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Yugi

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 *समझौता नहीं साहस* हनीमून से लौटते ही पति ने हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन खेल शिक्षिका के पास ऐसा सबूत था जिसने पूरे परिवार की साज़िश उजागर कर दी! शादी के सात दिन बाद, मसूरी से लौटते ही आदित्य ने गाज़ियाबाद वाले फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसने कुंडी चढ़ाई। धीरे-धीरे अपनी चमड़े की बेल्ट निकाली। फिर नई-नवेली दुल्हन सिया से बोला, “अब तुम्हें सिखाना पड़ेगा कि इस घर की बहू कैसे बनकर रहती है।” सिया वहीं ठिठक गई। उसके हाथ में अभी भी पहाड़ों से लाया हुआ छोटा सूटकेस था। माथे की बिंदी हल्की धुंधली हो चुकी थी। हाथों की मेहंदी अभी पूरी तरह फीकी भी नहीं पड़ी थी। कुछ घंटे पहले तक जो पति हर जगह उसका हाथ थामे घूम रहा था, अब उसी के हाथ में बेल्ट थी। सिया की उम्र 25 वर्ष थी। वह गाज़ियाबाद के एक सरकारी विद्यालय में खेल शिक्षिका थी। बच्चे उसका सम्मान करते थे क्योंकि वह अनुशासन, आत्मविश्वास और आत्मरक्षा की ट्रेनिंग भी देती थी। उसका स्वभाव शांत था। कम बोलती थी। यही कारण था कि लोग अक्सर उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी समझ बैठते थे। लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग थी। सिया का बचपन उत्तराखंड के एक छो...

मन ठीक नहीं है।

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 "नोएडा के उस कमरे से उठता एक सवाल" कुछ खबरें पढ़कर हम आगे बढ़ जाते हैं। कुछ खबरें भीतर कहीं रुक जाती हैं। राकेश मेहता की मौत की खबर भी ऐसी ही है। दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव, 1975 बैच के आईएएस अधिकारी, करीब चार दशक तक प्रशासन में रहे, दिल्ली की व्यवस्था को बहुत करीब से देखा और उसे बनाने में भूमिका निभाई। दिल्ली नगर निगम के आयुक्त रहे, दिल्ली के मुख्य सचिव रहे और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के समय महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। जिन लोगों के साथ उन्होंने काम किया, वे उन्हें एक अनुभवी और प्रभावशाली अधिकारी के रूप में याद करते हैं। लेकिन जीवन के आखिरी दिनों में वे नोएडा के सेक्टर 82 में एक किराये के फ्लैट में अकेले रह रहे थे। 6 सितंबर को वहीं उनकी मौत हुई। पुलिस को एक नोट मिला, जिसमें लंबे समय से चली आ रही बीमारी और स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों का उल्लेख था। पुलिस के मुताबिक उन्होंने किसी को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार नहीं बताया था। उनके परिवार के सदस्य दूसरे शहर और देश में रहते थे। मामले की जांच चल रही है। इन बातों के आगे हमें रुक जाना चाहिए। क्योंकि किसी व्यक्ति के मन में उस आखि...

संदेश माता-पिता को

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 बच्चे बिगड़ नहीं रहे!...उन्हें बिगाड़ने के लिए पूरा बाजार खड़ा है!पूरा व्यापार चल रहा है....... गानों, फिल्मों, वेब सीरीज ,हिंसक वीडियो गेम और सोशल मीडिया पर नशे, हथियार और गुंडागर्दी को हीरो बनाने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। सोशल अकाउंट बंद हों, भारी जुर्माना लगे और अपराध के लिए उकसाने पर जेल भी हो। हर एक स्कूल एक दिन की गैरहाजिरी को भी गंभीरता से लेकर तुरंत परिवार को बताए। बच्चों के सोशल अकाउंट ओर उनके स्कूल बैग चेक हो।बच्चों के लिए रोज खेल का समय अनिवार्य करे। सड़क किसी की रील, रौब या यारी दिखाने की जगह नहीं है। बाइकों पर झुंड बनाकर स्टंट, हूटिंग, रास्ता रोकना और यारी-दोस्ती के नाम पर हुड़दंग सब पर तत्काल लगाम लगे। धार्मिक यात्रा आस्था है, कानून से छुट्टी नहीं। यात्रा किसी भी धर्म की हो।नशा, हथियार, उपद्रव और हिंसा पर रत्तीभर ढील न मिले। जहाँ अवैध हथियार और नशा खुलेआम दिखाई दें, वहाँ सरकार और पुलिस की जवाबदेही तय हो। हाई स्कूलों के बाथरूमों में नशीली दवाइयों के रैपर,सिरिंज,गर्भ निरोधक गोलियां या ओर भी शर्मनाक चीजें मिलती है। जिन्हें देखकर कोई भी दहशत में आ जाए। लेकिन मां बाप दोन...

भूख

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 Hangry (हैंग्री) = भूख से जुड़ा गुस्सा। ब्राह्मण 'हैंग्री' हैं, इसलिए उनके नए देवता भी गुस्से में हैं। जब से ब्राह्मणों ने वैदिक तरीके छोड़े और बनिया प्रभाव में आकर जैन तरीके अपनाए, तब से वे अपना आपा खो रहे हैं। खराब खान-पान की आदतों की वजह से वे अब हिंदू धर्म को 'सनातन धर्म' के तौर पर रीब्रांड कर रहे हैं (इससे उन्हें सिख और जैन वोट मिलते हैं, जबकि पुराने 'हिंदुत्व' ब्रांड से ऐसा नहीं होता था)। आइए, असली हिंदू धर्म की तुलना इस आधुनिक 'हैंग्री सनातन धर्म' से करते हैं... 1. ज़बरदस्त लुक-बदलाव: शांति को अलविदा, मस्कुलर बॉडी को नमस्ते याद है जब भगवान हनुमान को विनम्रता, भक्ति और आंतरिक शक्ति के प्रतीक के तौर पर दिखाया जाता था? उसे भूल जाइए। नया हनुमान ऐसा दिखना चाहिए जैसे कोई जिम-ब्रो हो जिसका क्रिएटिन (creatine) दरवाज़े पर ही चोरी हो गया हो। उनकी आँखें चमकती लाल होनी चाहिए, चेहरे पर हमेशा गुस्से वाली शिकन होनी चाहिए, और उनका अंदाज़ ऐसा हो जैसे कह रहे हों, "मैं इसी पार्किंग लॉट में तुमसे लड़ूँगा।" अगर कोई देवता गुस्से से भरे कॉमिक बुक एंटी-हीरो ज...

दर्द

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 देश में एक नया राष्ट्रीय प्रोग्राम शुरू हुआ है, बिभाजन विभीषिका स्मृति दिवस । दर्द समय के साथ भर जाते हैं। हर घाव को बार-बार कुरेदते रहना ज़रूरी नहीं होता। कई बार भूल जाना ही आगे बढ़ने का सबसे मानवीय तरीका होता है। तमाम परिवारों की पुश्तैनी दुश्मनियाँ तीसरी या चौथी पीढ़ी में जाकर खत्म हो जाती हैं। नई पीढ़ी को अक्सर ठीक-ठीक पता भी नहीं होता कि उनके दादा या परदादा किस बात पर एक-दूसरे के दुश्मन थे। और शायद यही अच्छा है। क्योंकि अगर हर पीढ़ी अपने हिस्से का पुराना हिसाब लेकर बैठ जाए, तो कोई परिवार कभी शांति से नहीं जी पाएगा। देश भी कुछ ऐसा ही होता है। हमारे देश का बँटवारा इस भूगोल पर रहने वाले लोगों के लिए सिर्फ नक्शे की एक लकीर नहीं था। वह एक बहुत गहरा घाव था। लाखों लोग अपने घर, जमीन, रिश्ते और अपनी पूरी पिछली जिंदगी छोड़कर इधर से उधर हुए। बहुतों ने अपने लोगों को खोया। बहुतों ने हिंसा देखी। उस पीड़ा की गहराई को शब्दों में समेटना मुश्किल है। लेकिन समय का काम शायद यही है कि वह सबसे गहरे घाव पर भी धीरे-धीरे नई त्वचा उगा देता है। बँटवारे का विनाश झेलने वाले परिवारों की अब चौथी, पाँचवीं पी...

इसीलिए न पूंजीवाद बेहतर है न साम्यवाद। बेहतर है समाजवाद जो उपरोक्त दोनों में से किसी को बेलगाम नही होने देता

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 तो असल बात यह है: आज अगर आप ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ की आलोचना करें, तो तुरंत आपको "कम्युनिस्ट" करार दिया जाता है। वे इसे नफ़रत से "लेफ्ट विंग" (वामपंथी) कहते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि हिंदू धर्म का मतलब ही पूंजीवाद है। यह एक चालाक चाल है, लेकिन यह गलत है!!!! आइए हिंदू पौराणिक कथाओं के दो सबसे उलझे हुए किरदारों—इंद्र और बलि—के ज़रिए बुनियादी बातों को समझते हैं। इंद्र दक्षिणपंथियों (RW) के पसंदीदा हैं, और बलि वामपंथियों (LW) के। और दोनों ही गलत वजहों से। इंद्र, जो चीज़ों को जमा करने (hoarding) के शौकीन थे। उन्होंने सबकी मदद से क्षीर सागर (दूध का सागर) मथा, लेकिन अच्छी चीज़ें खुद स्वर्ग में रख लीं। सारी दौलत हड़प ली, किसी के साथ कुछ नहीं बांटा, फिर भी ज़िंदगी दुखी रही। क्यों? क्योंकि स्वर्ग ही नरक को जन्म देता है। जब सारा खाना आपके पास हो, तो बाकी दुनिया भूखी मरती है। इसे 'मत्स्य न्याय' कहते हैं—बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। संस्कृत में पूंजीवाद के लिए पहले से ही एक शब्द था, और वह कभी भी तारीफ भरा शब्द नहीं था। मज़ेदार बात यह है कि असल में कोई इंद्र की...

हम जिसे Strong करना हो,उसे आलसी बना दो

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 आपके धंधे आपकी कमाई को सबसे बुरी नजर लगती है आलस की, आप जो भी कर रहे है, अगर आप उस काम में जरा सा भी आलसी हुए,खेल खत्म। चाहे आप बड़ी कंपनी चला रहे हो, देश चला रहे हो या फिर कोई छोटी रेहड़ी। ये भाई सड़क किनारे बिरयानी बेचते है, आप जब भी जायेंगे हमेशा गर्म बिरयानी मिलेगी, एक देग खाली होता रहता है तो दूसरे देग की तैयारी चलती रहती है उसी टाइम में,जब तक पहला देग खाली होगा, तब तक दूसरा देग तैयार। चार या पांच साल में ये इंसान कही किसी बढ़िया दुकान में शिफ्ट हो लेगा,और इसके आस पास के ठेले वालो की पीढ़िया इसी सड़क पर जीवन गुजार देंगी,और मै ऐसा गुस्सा या बददुआ कि नीयत से नहीं कह रहा हू, कारण है। सबसे पहले समझते है कि ये बिरयानी वाला क्यू आगे बढ़ेगा अपनी जिंदगी में,सबसे बड़ी वजह ये है,बंदा आलस नहीं करता है। कभी कभी कुछ देर के लिए जब दुकानदार शांत होती है,तो ये अपने ही देग की बिरयानी लेकर बैठ जाता है,खाता नहीं टेस्ट करता है। फिर चटनी, रायता धीरे धीरे सबका नंबर आता है।रायता या चटनी कोई खास नहीं है इसकी,मतलब ठीक ठाक ही, मजेदार जो है वो है इस भाई कर परोसने का तरीका।क्योंकि भाई बस दुकानदारी शांत ...