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भूख

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 Hangry (हैंग्री) = भूख से जुड़ा गुस्सा। ब्राह्मण 'हैंग्री' हैं, इसलिए उनके नए देवता भी गुस्से में हैं। जब से ब्राह्मणों ने वैदिक तरीके छोड़े और बनिया प्रभाव में आकर जैन तरीके अपनाए, तब से वे अपना आपा खो रहे हैं। खराब खान-पान की आदतों की वजह से वे अब हिंदू धर्म को 'सनातन धर्म' के तौर पर रीब्रांड कर रहे हैं (इससे उन्हें सिख और जैन वोट मिलते हैं, जबकि पुराने 'हिंदुत्व' ब्रांड से ऐसा नहीं होता था)। आइए, असली हिंदू धर्म की तुलना इस आधुनिक 'हैंग्री सनातन धर्म' से करते हैं... 1. ज़बरदस्त लुक-बदलाव: शांति को अलविदा, मस्कुलर बॉडी को नमस्ते याद है जब भगवान हनुमान को विनम्रता, भक्ति और आंतरिक शक्ति के प्रतीक के तौर पर दिखाया जाता था? उसे भूल जाइए। नया हनुमान ऐसा दिखना चाहिए जैसे कोई जिम-ब्रो हो जिसका क्रिएटिन (creatine) दरवाज़े पर ही चोरी हो गया हो। उनकी आँखें चमकती लाल होनी चाहिए, चेहरे पर हमेशा गुस्से वाली शिकन होनी चाहिए, और उनका अंदाज़ ऐसा हो जैसे कह रहे हों, "मैं इसी पार्किंग लॉट में तुमसे लड़ूँगा।" अगर कोई देवता गुस्से से भरे कॉमिक बुक एंटी-हीरो ज...

दर्द

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 देश में एक नया राष्ट्रीय प्रोग्राम शुरू हुआ है, बिभाजन विभीषिका स्मृति दिवस । दर्द समय के साथ भर जाते हैं। हर घाव को बार-बार कुरेदते रहना ज़रूरी नहीं होता। कई बार भूल जाना ही आगे बढ़ने का सबसे मानवीय तरीका होता है। तमाम परिवारों की पुश्तैनी दुश्मनियाँ तीसरी या चौथी पीढ़ी में जाकर खत्म हो जाती हैं। नई पीढ़ी को अक्सर ठीक-ठीक पता भी नहीं होता कि उनके दादा या परदादा किस बात पर एक-दूसरे के दुश्मन थे। और शायद यही अच्छा है। क्योंकि अगर हर पीढ़ी अपने हिस्से का पुराना हिसाब लेकर बैठ जाए, तो कोई परिवार कभी शांति से नहीं जी पाएगा। देश भी कुछ ऐसा ही होता है। हमारे देश का बँटवारा इस भूगोल पर रहने वाले लोगों के लिए सिर्फ नक्शे की एक लकीर नहीं था। वह एक बहुत गहरा घाव था। लाखों लोग अपने घर, जमीन, रिश्ते और अपनी पूरी पिछली जिंदगी छोड़कर इधर से उधर हुए। बहुतों ने अपने लोगों को खोया। बहुतों ने हिंसा देखी। उस पीड़ा की गहराई को शब्दों में समेटना मुश्किल है। लेकिन समय का काम शायद यही है कि वह सबसे गहरे घाव पर भी धीरे-धीरे नई त्वचा उगा देता है। बँटवारे का विनाश झेलने वाले परिवारों की अब चौथी, पाँचवीं पी...

इसीलिए न पूंजीवाद बेहतर है न साम्यवाद। बेहतर है समाजवाद जो उपरोक्त दोनों में से किसी को बेलगाम नही होने देता

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 तो असल बात यह है: आज अगर आप ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ की आलोचना करें, तो तुरंत आपको "कम्युनिस्ट" करार दिया जाता है। वे इसे नफ़रत से "लेफ्ट विंग" (वामपंथी) कहते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि हिंदू धर्म का मतलब ही पूंजीवाद है। यह एक चालाक चाल है, लेकिन यह गलत है!!!! आइए हिंदू पौराणिक कथाओं के दो सबसे उलझे हुए किरदारों—इंद्र और बलि—के ज़रिए बुनियादी बातों को समझते हैं। इंद्र दक्षिणपंथियों (RW) के पसंदीदा हैं, और बलि वामपंथियों (LW) के। और दोनों ही गलत वजहों से। इंद्र, जो चीज़ों को जमा करने (hoarding) के शौकीन थे। उन्होंने सबकी मदद से क्षीर सागर (दूध का सागर) मथा, लेकिन अच्छी चीज़ें खुद स्वर्ग में रख लीं। सारी दौलत हड़प ली, किसी के साथ कुछ नहीं बांटा, फिर भी ज़िंदगी दुखी रही। क्यों? क्योंकि स्वर्ग ही नरक को जन्म देता है। जब सारा खाना आपके पास हो, तो बाकी दुनिया भूखी मरती है। इसे 'मत्स्य न्याय' कहते हैं—बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। संस्कृत में पूंजीवाद के लिए पहले से ही एक शब्द था, और वह कभी भी तारीफ भरा शब्द नहीं था। मज़ेदार बात यह है कि असल में कोई इंद्र की...

हम जिसे Strong करना हो,उसे आलसी बना दो

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 आपके धंधे आपकी कमाई को सबसे बुरी नजर लगती है आलस की, आप जो भी कर रहे है, अगर आप उस काम में जरा सा भी आलसी हुए,खेल खत्म। चाहे आप बड़ी कंपनी चला रहे हो, देश चला रहे हो या फिर कोई छोटी रेहड़ी। ये भाई सड़क किनारे बिरयानी बेचते है, आप जब भी जायेंगे हमेशा गर्म बिरयानी मिलेगी, एक देग खाली होता रहता है तो दूसरे देग की तैयारी चलती रहती है उसी टाइम में,जब तक पहला देग खाली होगा, तब तक दूसरा देग तैयार। चार या पांच साल में ये इंसान कही किसी बढ़िया दुकान में शिफ्ट हो लेगा,और इसके आस पास के ठेले वालो की पीढ़िया इसी सड़क पर जीवन गुजार देंगी,और मै ऐसा गुस्सा या बददुआ कि नीयत से नहीं कह रहा हू, कारण है। सबसे पहले समझते है कि ये बिरयानी वाला क्यू आगे बढ़ेगा अपनी जिंदगी में,सबसे बड़ी वजह ये है,बंदा आलस नहीं करता है। कभी कभी कुछ देर के लिए जब दुकानदार शांत होती है,तो ये अपने ही देग की बिरयानी लेकर बैठ जाता है,खाता नहीं टेस्ट करता है। फिर चटनी, रायता धीरे धीरे सबका नंबर आता है।रायता या चटनी कोई खास नहीं है इसकी,मतलब ठीक ठाक ही, मजेदार जो है वो है इस भाई कर परोसने का तरीका।क्योंकि भाई बस दुकानदारी शांत ...

ढाई हजार साल पुरानी कही बात जो आज बेहद प्रासंगिक है

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 महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था- "बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहने की कोशिश, कई बार उन्हें आपसे दूर कर देती है।" यह वाक्य सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन जीवन के लंबे अनुभवों से छनकर निकला एक गहरा सत्य है। कहानी है ली वेई नाम के एक वृद्ध व्यक्ति की। उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात मेहनत की, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा, अपने सपनों को छोटा किया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, अपने परिवार और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए, तो ली वेई ने सोचा कि अब जीवन की संध्या उनके बीच प्रेम और अपनत्व में बीतेगी। उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के साथ रहने चला गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि भरे हुए घर में भी उसके हिस्से का एकांत बढ़ता जा रहा है। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे, बहू अपनी जिम्मेदारियों में, पोते-पोतियाँ अपनी दुनिया में। उसकी बातें आधी सुनी जातीं, उसके सुझाव अनचाही सलाह लगने लगे और उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे एक आवश्यकता से अधिक एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जैसी महसूस होने लगी। वह जितना निकट आ...

मजदूर बिरादरी मन ही मन खुद को मालिक से ज्यादा बुद्धिमान समझती है .

 इस देश का गरीब 70 % से ज्यादा चालबाज, धूर्त,झूठा बहानेखोर और मुफ्तखोर और दारूबाज है।जो 30 % सही है वो मेहनत करते है,ईमानदारी से धीरे धीरे बढ़ते है और एक आध पीढ़ी के बाद गरीबी से निकलकर मिडल क्लास में प्रेवश कर देते है।आपने देखा भी होगा अपने आसपास कैसे ना कैसे बच्चे पढ़ाये और फिर सब जॉब लगे और आज जो गरीब था वो खुश है लेकिन जो किसी के पैसे मारते थे,झूठ बोलते थे।मक्कारी करते थे वो वही है आज भी 100 ,200 रुपये मांगते है। मैंने मेरी सोसायटी में कचरे वाले को 500 रुपये अलग से दिये कि भाई तेरी वाइफ पीछे कचरा बीनती है उसके हाथ मे कुछ लग जायेगा। उसके लिए कुछ गलाउज ले लेना और कुछ मास्क । खत्म हो जाये तो बोलना मैं फिर दे दूंगा। कुछ दिन बाद उसकी वाइफ को बिना गलाउज के देखा और पूछा तो बोली साहब ये दारू पी गया। 15 से 20 हजार की नोकरी वाले अपने मालिक से एक सॅलरी एडवांस में हमेशा उधार मांग के रखेंगे और मांगते ही रहेंगे और अगला जैसे ही मांगेगा जॉब चेंज कर देंगे। ट्रांसपोर्ट वाले के ट्रक को बीच मे छोड़कर चले जायेंगे या पीकर ठोक देंगे। उसमे गन्दा डीजल भरके ,अपने 200 रुपये के लिये उसके 40 लाख की ऐसी तैसी क...

मोहनजोदड़ो

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 एक लड़की अचानक ऐसी भाषा बोलने लगी जो हजारों साल पुरानी थी 1. वो मंगलवार 12 अगस्त 2025। सावन का महीना।  वाराणसी के अस्सी घाट के पास, गली में रहने वाला तिवारी परिवार। पंडित शंभू तिवारी, 50 साल, संस्कृत के टीचर। पत्नी उमा, 46 साल, गृहिणी। बेटी अनन्या, 17 साल, 12वीं में थी। सीधी-सादी, टॉप करने वाली लड़की। भरतनाट्यम सीखती थी।  मंगलवार की सुबह 6 बजे अनन्या रोज़ की तरह रियाज़ कर रही थी। माँ ने चाय के लिए आवाज़ दी। "अनन्या बेटा, नीचे आ जा।" अनन्या सीढ़ियों से उतरी। पर चेहरा बदला हुआ था। आँखें लाल। होंठ सूखे।  उमा ने पूछा, "क्या हुआ बेटा? तबियत ठीक नहीं?" अनन्या ने उमा को देखा। और बोलना शुरू किया।  पर वो आवाज़ अनन्या की नहीं थी। भारी, गूँजती हुई। और भाषा हिंदी नहीं थी। संस्कृत भी नहीं। कोई और।  "अहम् जागृतास्मि। कः कालः? कुत्र अस्मि?" उमा के हाथ से चाय गिर गई। "हे भगवान! ये क्या बोल रही है?" शंभू भागे आए। संस्कृत के प्रोफेसर थे। पर ये संस्कृत नहीं थी। कुछ शब्द मिलते जुलते थे, पर व्याकरण अलग। उच्चारण अलग।  अनन्या लगातार बोल रही थी। आँखें बंद। हाथ की मुद्र...