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पत्थर दिल

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 "सामने बेटे की मौ*त खड़ी थी और हाथ में उसे बचाने का मौका, पर इस बाप ने जो फैसला लिया उसे सुनकर दुनिया के पैरों तले जमीन खिसक गई! क्या कोई इतना पत्थर दिल हो सकता है?" द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस के तानाशाह स्टालिन का बड़ा बेटा, याकोव (Yakov), जर्मन सेना द्वारा पकड़ लिया गया था। हिटलर को लगा कि यह स्टालिन को झुकाने का सबसे सही मौका है। जर्मनी ने एक प्रस्ताव भेजा— "अपने बेटे याकोव को वापस ले लो और बदले में हमारे पकड़े गए फील्ड मार्शल फ्रेडरिक पॉलस (Friedrich Paulus) को रिहा कर दो।" दुनिया को लगा कि एक पिता अपने बेटे को बचाने के लिए कुछ भी करेगा।  एक बाप के लिए भी यह मौका था अपने बेटे की जान बचाने का, लेकिन स्टालिन ने जो कहा वह आज भी इतिहास में दर्ज है। उन्होंने जवाब दिया "मैं एक फील्ड मार्शल का सौदा एक साधारण सिपाही से नहीं कर सकता।" स्टालिन की नज़र में याकोव सिर्फ उनका बेटा नहीं, बल्कि रेड आर्मी का एक लेफ्टिनेंट था। उनके लिए लाखों रूसी सैनिकों की जान उनके अपने बेटे से बढ़कर थी। नतीजा यह हुआ कि याकोव की जेल में ही मृ*त्यु हो गई, लेकिन स्टालिन ने अपने सगे ...

रावण

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 लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला। यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे। एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण, सब कहते हैं दशानन अजेय था क्योंकि ब्रह्मा का वरदान था। क्या यही उसकी शक्ति का रहस्य था?" विभीषण हँसा, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।" पहला सिर – सुनने वाला रावण पैदा पुलस्त्य के कुल में हुआ, पर जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।" रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश की छाया में बैठा, और शिव तांडव नहीं, शिव का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षो...

सत्य

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 जिस दिन हम बिना लाग लपेट के सत्य के लिए आग्रहित होना आरंभ कर देंगे, तब उसी दिन से हम ब्रह्मांड के साथ एकाकारिता का अनुभव करने लगेंगे।  कुछ छूटने का डर, कुछ खोने का अवसाद, संबंधों में नाराजगी का भाव, समाज में छद्म सभ्यता का भाव और हमारी आंतरिक कमजोरी ही हमें सत्य से बहुत दूर ले जाती है और असत्य के साथ बहने को विवश कर देती है , जिसके साथ हमने रहना सीख लिया है या यूं कहीं हम इसके आदी हो चुके हैं। वर्षों तक व्यवस्था की सहते सहते और नियमों का हवाला देते देते हम किस सीमा तक भावना शून्य होकर  यंत्र का कलपुर्जा मात्र बन गए हैं , इसे हमारी आत्मा तक ने स्वीकार करना बंद कर दिया है या दूसरे शब्दों में हमारी आत्मा भी मर चुकी है और मरी हुई आत्मा सिर्फ जिंदगी को घसीटती है जीती नहीं है। सत्य को स्वीकार कर और गलत का सामना करने की क्षमता विकसित करते हुए हम जिंदगी को पल-पल जीना सीख जाते हैं , ठहराव टूट जाता है और हम जीवन और मृत्यु से पार जाकर अपनी सत्ता, अपने अस्तित्व को आनंदित होकर अनुभव करने लगते हैं। सत्य के लिए आग्रह कुछ समय के लिए आपको उद्वेलित कर सकता है लेकिन धीरे-धीरे आदी होने पर ...

गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली हैं l

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 गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली हैं l बच्चे घूमने जाने की ज़िद्द करेंगे l घूमने ज़रूर जाओ l थोड़ा चेंज हो जाता है l पहाड़ों पर जाओ, समुद्र किनारे जाओ, नदियों/झरनों का संगीत सुनने जाओ l  लेकिन एक बात गाँठ बाँध लो l अपनी जान किसी क्रूज वाले या झूले वाले के हाथ में मत दो l किसी रोपवे वाले को तुम्हारे प्राण तार पर मत लटकाने दो l पैराजंपिंग कर के क्यों मरना?  टूरिस्ट प्लेसेज पर इतने सारे थ्रिल डवलप हो गए हैं सब पैसा बनाने के लिए हैं l सुरक्षा मानकों पर एक भी खरा नहीं उतरता l ना इनकी कोई सेफ्टी ऑडिट होती l सब भगवान भरोसे चलता है l  रिलीजियस प्लेसेज पर भूल कर भी मत जाओ l वहाँ सब लुटेरे हैं l लुटेरों के ही भगवान हैं l भगदड़ में दब कर मरने के लिए थोड़े ही मिला है जीवन ? मंदिर के बाऊंसर आपके साथ मार पिटाई करने आपके घर तो आते नहीं l तुम ख़ुद सपरिवार जाते हो मार खाने के लिए… चार चार घंटे लाइन में लगने के लिए l ये सब बिजनेस मॉड्यूल हैं और तुम इनके कस्टमर l इससे ज्यादा कुछ नहीं l  क्रूज़ व्रुज पर मत चढ़ो l राफ्टिंग शाफ़्टिंग मत ही करो l पैरग्लाइडिंग भी रिस्की है l  ऊंच...

बुजुर्ग समझदार थे या हम?

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यह तस्वीर हमारे गांव मानकावास के स्कूल कमेटी की है। इन बुजुर्गों ने आपसी सहयोग से 1950 के दशक में यह स्कूल बनाया था। इस स्कूल से पढ़कर सरकारी नौकरियों में गए, उनमें से कई अफसर भी बने। तब गांव में कोई मंदिर नहीं था, जोकि मैने कल पोस्ट में बताया भी है कि गांव में पहला मंदिर सन् 1967 के बाद बना था, और वह भी उन साधु महात्मा के ही पैसों से बनाया गया था। तब ये बुजुर्ग चाहते तो चंदा करके, या आपसी सहयोग से, जैसे ये स्कूल बनाया था, वैसे ही मंदिर भी बनवा सकते थे! तब इन्होंने सिर्फ स्कूल को ही एहमियत क्यों दी?  अब बात करते हैं, आज के दौर की। अभी पिछले महीने चरखी दादरी में मुख्यमंत्री की रैली थी, तो पंचायतों से गांवों की मांगों के लिए प्रस्ताव मांगे जा रहे थे। मेरे गांव से एक भाई ने मांग रखी कि स्कूल के मुख्य द्वार की मरम्मत करवाई जाए। इस पर विधायक जी ने कहा कि यह भी कोई मांग है, इसे तो विधायक कोटे से ही ठीक करवा देंगे, कोई बड़ी मांग करो।  तब मुझे इन बुजुर्गों का ख्याल आया कि एक ये बुजुर्ग थे जो अपने दम पर पूरा स्कूल बना गए, और एक हम हैं, कि उनके बनाए हुए स्कूल के मुख्य द्वार की मरम्मत भी...

राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है. मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है

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  2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरु किया. देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द ख़त्म हो जाएगा. हज़ारों की भीड़ जमा हो गई. क्रांति को नाम मिला India Against Corruption. नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए. मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं. मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया. उस दौर में अक्सर बहन के घर मुलाक़ात होती थी. एक दिन उन्होंने मुझे कहा, “अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं.” कुछ हफ़्तों बाद आग्रह कर के वो अपनी गाड़ी में मुझे महाराष्ट्र भवन ले गईं. वहाँ एक कमरे में उन्होंने मुझे अन्ना हज़ारे से मिलवाया. उन्होंने अन्ना हज़ारे से मेरे बारे में अच्छी अच्छी बातें कीं. मैं चुप बैठा रहा. फिर अन्ना करवट पलट कर सो गए और हम कमरे से बाहर आ गए. एक दिन मैंने बहन से धीरे से कहा: “मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ. आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख़्ता कर लें. कल ये एक पार्टी बनेगा. आप सेटिंग करके चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट लें. आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे. बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवा...

दिल की कॉपी

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 मुझे ऐसा महसूस होता है की मेरी उम्र ज़्यादा लंबी नहीं होगी, मेरी मौत भरी जवानी मैं हो जाएगी ऐसा लगता है जैसे हर लम्हा आख़िरी हो, हर दिन आख़िरी हो, हर रात आख़िरी रात हो, ऐसा लगता है जैसे मेरे सब ख़्वाब हसरतों मैं बदल जाएँगे जैसे मेरी ख्वाहिशें मर जाएँगीं और मैं बिलकुल तन ह रह जाऊँगा, । "हमारी मौत जवानी मैं लिख दी जाती है, हम ऐसे लोग फ़क़त मुँह दिखाने आते हैं।"