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New normal in 5 years

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 अगले 5 साल में इंडिया में extra marital affairs भी धीरे-धीरे normal लगने लगेंगे, और शायद इसे cheating भी नहीं कहा जाएगा। इसके लिए नए fancy नाम आ जाएंगे, जैसे companionship, extensionship वगैरह। अभी यह बात आपको अजीब लग रही होगी और लगेगा कि ऐसा justify नहीं किया जा सकता, लेकिन समझो कैसे ये धीरे-धीरे होता है। Gleeden नाम की एक app आ चुकी है जो खास extra marital relationships के लिए है, और इंडिया में इसके लगभग 40 लाख downloads हो चुके हैं। Bangalore इसमें सबसे आगे है, और The Economic Times जैसी बड़ी news भी इस पर लिख रही है। सोचने वाली बात है। आज के time में अगर कोई cheat करता है तो वो छुपकर करता है, कोई openly नहीं बताता। लेकिन जब इस चीज़ को market बनाया जाने लगे, उसमें पैसा लगाया जाए, और उसे justify किया जाए, तो धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलने लगती है। जैसे 20-25 साल पहले boyfriend girlfriend जैसी बातें openly नहीं होती थीं। relationships hidden रहते थे, और एक unsaid rule होता था कि शादी से पहले कुछ नहीं करेंगे। फिर ये सब normalize हुआ, उसके बाद live-in relationship आया, फिर situations...

हर वृद्ध पुरुष को इसे पढ़कर चिंतन अवश्य करना चाहिए

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  । 1. पुरुष बूढ़ा होता है, जबकि स्त्री परिपक्व होती है। 2. जैसे ही पुरुष अपने बच्चों की शादी कर देता है और परिवार की आर्थिक नींव मजबूत कर देता है, परिवार में उसका वरिष्ठ और सम्मानित स्थान धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। 3. इसके बाद उसे बोझ समझा जाने लगता है — चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अनिश्चित स्वभाव वाला बूढ़ा व्यक्ति। 4. जिन कठोर निर्णयों से उसने कभी पत्नी और बच्चों के लिए व्यवस्था बनाई थी, आज उन्हीं निर्णयों की चीर-फाड़ होकर आलोचना होती है; एक न एक कारण से उसे दोषी ठहरा दिया जाता है। और यदि वास्तव में उससे कोई गलती हुई हो — तो भगवान ही रक्षा करे। 5. वृद्ध स्त्री को, इसके विपरीत, बच्चों और बहुओं से सहानुभूति मिलती है — क्योंकि उसके माध्यम से अभी भी कई काम करवाने होते हैं। 6. सही समय आने पर वह समझदारी से पति के पक्ष से बच्चों के पक्ष में चली जाती है। 7. जब पति उम्र में बड़ा हो, तो पत्नी बहू के साथ तालमेल बना लेती है, ताकि बेटा उससे दूर न हो और उसकी देखभाल करता रहे। 8. पुरुष ने जीवन में चाहे कितनी ही महान उपलब्धियाँ हासिल की हों — बुढ़ापे में वे किसी काम नहीं आतीं। 9. जबकि वृद्ध स्त्री...

हमारे जाने के बाद

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 हमारे जाने के 100 साल बाद शायद किसी को हमारा नाम भी याद नहीं रहेगा... तो फिर इतनी भागदौड़ किसलिए? दोस्त, आज से 100 साल बाद हम इस दुनिया में नहीं होंगे। हम अपने अपनों के साथ मिट्टी में सो चुके होंगे। जिस घर को बनाने के लिए हमने दिन-रात मेहनत की... कितनी कुर्बानियाँ दीं... कितनी रातें जागकर काम किया... उसी घर में तब कुछ और लोग रह रहे होंगे। आज जिन चीज़ों को हम "ये मेरा है" कहकर दिल से लगाते हैं, वे सब किसी और के पास होंगी। हमारी अगली पीढ़ी... शायद हमारा नाम भी ठीक से याद न रख पाए। हम में से कितने लोग अपने परदादा या उनके पिता का नाम जानते हैं? हमारे जाने के बाद कुछ साल लोग हमें याद करेंगे... फोटो देखेंगे... बातें करेंगे... लेकिन धीरे-धीरे सब धुंधला हो जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे अस्तित्व का कोई निशान भी नहीं बचेगा। तब सवाल उठता है - हम इतना क्यों लड़ते हैं? इतना अहंकार किसलिए? इतनी चिंता, तनाव और प्रतिस्पर्धा क्यों? हम "सब कुछ पाने" की दौड़ में लगे रहते हैं... लेकिन क्या सच में वही सबसे ज़रूरी है? कितनी बार हमने घूमने का प्लान टाल दिया? कितनी बार माँ-बाप को गले लग...

दस ग्राम श्मशान साथ ले आना चाहिए।

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आपने कभी चिता जलते देखी है ? चिता पूरी तरह से जलने में ढाई से तीन घंटे का समय लगता है, यह समय मृत शरीर के वजन, उपयोग की गई लकड़ियों की मात्रा, प्रयोग की गई सामग्री घी आदि और मौसम की स्थिति पर भी निर्भर कर सकता है। शुरुआती समय में चिता के आसपास व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अनुसार भीड़ मौजूद रहती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे भीड़ कम होती चली जाती है, लोग अपनी उपस्थिति लगाकर अपना चेहरा दिखाकर जाते रहते हैं, अगर अंतिम संस्कार के लिए कई लोग एक साथ किसी दूर के स्थान से, एक ही वाहन (गाड़ी) से आएं हैं तो ऐसे में लोग उपस्थित रहते हैं, क्योंकि उनके पास वापस जाने का कोई साधन नहीं होता, वरना अंत के दस-पंद्रह मिनट तक मुश्किल से तीन-चार लोग ही श्मशान घाट में बचते हैं। अंतिम तीन-चार लोग वो होते हैं जो उस मृत व्यक्ति के एकदम करीबी होते हैं यानी उसका पुत्र, पुत्र ना होने की स्थिति में वह व्यक्ति जो अंतिम संस्कार कर रहा होता है, उसके सगे संबंधी उसके भाई उसके अन्य परिवार के लोग, या फिर वो लोग जिनका उन उपस्थित लोगों से निकटतम संबंध (स्वार्थ) होता है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो जिसका मृत व्यक्...

मर्द

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 ये जो 2014, अतीक और नोटबंदी वाली कान्ट्रवर्सी है, ये एक न्यूक्लियर ब्लास्ट जैसा है।  इसके शुरुआती रेडीअस में जो आयेगा वो भस्म और वाष्प होगा। हड्डियाँ भी न मिलेंगी। लेकिन जब डस्ट सैटल होगी, तब धुरंधर 2 एक नई कान्ट्रवर्सी लेकर आयेगी। इसमें हार्ड कोर सूडो फेमनिस्ट्स की तरफ विलाप का शोर सुनाई देगा। क्योंकि धुरंधर की हिरोइन के पास वाकई में कुछ खास स्क्रीनटाइम नहीं है। पिछली वाली हिरोइन – उलफ़त उर्फ सौम्या टंडन भी – एक थप्पड़ मारने की मशीन भर रह गई हैं। इसके इतर किस फ़ीमेल किरदार के पास स्ट्रॉंग स्क्रीनटाइम है धुरंधर में? जवाब है कोई नहीं।  पर स्क्रीनटाइम से इतर, धुरंधर की फ़ीमेल के पास स्ट्रॉंग कैरेक्टर ज़रूर है। पाक्सतां जैसे हार्डकोर पैट्रीआर्क देश में भी एक ऐसी कन्या दिखाई गई है जो अपनी मर्ज़ी से जीती है, अपनी मर्ज़ी से शादी करती है, अपनी इच्छा से माफ़ करती है, मना करने के बावजूद वो सवाल करती है, जवाब माँगती है और सारे लॉजिक्स से खुद को परे करके, अपने प्रेमी की ढेर सारी फ़िक्र करती है।  इसके बावजूद आप कह सकते हैं कि इसने बच्चे पैदा करने के सिवा किया ही क्या है?  पर जनाब य...

प्रधानाचार्य

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 विद्यालय का प्रधानाचार्य “मिलनसार दिखने” के दबाव में यदि अपनी निर्णय क्षमता खो देता है, तो वह धीरे-धीरे नेतृत्व नहीं, बल्कि प्रभावों का शिकार बन जाता है। यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच यही है कि एक प्रधानाचार्य का काम सभी को खुश रखना नहीं, बल्कि सही और न्यायपूर्ण निर्णय लेना है। और यह निर्णय मित्रता, दबाव या अफवाहों के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्य, प्रमाण और विवेक के आधार पर ही संभव है। यह धारणा कि प्रधानाचार्य को हर समय मित्रवत होना चाहिए, शिक्षा के पेशेवर ढाँचे को कमजोर करती है। एक शिक्षक और प्रधानाचार्य के बीच संबंध सम्मान और स्पष्टता का होना चाहिए, न कि अनावश्यक घुलने-मिलने का। अत्यधिक मित्रता कई बार निर्णयों की निष्पक्षता को प्रभावित करती है, जिससे न केवल व्यवस्था बिगड़ती है बल्कि कार्यसंस्कृति भी प्रभावित होती है। इसलिए प्रधानाचार्य का सख्त होना कोई नकारात्मक गुण नहीं, बल्कि एक आवश्यक पेशेवर विशेषता है—बशर्ते उसमें संवेदनशीलता और न्याय का संतुलन भी मौजूद हो। निर्णय प्रक्रिया की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि वह कितनी प्रमाण आधारित है। विद्यालय में हर दिन अनेक शिकायतें, सुझाव और आरोप ...

जब कुर्सी रह जाती है, दिमाग चला जाता है

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  ————————————————— बचपन से एक बात समझाई गई थी कि किसी भी काम को करने के लिए सबसे जरूरी चीज दिमाग है। शरीर थक जाए तो आदमी आराम कर सकता है। उम्र ज्यादा हो जाए तो आदमी धीमा चल सकता है। लेकिन अगर दिमाग साथ छोड़ दे तो आदमी खुद भी खतरे में होता है और उसके भरोसे बैठे लोग भी। बचपन में यह बात सिर्फ घर की लगती थी। बड़ा हुआ तो समझ में आया कि यह सिर्फ घर की नहीं, पूरे देश की भी बात है। कुछ दिन पहले एक डॉक्टर मित्र बता रहे थे कि डिमेंशिया नाम की बीमारी बड़ी अजीब होती है। आदमी चलता फिरता रहता है, बोलता भी रहता है। कभी-कभी तो बिल्कुल सामान्य लगता है। लेकिन धीरे धीरे उसकी स्मृति कमजोर होने लगती है। उसे याद नहीं रहता कि उसने अभी क्या कहा, क्या किया, किससे मिला। वह एक ही बात बार-बार दोहराने लगता है। फैसले गड़बड़ होने लगते हैं। डॉक्टर ने कहा कि परिवारों में यह बीमारी बड़ी कठिन स्थिति पैदा कर देती है। घर के लोग समझ जाते हैं कि अब बुजुर्ग को आराम देना चाहिए। गाड़ी की चाबी उनसे ले ली जाती है। बैंक का काम बेटा या बेटी संभाल लेते हैं। धीरे धीरे जिम्मेदारियां बदल जाती हैं। यानी परिवार मान लेता है कि अब नि...