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At 40 You should realise

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 1. Some people earn a lot more than you in regular jobs because they have better opportunities. 2. Distractions are the biggest enemy of success. They hurt your ability to think. 3. Don’t listen to advice from people who aren’t where you want to be in life. 4. No one is going to solve your problems for you. It’s completely your responsibility. 5. You don’t need a hundred self-help books. You just need to take action and be disciplined. 6. If you didn’t go to college for a specific job (like a doctor or engineer), you can learn sales and make more money in 90 days. 7. Nobody really cares about you, so don’t be shy. Go out and make your own opportunities. 8. If you meet someone smarter than you, work with them instead of competing. 9. Smoking is not helpful. It will make you think slower and lose focus. 10. Being too comfortable can lead to bad habits and feeling down. 11. Don’t share too much information about yourself. Keep some things private. 12. Stay away from alcohol. It can m...

WhatsApp वाले अंकल

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 आज हम जो सनातनी आंदोलन देखते हैं, वह 150 साल से भी कम समय पहले शुरू हुआ था। लेकिन अगर आप कुछ 'WhatsApp वाले अंकल' लोगों से पूछें, तो वे पूरे भरोसे के साथ आपको बताएँगे कि सब कुछ 5000 साल पुराना है। कम से कम इतना तो है ही। कभी-कभी तो 10,000 साल भी बता देते हैं, अगर इंटरनेट की स्पीड अच्छी हो तो। इससे समय को लेकर एक समस्या खड़ी हो जाती है। सनातनी लोग यह भी दावा करते हैं कि महाभारत का युद्ध 5000 साल पहले हुआ था। तो फिर, क्या सनातन धर्म उस युद्ध से पहले शुरू हुआ था या उसके बाद? पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) इस मामले को और भी पेचीदा बना देता है। मुख्यधारा के पुरातत्व विज्ञान के अनुसार, घोड़े और रथ इस उपमहाद्वीप में 3500 साल पहले आए थे। तो अगर महाभारत 5000 साल पहले हुआ था, तो क्या हम यह कह रहे हैं कि अर्जुन ने पाषाण युग (Stone-age) के रथ को काल्पनिक घोड़ों के साथ चलाया था? इस मोड़ पर, इसका जवाब अक्सर यह होता है: "पश्चिमी साज़िश।" ज़ाहिर है, सभी पुरातत्वविद झूठ बोल रहे हैं। कार्बन डेटिंग 'राष्ट्र-विरोधी' है। खुदाई का काम ईसाई प्रचार का हिस्सा है। ज़मीन की भूवैज्ञानि...

जनगणना

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 गुरु,सच बताऊं तो जनगणना ने एक आईना तो दिखा ही दिया कि अमीरी की पहचान सिर्फ बड़े मकानों, बड़ी बड़ी गाड़ियों से नहीं, बल्कि बड़े दिलों से पहचानी जाती है... आलीशान मकानों वाले घर मिले, जहाँ घंटों धूप में खड़े रहने के बाद किसी ने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा... और वहीं टूटी हुई मकानों में रहने वालों ने कम से कम ये तो कहा कि भाई साहब, पहले पानी पी लो... फिर काम कर लेना..." सच कहूँ तो उस दिन समझ आया कि इंसान की औकात उसके घर से नहीं, उसके व्यवहार से पता चलती है कि वाकई में अमीरीयत क्या होती है ।कल एक सज्जन जो खुद को तथाकथित अमीर समझ रहे थे , लास्ट प्रश्न जिसमें फोन नंबर बताना था केवल, भाई साहब नम्बर बताने से पहले दूसरे व्यक्ति,जो की उनके घर काम करता था 15 मिनट तक डांटते रहे और मैं उनके फोन नम्बर का इन्तजार करता रहा‌। तभी मैंने भगवान से प्रार्थना कि प्रभू अमीर उन्हें ही बनाओ जो‌ चु्््या और बकलोल ना हो ,पर मैं नाराज़ नहीं हुआ क्योंकि ट्रेनिंग में बताया गया है खीस दिखाकर मुस्कुराते रहना हैं।😀😀 कुछ लोगों के घर बहुत बड़े थे, लेकिन दिल छोटे निकले और कुछ के पास खुद खाने को कम था पर अपनापन...

गर्मी की छुट्टियों

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 आजकल गर्मी की छुट्टियों को लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो शिक्षक और बच्चे कोई राष्ट्रीय संसाधन नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली मशीन हों जिन्हें बस ऑन करके छोड़ देना चाहिए। छुट्टियाँ आते ही समाज का एक वर्ग और कुछ जिम्मेदार लोग ऐसे प्रतिक्रिया देने लगते हैं जैसे शिक्षा का पूरा पतन केवल गर्मी की छुट्टियों की वजह से हो रहा हो। सबसे पहले यह समझना होगा कि गर्मी की छुट्टियाँ “मौज-मस्ती का बोनस” नहीं, बल्कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश की भौगोलिक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता हैं। 45 डिग्री तापमान में चलने वाले सरकारी स्कूलों की वास्तविकता एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठकर समझी नहीं जा सकती। जिन स्कूलों में पंखे केवल घूमते हैं, हवा नहीं देते, जहाँ बिजली आधा दिन गायब रहती है, जहाँ बच्चे फर्श पर बैठते हैं, वहाँ मई-जून में नियमित पढ़ाई की बात करना संवेदनहीनता है, शिक्षाशास्त्र नहीं। दूसरा बड़ा पूर्वाग्रह यह फैलाया जा रहा है कि “शिक्षक तो वैसे भी बहुत छुट्टियाँ लेते हैं।” यह कथन उन लोगों का सबसे सुविधाजनक हथियार है जिन्हें शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। शिक्षक का काम केव...

कुछ हाथ डिग्री से नहीं, दुआ और अनुभव से बड़े होते हैं।

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 जब अरबपति की पत्नी प्रसव पीड़ा में मौत से लड़ रही थी, 12 डॉक्टर हार चुके थे; तभी फर्श पोंछने वाली गरीब दाई ने कहा, “बच्चा रास्ता मांग रहा है,” और कमरे का घमंड एक पल में सभी की सांसें थमाकर टूट गया बच्चे की धड़कन गिर रही थी, मां की आंखें पलटने लगी थीं, और दिल्ली के सबसे महंगे अस्पताल के बाहर एक गरीब सफाईकर्मी औरत को डॉक्टरों ने दरवाजे से धक्का देकर पीछे कर दिया था। दक्षिण दिल्ली के “सूर्यवंश सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल” की 9वीं मंजिल उस रात किसी पांच सितारा होटल जैसी चमक रही थी, मगर भीतर मौत की आहट घूम रही थी। उसी मंजिल के शाही प्रसव-कक्ष में ईशानी मल्होत्रा 41 घंटे से प्रसव पीड़ा में थी। वह विक्रम मल्होत्रा की पत्नी थी—वही विक्रम मल्होत्रा जिसके होटल, रियल एस्टेट, मीडिया चैनल और टेक कंपनियों के नाम पर आधा दिल्ली-एनसीआर सांस लेता था। अखबारों ने इस बच्चे को “मल्होत्रा साम्राज्य का वारिस” कहा था। सोशल मीडिया पर ईशानी की गोद भराई की तस्वीरें वायरल हुई थीं। चांदी की थालियां, बनारसी साड़ियां, जयपुर से आए कंगन, और मंदिरों में चढ़ाए गए लाखों रुपये के प्रसाद—सब कुछ था। बस उस रात एक चीज नहीं थी।...

पत्थर दिल

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 "सामने बेटे की मौ*त खड़ी थी और हाथ में उसे बचाने का मौका, पर इस बाप ने जो फैसला लिया उसे सुनकर दुनिया के पैरों तले जमीन खिसक गई! क्या कोई इतना पत्थर दिल हो सकता है?" द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस के तानाशाह स्टालिन का बड़ा बेटा, याकोव (Yakov), जर्मन सेना द्वारा पकड़ लिया गया था। हिटलर को लगा कि यह स्टालिन को झुकाने का सबसे सही मौका है। जर्मनी ने एक प्रस्ताव भेजा— "अपने बेटे याकोव को वापस ले लो और बदले में हमारे पकड़े गए फील्ड मार्शल फ्रेडरिक पॉलस (Friedrich Paulus) को रिहा कर दो।" दुनिया को लगा कि एक पिता अपने बेटे को बचाने के लिए कुछ भी करेगा।  एक बाप के लिए भी यह मौका था अपने बेटे की जान बचाने का, लेकिन स्टालिन ने जो कहा वह आज भी इतिहास में दर्ज है। उन्होंने जवाब दिया "मैं एक फील्ड मार्शल का सौदा एक साधारण सिपाही से नहीं कर सकता।" स्टालिन की नज़र में याकोव सिर्फ उनका बेटा नहीं, बल्कि रेड आर्मी का एक लेफ्टिनेंट था। उनके लिए लाखों रूसी सैनिकों की जान उनके अपने बेटे से बढ़कर थी। नतीजा यह हुआ कि याकोव की जेल में ही मृ*त्यु हो गई, लेकिन स्टालिन ने अपने सगे ...

रावण

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 लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला। यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे। एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण, सब कहते हैं दशानन अजेय था क्योंकि ब्रह्मा का वरदान था। क्या यही उसकी शक्ति का रहस्य था?" विभीषण हँसा, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।" पहला सिर – सुनने वाला रावण पैदा पुलस्त्य के कुल में हुआ, पर जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।" रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश की छाया में बैठा, और शिव तांडव नहीं, शिव का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षो...