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जब कुर्सी रह जाती है, दिमाग चला जाता है

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  ————————————————— बचपन से एक बात समझाई गई थी कि किसी भी काम को करने के लिए सबसे जरूरी चीज दिमाग है। शरीर थक जाए तो आदमी आराम कर सकता है। उम्र ज्यादा हो जाए तो आदमी धीमा चल सकता है। लेकिन अगर दिमाग साथ छोड़ दे तो आदमी खुद भी खतरे में होता है और उसके भरोसे बैठे लोग भी। बचपन में यह बात सिर्फ घर की लगती थी। बड़ा हुआ तो समझ में आया कि यह सिर्फ घर की नहीं, पूरे देश की भी बात है। कुछ दिन पहले एक डॉक्टर मित्र बता रहे थे कि डिमेंशिया नाम की बीमारी बड़ी अजीब होती है। आदमी चलता फिरता रहता है, बोलता भी रहता है। कभी-कभी तो बिल्कुल सामान्य लगता है। लेकिन धीरे धीरे उसकी स्मृति कमजोर होने लगती है। उसे याद नहीं रहता कि उसने अभी क्या कहा, क्या किया, किससे मिला। वह एक ही बात बार-बार दोहराने लगता है। फैसले गड़बड़ होने लगते हैं। डॉक्टर ने कहा कि परिवारों में यह बीमारी बड़ी कठिन स्थिति पैदा कर देती है। घर के लोग समझ जाते हैं कि अब बुजुर्ग को आराम देना चाहिए। गाड़ी की चाबी उनसे ले ली जाती है। बैंक का काम बेटा या बेटी संभाल लेते हैं। धीरे धीरे जिम्मेदारियां बदल जाती हैं। यानी परिवार मान लेता है कि अब नि...

अकेले खाता है वह चोर है।

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 आप किसी भी शहर में जाएं, किसी भी गाँव-खेड़े में हों, वहां सुबह के समय होटल में नाश्ता करने वालों की भीड़ दिख जाएगी. जलेबी, समोसा, आलूबड़ा, पकोड़ा, पोहा, पूरी-सब्जी और गर्म चाय लेते हुए लोग आपको हर जगह दिखाई देंगे. इनमें ९९% पुरुष दिखाई पड़ेंगे आपको. ये पुरुष सुबह के वक्त नहा कर या बिना नहाए ही घर से बाहर इस नाश्ते का आनंद लेते दूकान के बाहर भीड़ लगाकर या टेबल-कुर्सियों पर आसीन होकर अवश्य मिलेंगे.  मेरे मन में यह प्रश्न कई वर्षों से उठ रहा है कि इस भीड़ में घर की महिलाएं क्यों नहीं दिखाई पड़ती? क्या वे इस समय अपने घरेलू काम में व्यस्त रहती हैं? या, उन्हें सुबह नाश्ता करने की ज़रुरत महसूस नहीं होती, या, उनके पति, भाई या देवर उन्हें अपने साथ लेकर बाहर नहीं निकलते? कुछ पुरुषों का यह गोपनीय कार्यक्रम लगभग रोज चलता है, शायद ही वे अपने घर में बताते होंगे कि उन्होंने बाहर का नाश्ता लिया है.   मान लिया जाए कि किसी कारण से घर की महिलाएं नहीं निकल पायी तो क्या उनके लिए नाश्ता पैक करके ले जाया जाता है? उत्तर है, '(लगभग) नहीं.' मैं बचपन से हलवाई के धंधे से जुड़ा हुआ हूँ, मैंने करीब से देख...

अच्छा नहीं लगता बुढ़ापा पिता पर।

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 पिता पर बुढ़ापा अच्छा नहीं लगता हर किसी के आगे हाथ जोड़ देना अरे साहब, अरे साहब कहकर बातें करना जिससे अच्छे से बात करना चाहिए, झिड़कना उसे खामखाँ बेमतलब के आदमी से घंटों बातें करना खाँसते हुए ज़िद पर अड़ेंगे, हर एक काम ख़ुद करेंगे वश का नहीं जो उनके, करेंगे उसे ही सबसे पहले तिस पर लोगों का यह कहना— ''अरे भई बुढ़ापा है, उलझो मत'', बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता पिता बुढ़ापे में अच्छे नहीं लगते या शायद अच्छा नहीं लगता बुढ़ापा पिता पर।

अहंकार की वर्दी और स्वाभिमान का सैल्यूट: एक अनकही दास्तान...!!

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 दरोगा पत्नी ने बेरोज़गार पति को अपमानित किया 5 मिनट बाद SP आए और सैल्यूट किया पूरा थाना सन्न रह गया...!! मधुपुर गाँव में सुबह की शुरुआत मिठाई की दुकान से उठने वाली इलायची और केसर की खुशबू से होती थी। राघव, एक साधारण कद-काठी का युवक, जिसके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, अपने पिता मोहन साहब की मदद करता था। राघव केवल एक हलवाई का बेटा नहीं था, वह गाँव की उम्मीद था। यूपीएससी (UPSC) की तैयारी के लिए जब वह दिल्ली गया, तो उसके पास जेब में कम और आँखों में सपने ज्यादा थे...!! दिल्ली के मुखर्जी नगर की एक छोटी सी कोठरी में राघव ने सात साल बिताए। वहीं उसकी मुलाकात अभिषेक से हुई। अभिषेक के पास प्रतिभा थी, लेकिन संसाधन नहीं। राघव अक्सर अपनी रातों की नींद और ट्यूशन के पैसे अभिषेक की फीस के लिए दे देता था। वह कहता, “दोस्त, आज तू पढ़ ले, कल जब तू अफसर बनेगा तो देश का भला होगा।” राघव का खुद का चयन नहीं हुआ, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। वह मधुपुर लौटा ताकि अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बन सके...!! गाँव लौटने के बाद राघव की शादी निधि से हुई। निधि एक महत्वाकांक्षी लड़की थी। शादी के ही दिन जब...

हम आपको ज़बरदस्ती रंग नहीं लगाएंगे

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 ये कौन से देवर-भाभी हैं  जिनके बीच में अवैध संबंध हैं? अखबारों में  न्यूज़ पर  यू ट्यूब पर  इंस्टाग्राम पर किन देवरों और भाभियों की वीडियोज़ हैं? जिन्हें चटखारे लेकर देखते हैं  हमारे घरों के  छोटे-छोटे बच्चे  स्खलित हो जाते हैं  आयु से पहले ही  इतने उत्तेजित हो जाते हैं  कि टूट पड़ते हैं सगी बहनों पर!  --- कितनी रंगीन थीं हमारी होलियाँ  देवर रंग लेकर भागते थे  भाभियों के पीछे  भाभियाँ छुप जाती थीं  नहानघरों में  कमरों में  रसोइयों में  हम खिड़की की जाली के भीतर से फेंक देते थे  पानी में घुला हुआ कोढ़िया रंग  घर के बुजुर्ग डांटते थे हमें  वही रंगी हुई भाभियाँ  परोसती थीं हमें  गुझिया, भुजिया, चाय और शरबत   कहाँ गए वे देवर?  क्या वे देवर आज भी कहीं-कहीं मौजूद हैं?  --- भाभियाँ जानती थीं  देवरों ने शराब पी रखी है  या गांजा  या भांग  या अफीम  या डोडा  या अमल  लेकिन भाभियों को भरोसा था देवरों पर  देवर  गाल रंग देत...

पुस्तकालय

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 अपने घर में पुस्तकालय अवश्य बनाएं — यह आज के डिजिटल युग में भी सबसे स्मार्ट और फायदेमंद फैसलों में से एक है। घर में पुस्तकालय बनाने के प्रमुख फायदे ज्ञान और सीखने की आदत — किताबें हमेशा हाथ के पास रहती हैं, जिससे पढ़ने की आदत बनती है। बच्चे और बड़े दोनों में जिज्ञासा बढ़ती है और लाइफलॉन्ग लर्निंग की शुरुआत होती है। एकाग्रता और शांति — यह एक ऐसा कोना बन जाता है जहाँ मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया से दूर जाकर फोकस के साथ पढ़ाई या किताब पढ़ी जा सकती है। परिवार का बंधन मजबूत — माता-पिता बच्चों के साथ बैठकर पढ़ें तो परिवार में अच्छी बातचीत बढ़ती है और स्क्रीन टाइम कम होता है। घर की खूबसूरती और वैल्यू — अच्छी तरह सजा हुआ पुस्तकालय घर को आकर्षक बनाता है और रियल एस्टेट वैल्यू भी बढ़ा सकता है। तनाव कम करने वाला स्पेस — किताबों से घिरा माहौल मन को सुकून देता है, रिचार्ज होने का बेहतरीन तरीका है। पैसे की बचत — बार-बार नई किताबें खरीदने की बजाय पहले से संग्रहित किताबें दोबारा पढ़ी जा सकती हैं। घर में पुस्तकालय कैसे बनाएं (कम खर्च और कम जगह में भी) जगह चुनें — बेडरूम का एक कोना, लिविंग रूम की दीवा...

इश्तेहार

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 अंग्रेज सरकार की तरफ़ से सेना में भर्ती के लिए जारी किया गया यह इश्तेहार उस दौर की हकीकत बयान करता है, जब युवाओं को लालच, इनाम और “इज़्ज़त” के नाम पर फौज में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया जाता था। 🇮🇳📜 इस तस्वीर में एक व्यक्ति की फौज में भर्ती होने से पहले और बाद की स्थिति दिखाकर यह समझाने की कोशिश की गई है कि सेना में जाना तरक़्क़ी और सम्मान का रास्ता है। 🗣️ इश्तेहार में लिखा गया है: “भाइयों जल्दी चलो, दौड़ो वरना पछताओगे… सरकार बहादुर ने पचास रुपया इनाम के बजाय अब पैंसठ रुपया इनाम कर दिया है। दस रुपया भर्ती होने पर, 40 रुपया पलटन पहुँचने पर और 15 रुपया कवायद पास करने पर मिलेगा। ग्यारह रुपया माहवार तनख्वाह के अलावा हर छह महीने पर 25 रुपया ‘ज़माना-ए-लड़ाई’ के लिए मिलेगा। लाम (मोर्चे) पर जाने पर पाँच रुपया माहवार भत्ता और दिया जाएगा। कपड़ा और खाना हर हालत में मुफ़्त मिलेगा…” 📌 भर्ती की शर्तें: उम्र 18 से 30 साल, क़द 5 फ़ीट 2 इंच, सीना 32 इंच। पैदल पलटन और तोपखाने के लिए अलग-अलग जातियों का उल्लेख भी किया गया है। यह इश्तेहार उस समय की सामाजिक बनावट, आर्थिक हालात और औपनिवेशिक नीत...