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हमारे जाने के बाद

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 हमारे जाने के 100 साल बाद शायद किसी को हमारा नाम भी याद नहीं रहेगा... तो फिर इतनी भागदौड़ किसलिए? दोस्त, आज से 100 साल बाद हम इस दुनिया में नहीं होंगे। हम अपने अपनों के साथ मिट्टी में सो चुके होंगे। जिस घर को बनाने के लिए हमने दिन-रात मेहनत की... कितनी कुर्बानियाँ दीं... कितनी रातें जागकर काम किया... उसी घर में तब कुछ और लोग रह रहे होंगे। आज जिन चीज़ों को हम "ये मेरा है" कहकर दिल से लगाते हैं, वे सब किसी और के पास होंगी। हमारी अगली पीढ़ी... शायद हमारा नाम भी ठीक से याद न रख पाए। हम में से कितने लोग अपने परदादा या उनके पिता का नाम जानते हैं? हमारे जाने के बाद कुछ साल लोग हमें याद करेंगे... फोटो देखेंगे... बातें करेंगे... लेकिन धीरे-धीरे सब धुंधला हो जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे अस्तित्व का कोई निशान भी नहीं बचेगा। तब सवाल उठता है - हम इतना क्यों लड़ते हैं? इतना अहंकार किसलिए? इतनी चिंता, तनाव और प्रतिस्पर्धा क्यों? हम "सब कुछ पाने" की दौड़ में लगे रहते हैं... लेकिन क्या सच में वही सबसे ज़रूरी है? कितनी बार हमने घूमने का प्लान टाल दिया? कितनी बार माँ-बाप को गले लग...

दस ग्राम श्मशान साथ ले आना चाहिए।

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आपने कभी चिता जलते देखी है ? चिता पूरी तरह से जलने में ढाई से तीन घंटे का समय लगता है, यह समय मृत शरीर के वजन, उपयोग की गई लकड़ियों की मात्रा, प्रयोग की गई सामग्री घी आदि और मौसम की स्थिति पर भी निर्भर कर सकता है। शुरुआती समय में चिता के आसपास व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अनुसार भीड़ मौजूद रहती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे भीड़ कम होती चली जाती है, लोग अपनी उपस्थिति लगाकर अपना चेहरा दिखाकर जाते रहते हैं, अगर अंतिम संस्कार के लिए कई लोग एक साथ किसी दूर के स्थान से, एक ही वाहन (गाड़ी) से आएं हैं तो ऐसे में लोग उपस्थित रहते हैं, क्योंकि उनके पास वापस जाने का कोई साधन नहीं होता, वरना अंत के दस-पंद्रह मिनट तक मुश्किल से तीन-चार लोग ही श्मशान घाट में बचते हैं। अंतिम तीन-चार लोग वो होते हैं जो उस मृत व्यक्ति के एकदम करीबी होते हैं यानी उसका पुत्र, पुत्र ना होने की स्थिति में वह व्यक्ति जो अंतिम संस्कार कर रहा होता है, उसके सगे संबंधी उसके भाई उसके अन्य परिवार के लोग, या फिर वो लोग जिनका उन उपस्थित लोगों से निकटतम संबंध (स्वार्थ) होता है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो जिसका मृत व्यक्...

मर्द

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 ये जो 2014, अतीक और नोटबंदी वाली कान्ट्रवर्सी है, ये एक न्यूक्लियर ब्लास्ट जैसा है।  इसके शुरुआती रेडीअस में जो आयेगा वो भस्म और वाष्प होगा। हड्डियाँ भी न मिलेंगी। लेकिन जब डस्ट सैटल होगी, तब धुरंधर 2 एक नई कान्ट्रवर्सी लेकर आयेगी। इसमें हार्ड कोर सूडो फेमनिस्ट्स की तरफ विलाप का शोर सुनाई देगा। क्योंकि धुरंधर की हिरोइन के पास वाकई में कुछ खास स्क्रीनटाइम नहीं है। पिछली वाली हिरोइन – उलफ़त उर्फ सौम्या टंडन भी – एक थप्पड़ मारने की मशीन भर रह गई हैं। इसके इतर किस फ़ीमेल किरदार के पास स्ट्रॉंग स्क्रीनटाइम है धुरंधर में? जवाब है कोई नहीं।  पर स्क्रीनटाइम से इतर, धुरंधर की फ़ीमेल के पास स्ट्रॉंग कैरेक्टर ज़रूर है। पाक्सतां जैसे हार्डकोर पैट्रीआर्क देश में भी एक ऐसी कन्या दिखाई गई है जो अपनी मर्ज़ी से जीती है, अपनी मर्ज़ी से शादी करती है, अपनी इच्छा से माफ़ करती है, मना करने के बावजूद वो सवाल करती है, जवाब माँगती है और सारे लॉजिक्स से खुद को परे करके, अपने प्रेमी की ढेर सारी फ़िक्र करती है।  इसके बावजूद आप कह सकते हैं कि इसने बच्चे पैदा करने के सिवा किया ही क्या है?  पर जनाब य...

प्रधानाचार्य

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 विद्यालय का प्रधानाचार्य “मिलनसार दिखने” के दबाव में यदि अपनी निर्णय क्षमता खो देता है, तो वह धीरे-धीरे नेतृत्व नहीं, बल्कि प्रभावों का शिकार बन जाता है। यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच यही है कि एक प्रधानाचार्य का काम सभी को खुश रखना नहीं, बल्कि सही और न्यायपूर्ण निर्णय लेना है। और यह निर्णय मित्रता, दबाव या अफवाहों के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्य, प्रमाण और विवेक के आधार पर ही संभव है। यह धारणा कि प्रधानाचार्य को हर समय मित्रवत होना चाहिए, शिक्षा के पेशेवर ढाँचे को कमजोर करती है। एक शिक्षक और प्रधानाचार्य के बीच संबंध सम्मान और स्पष्टता का होना चाहिए, न कि अनावश्यक घुलने-मिलने का। अत्यधिक मित्रता कई बार निर्णयों की निष्पक्षता को प्रभावित करती है, जिससे न केवल व्यवस्था बिगड़ती है बल्कि कार्यसंस्कृति भी प्रभावित होती है। इसलिए प्रधानाचार्य का सख्त होना कोई नकारात्मक गुण नहीं, बल्कि एक आवश्यक पेशेवर विशेषता है—बशर्ते उसमें संवेदनशीलता और न्याय का संतुलन भी मौजूद हो। निर्णय प्रक्रिया की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि वह कितनी प्रमाण आधारित है। विद्यालय में हर दिन अनेक शिकायतें, सुझाव और आरोप ...

जब कुर्सी रह जाती है, दिमाग चला जाता है

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  ————————————————— बचपन से एक बात समझाई गई थी कि किसी भी काम को करने के लिए सबसे जरूरी चीज दिमाग है। शरीर थक जाए तो आदमी आराम कर सकता है। उम्र ज्यादा हो जाए तो आदमी धीमा चल सकता है। लेकिन अगर दिमाग साथ छोड़ दे तो आदमी खुद भी खतरे में होता है और उसके भरोसे बैठे लोग भी। बचपन में यह बात सिर्फ घर की लगती थी। बड़ा हुआ तो समझ में आया कि यह सिर्फ घर की नहीं, पूरे देश की भी बात है। कुछ दिन पहले एक डॉक्टर मित्र बता रहे थे कि डिमेंशिया नाम की बीमारी बड़ी अजीब होती है। आदमी चलता फिरता रहता है, बोलता भी रहता है। कभी-कभी तो बिल्कुल सामान्य लगता है। लेकिन धीरे धीरे उसकी स्मृति कमजोर होने लगती है। उसे याद नहीं रहता कि उसने अभी क्या कहा, क्या किया, किससे मिला। वह एक ही बात बार-बार दोहराने लगता है। फैसले गड़बड़ होने लगते हैं। डॉक्टर ने कहा कि परिवारों में यह बीमारी बड़ी कठिन स्थिति पैदा कर देती है। घर के लोग समझ जाते हैं कि अब बुजुर्ग को आराम देना चाहिए। गाड़ी की चाबी उनसे ले ली जाती है। बैंक का काम बेटा या बेटी संभाल लेते हैं। धीरे धीरे जिम्मेदारियां बदल जाती हैं। यानी परिवार मान लेता है कि अब नि...

अकेले खाता है वह चोर है।

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 आप किसी भी शहर में जाएं, किसी भी गाँव-खेड़े में हों, वहां सुबह के समय होटल में नाश्ता करने वालों की भीड़ दिख जाएगी. जलेबी, समोसा, आलूबड़ा, पकोड़ा, पोहा, पूरी-सब्जी और गर्म चाय लेते हुए लोग आपको हर जगह दिखाई देंगे. इनमें ९९% पुरुष दिखाई पड़ेंगे आपको. ये पुरुष सुबह के वक्त नहा कर या बिना नहाए ही घर से बाहर इस नाश्ते का आनंद लेते दूकान के बाहर भीड़ लगाकर या टेबल-कुर्सियों पर आसीन होकर अवश्य मिलेंगे.  मेरे मन में यह प्रश्न कई वर्षों से उठ रहा है कि इस भीड़ में घर की महिलाएं क्यों नहीं दिखाई पड़ती? क्या वे इस समय अपने घरेलू काम में व्यस्त रहती हैं? या, उन्हें सुबह नाश्ता करने की ज़रुरत महसूस नहीं होती, या, उनके पति, भाई या देवर उन्हें अपने साथ लेकर बाहर नहीं निकलते? कुछ पुरुषों का यह गोपनीय कार्यक्रम लगभग रोज चलता है, शायद ही वे अपने घर में बताते होंगे कि उन्होंने बाहर का नाश्ता लिया है.   मान लिया जाए कि किसी कारण से घर की महिलाएं नहीं निकल पायी तो क्या उनके लिए नाश्ता पैक करके ले जाया जाता है? उत्तर है, '(लगभग) नहीं.' मैं बचपन से हलवाई के धंधे से जुड़ा हुआ हूँ, मैंने करीब से देख...

अच्छा नहीं लगता बुढ़ापा पिता पर।

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 पिता पर बुढ़ापा अच्छा नहीं लगता हर किसी के आगे हाथ जोड़ देना अरे साहब, अरे साहब कहकर बातें करना जिससे अच्छे से बात करना चाहिए, झिड़कना उसे खामखाँ बेमतलब के आदमी से घंटों बातें करना खाँसते हुए ज़िद पर अड़ेंगे, हर एक काम ख़ुद करेंगे वश का नहीं जो उनके, करेंगे उसे ही सबसे पहले तिस पर लोगों का यह कहना— ''अरे भई बुढ़ापा है, उलझो मत'', बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता पिता बुढ़ापे में अच्छे नहीं लगते या शायद अच्छा नहीं लगता बुढ़ापा पिता पर।