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इश्तेहार

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 अंग्रेज सरकार की तरफ़ से सेना में भर्ती के लिए जारी किया गया यह इश्तेहार उस दौर की हकीकत बयान करता है, जब युवाओं को लालच, इनाम और “इज़्ज़त” के नाम पर फौज में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया जाता था। 🇮🇳📜 इस तस्वीर में एक व्यक्ति की फौज में भर्ती होने से पहले और बाद की स्थिति दिखाकर यह समझाने की कोशिश की गई है कि सेना में जाना तरक़्क़ी और सम्मान का रास्ता है। 🗣️ इश्तेहार में लिखा गया है: “भाइयों जल्दी चलो, दौड़ो वरना पछताओगे… सरकार बहादुर ने पचास रुपया इनाम के बजाय अब पैंसठ रुपया इनाम कर दिया है। दस रुपया भर्ती होने पर, 40 रुपया पलटन पहुँचने पर और 15 रुपया कवायद पास करने पर मिलेगा। ग्यारह रुपया माहवार तनख्वाह के अलावा हर छह महीने पर 25 रुपया ‘ज़माना-ए-लड़ाई’ के लिए मिलेगा। लाम (मोर्चे) पर जाने पर पाँच रुपया माहवार भत्ता और दिया जाएगा। कपड़ा और खाना हर हालत में मुफ़्त मिलेगा…” 📌 भर्ती की शर्तें: उम्र 18 से 30 साल, क़द 5 फ़ीट 2 इंच, सीना 32 इंच। पैदल पलटन और तोपखाने के लिए अलग-अलग जातियों का उल्लेख भी किया गया है। यह इश्तेहार उस समय की सामाजिक बनावट, आर्थिक हालात और औपनिवेशिक नीत...

“जो चीज़ें पहली नज़र में बहुत कूल लगती हैं, उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यही होती है कि उनका असर ज्यादा दिन नहीं टिकता।”

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प्रसिद्ध साहित्यकार शिवानी की बेटी ईरा पांडे अपनी माँ की जीवनी में एक दिलचस्प प्रसंग दर्ज करती हैं। वह लिखती हैं कि उनके नाना के ठीक बगल वाले घर में डेनियल पंत रहते थे, जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था। नाना की सोच काफ़ी रूढ़िवादी थी, इसलिए उन्होंने दोनों घरों के बीच एक दीवार खड़ी करवा दी—ताकि “उनकी दुनिया” और “हमारी दुनिया” अलग-अलग रहें। घर में सख़्त निर्देश थे कि उस तरफ़ न देखा जाए, न कोई मेल-जोल हो। शिवानी ने कहीं लिखा है कि डेनियल पंत के घर से उठने वाली मसालेदार मांस की खुशबू उनके साधारण ब्राह्मण रसोईघर तक पहुँच जाती थी और उनकी दाल, आलू की सब्ज़ी और चावल को फीका बना देती थी। यह वर्णन उसी घर का था, जिसके मुखिया तारादत्त पंत ने 1874 में हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया था—और इस तरह वे कुमाऊँ की उस “नीरस” ब्राह्मण रसोई से आज़ाद हो गए थे। इसी डेनियल पंत की बेटी आयरीन रूथ पंत ने आगे चलकर अपने से दस साल बड़े, पहले से विवाहित और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से विवाह किया। इसके साथ ही उन्होंने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। दिलचस्प बात यह है कि लियाकत अली खा...

तीसहजारी खौफ और दिल्ली का सुल्तान !!

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     नाम सुन कर आपको दिल्ली की मशहूर अदालत का ख्याल आता होगा । आयेगा भी ! आज दिल्ली में तीसहजारी कोर्ट नामी जगह है । लेकिन ये नाम पड़ा कैसे ? तो चलिये चलते हैं आज से 243 साल पहले की दिल्ली घूमने ।    मुगलिया सल्तनत ने कई सिख गुरूओं को शहीद किया , और फिर लाल किले के दीवान ए आम में बैठ कर सन 1716 में सिखों के बहादुर योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर को 740 सिखों के साथ शहीद करने का फरमान सुनाया गया था । इस बात की खालसा फौज के मन में कसक रहती थी ।  फिर आया 1781 खालसा फौजों ने जनरल बघेल सिंह , बाबा जस्सा सिंह की अगुवाई में सोनीपत , से बागपत तक के यमुना पार के हिस्से कब्जा कर लिया, अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के तुरन्त बाद खालसा फौजें दिल्ली की ओर बढ ने लगीं । उनका इरादा दिल्ली सल्तनत पर कब्जा करना नहीं वरन शहीद गुरूओं के शहीदी स्थलों पर गुरूद्वारा न बनाने की बादशाह की नाफरमानी या टालने की नीति पर उसे सबक सिखाना था ।  खालसा सेनाऐं जनरल बघेल सिंह, बाबा जस्सा सिंह अहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढि़या की कप्तानी में अलग अलग दिशाओं से दिल्ली की ओर...

भौव्रुवण (बभ्रुवाहन): वह पुत्र जो अर्जुन को पराजित कर सका — और इतिहास ने जिसे भुला दिया

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 भौव्रुवण (बभ्रुवाहन): वह पुत्र जो अर्जुन को पराजित कर सका — और इतिहास ने जिसे भुला दिया महाभारत के उस महासंग्राम में, जहाँ शंखनाद भीष्म, कर्ण, अर्जुन और द्रोण के नामों से गूँजता है— वहाँ एक ऐसा योद्धा भी था, जिसकी निःशब्दता युद्धघोष से कहीं अधिक भारी थी। उसका नाम था बभ्रुवाहन— जिसे भौव्रुवण के नाम से भी जाना गया। वह न दुर्बल था। न अशिक्षित। न तुच्छ। वह केवल विस्मृत कर दिया गया। ⸻ यश से दूर जन्म भौव्रुवण का जन्म मणिपुर में हुआ— हस्तिनापुर की राजनीति और कुरुक्षेत्र की रक्तरंजित कीर्ति से बहुत दूर। उसके पिता थे अर्जुन— अपने युग के महानतम धनुर्धर। उसकी माता थीं चित्रांगदा— एक योद्धा-रानी, जिन्होंने अपने पुत्र को कथाओं का राजकुमार नहीं, बल्कि भूमि और प्रजा का रक्षक बनाकर पाला। अर्जुन चले गए। निर्दयता से नहीं— नियति के आह्वान पर। और भौव्रुवण बड़ा हुआ— पिता की छाया के बिना, पर राजा के दायित्व के भार के साथ। ⸻ तालियों के बिना सामर्थ्य भौव्रुवण ने साधना की— निस्तब्धता में। न किसी गुरु ने उसका यश गाया। न किसी ऋषि ने उसके भविष्य की घोषणा की। फिर भी वह बना—  • अस्त्र-शस्त्रों का निष्णात ...

शत्रुघ्न — वह भ्राता जिसे इतिहास भूल गया

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  स्मरण किया जाता है राम का — आदर्श राजा के रूप में। चर्चा होती है लक्ष्मण की — निष्ठावान छाया के रूप में। नमन किया जाता है भरत को — उस भ्राता के रूप में जिसने राज करते हुए भी राज नहीं किया। परंतु शत्रुघ्न— सबसे छोटे भ्राता— ऐसे जीवन में जिए, जहाँ स्मृति पहुँच ही नहीं सकी। ⸻ भूमिका के बिना जन्म शत्रुघ्न का जन्म नेतृत्व के लिए नहीं हुआ। वे राम के साथ वन जाने के लिए नहीं चुने गए। न ही उनसे भरत की भाँति त्याग की अपेक्षा की गई। बाल्यकाल से ही उन्होंने एक सत्य स्पष्ट रूप से जान लिया— उनके लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं था। अतः उन्होंने स्वयं अपना स्थान चुना— भरत के समीप, मौन में, निष्ठा में, निरंतर। ⸻ जिस प्रेम का कोई नाम न था जब भरत विलाप करते थे, शत्रुघ्न रात्रि भर जागते रहते थे। जब भरत ने राम के वनवास का दोष स्वयं पर लिया, शत्रुघ्न ने भी वह भार अपने हृदय में धारण किया— जबकि वह उनका अपराध नहीं था। उन्होंने राम से कभी कम प्रेम नहीं किया। उन्होंने धर्म की कभी उपेक्षा नहीं की। उन्होंने केवल मौन में प्रेम किया— और मौन प्रेम प्रायः भुला दिया जाता है। ⸻ वह क्रोध जिसे व्यक्त करने की अनुमति न म...

31 दिसंबर 2025

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  हमारे झगड़े पलंग पर  गीला तौलिया रखने से  नहीं होते अब। न होते हैं झगड़े गलत ढंग से  चप्पल जूते रखने पर । और बिना नहाए नाश्ता करने पर या  खाने के साथ सेंव या  नमकीन लेने पर भी  अब नहीं होती कोई  झंझट या तकरार । अलमारी में बेतरतीब कपड़े  या स्टडी टेबल पर  बिखरी किताबें भी  अब खीज नहीं पैदा करती । खाने में क्या पसंद करोगे ये सवाल अब नहीं लुभाता बल्कि ये पूछना कि  खाने में ये पच जाएगा  अब सुकून देता है । शहर से बाहर सफर पर जाते समय एक दूसरे को कपड़ों की नहीं  दवाइयों की याद  दिलाने का समय  आ गया है अब। अपनी अपनी स्पेस  ढूंढने के लिए झगड़ने  का नहीं  अपनी स्पेस  दूसरे के लिए छोड़ने का समय  आ गया है अब। जिन बच्चों को समझाबुझाकर  डांट डपटकर बड़ा किया है अब उनकी समझाइश  सुनने का और उनसे  डांट खाने का समय  आ गया है अब। झगड़ों और डांट का रूठने और मनाने का समझने और समझाने का सबका समय अब  निकलता जा रहा है। अब तो  एक दूसरे का  एक दूसरे के अंदर  अनंत वि...

छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ – हमें रुककर सोचना होगा

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पिछले कुछ दिनों में देशभर में 4 बच्चों ने स्कूल-संबंधी तनाव और अपमान के कारण अपनी जान दे दी—दिल्ली का कक्षा 10 छात्र, मध्य प्रदेश की कक्षा 11 छात्रा, राजस्थान का 9वीं का बच्चा और जयपुर की 9 साल की बच्ची। हर कहानी दर्दनाक है… और हर कहानी एक चेतावनी भी। सच्चाई यह है कि हमने अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से बहुत कमजोर बना दिया है। पहले शिक्षक का वाक्य—“तू गधा है”—सिर्फ टोकना माना जाता था। आज वही बात पूरी कक्षा में बोल दी जाए, तो बच्चा anxiety में चला जाता है। क्यों? क्योंकि “शिक्षक की छड़ी हम पहले ही छीन चुके हैं।” अब शिक्षक हर शब्द बोलने से डरते हैं—कहीं शिकायत न हो जाए, कहीं वायरल न हो जाए। शिक्षक धीरे-धीरे गुरु नहीं, “service-sector employee” बन रहे हैं। लेकिन दोष सिर्फ शिक्षकों का नहीं है। घर में माता-पिता भी “five-star steward” बन चुके हैं— हर मांग पूरी करना, हर छोटी सी असफलता से बचाना, हर चीज़ में show-off… यही बच्चों का मानसिक रिज़र्व कमजोर कर देता है। हम सब मिलकर अपने बच्चों को ऐसे नाजुक बना चुके हैं कि एक ताना, एक डांट, एक रिपोर्ट कार्ड… और वे टूट जाते हैं। समय आ गया है कि— ✔ शिक्...