंग है, ट्रांसफर है, बच्चे की फीस है, बैंक बैलेंस है। फिर एक बच्चा आया। उसने राजा को देखा। हंस पड़ा। राजा चौंक...