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हम जिसे Strong करना हो,उसे आलसी बना दो

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 आपके धंधे आपकी कमाई को सबसे बुरी नजर लगती है आलस की, आप जो भी कर रहे है, अगर आप उस काम में जरा सा भी आलसी हुए,खेल खत्म। चाहे आप बड़ी कंपनी चला रहे हो, देश चला रहे हो या फिर कोई छोटी रेहड़ी। ये भाई सड़क किनारे बिरयानी बेचते है, आप जब भी जायेंगे हमेशा गर्म बिरयानी मिलेगी, एक देग खाली होता रहता है तो दूसरे देग की तैयारी चलती रहती है उसी टाइम में,जब तक पहला देग खाली होगा, तब तक दूसरा देग तैयार। चार या पांच साल में ये इंसान कही किसी बढ़िया दुकान में शिफ्ट हो लेगा,और इसके आस पास के ठेले वालो की पीढ़िया इसी सड़क पर जीवन गुजार देंगी,और मै ऐसा गुस्सा या बददुआ कि नीयत से नहीं कह रहा हू, कारण है। सबसे पहले समझते है कि ये बिरयानी वाला क्यू आगे बढ़ेगा अपनी जिंदगी में,सबसे बड़ी वजह ये है,बंदा आलस नहीं करता है। कभी कभी कुछ देर के लिए जब दुकानदार शांत होती है,तो ये अपने ही देग की बिरयानी लेकर बैठ जाता है,खाता नहीं टेस्ट करता है। फिर चटनी, रायता धीरे धीरे सबका नंबर आता है।रायता या चटनी कोई खास नहीं है इसकी,मतलब ठीक ठाक ही, मजेदार जो है वो है इस भाई कर परोसने का तरीका।क्योंकि भाई बस दुकानदारी शांत ...

ढाई हजार साल पुरानी कही बात जो आज बेहद प्रासंगिक है

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 महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था- "बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहने की कोशिश, कई बार उन्हें आपसे दूर कर देती है।" यह वाक्य सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन जीवन के लंबे अनुभवों से छनकर निकला एक गहरा सत्य है। कहानी है ली वेई नाम के एक वृद्ध व्यक्ति की। उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात मेहनत की, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा, अपने सपनों को छोटा किया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, अपने परिवार और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए, तो ली वेई ने सोचा कि अब जीवन की संध्या उनके बीच प्रेम और अपनत्व में बीतेगी। उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के साथ रहने चला गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि भरे हुए घर में भी उसके हिस्से का एकांत बढ़ता जा रहा है। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे, बहू अपनी जिम्मेदारियों में, पोते-पोतियाँ अपनी दुनिया में। उसकी बातें आधी सुनी जातीं, उसके सुझाव अनचाही सलाह लगने लगे और उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे एक आवश्यकता से अधिक एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जैसी महसूस होने लगी। वह जितना निकट आ...

मजदूर बिरादरी मन ही मन खुद को मालिक से ज्यादा बुद्धिमान समझती है .

 इस देश का गरीब 70 % से ज्यादा चालबाज, धूर्त,झूठा बहानेखोर और मुफ्तखोर और दारूबाज है।जो 30 % सही है वो मेहनत करते है,ईमानदारी से धीरे धीरे बढ़ते है और एक आध पीढ़ी के बाद गरीबी से निकलकर मिडल क्लास में प्रेवश कर देते है।आपने देखा भी होगा अपने आसपास कैसे ना कैसे बच्चे पढ़ाये और फिर सब जॉब लगे और आज जो गरीब था वो खुश है लेकिन जो किसी के पैसे मारते थे,झूठ बोलते थे।मक्कारी करते थे वो वही है आज भी 100 ,200 रुपये मांगते है। मैंने मेरी सोसायटी में कचरे वाले को 500 रुपये अलग से दिये कि भाई तेरी वाइफ पीछे कचरा बीनती है उसके हाथ मे कुछ लग जायेगा। उसके लिए कुछ गलाउज ले लेना और कुछ मास्क । खत्म हो जाये तो बोलना मैं फिर दे दूंगा। कुछ दिन बाद उसकी वाइफ को बिना गलाउज के देखा और पूछा तो बोली साहब ये दारू पी गया। 15 से 20 हजार की नोकरी वाले अपने मालिक से एक सॅलरी एडवांस में हमेशा उधार मांग के रखेंगे और मांगते ही रहेंगे और अगला जैसे ही मांगेगा जॉब चेंज कर देंगे। ट्रांसपोर्ट वाले के ट्रक को बीच मे छोड़कर चले जायेंगे या पीकर ठोक देंगे। उसमे गन्दा डीजल भरके ,अपने 200 रुपये के लिये उसके 40 लाख की ऐसी तैसी क...

मोहनजोदड़ो

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 एक लड़की अचानक ऐसी भाषा बोलने लगी जो हजारों साल पुरानी थी 1. वो मंगलवार 12 अगस्त 2025। सावन का महीना।  वाराणसी के अस्सी घाट के पास, गली में रहने वाला तिवारी परिवार। पंडित शंभू तिवारी, 50 साल, संस्कृत के टीचर। पत्नी उमा, 46 साल, गृहिणी। बेटी अनन्या, 17 साल, 12वीं में थी। सीधी-सादी, टॉप करने वाली लड़की। भरतनाट्यम सीखती थी।  मंगलवार की सुबह 6 बजे अनन्या रोज़ की तरह रियाज़ कर रही थी। माँ ने चाय के लिए आवाज़ दी। "अनन्या बेटा, नीचे आ जा।" अनन्या सीढ़ियों से उतरी। पर चेहरा बदला हुआ था। आँखें लाल। होंठ सूखे।  उमा ने पूछा, "क्या हुआ बेटा? तबियत ठीक नहीं?" अनन्या ने उमा को देखा। और बोलना शुरू किया।  पर वो आवाज़ अनन्या की नहीं थी। भारी, गूँजती हुई। और भाषा हिंदी नहीं थी। संस्कृत भी नहीं। कोई और।  "अहम् जागृतास्मि। कः कालः? कुत्र अस्मि?" उमा के हाथ से चाय गिर गई। "हे भगवान! ये क्या बोल रही है?" शंभू भागे आए। संस्कृत के प्रोफेसर थे। पर ये संस्कृत नहीं थी। कुछ शब्द मिलते जुलते थे, पर व्याकरण अलग। उच्चारण अलग।  अनन्या लगातार बोल रही थी। आँखें बंद। हाथ की मुद्र...

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी 1955

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 मेरे पिताजी 1955 के आसपास इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे तो बच्चन जी और फ़िराक़ साहब उन्हें अंग्रेजी पढ़ाते थे,उस समय छात्र बड़े आसानी से अपने टीचर के घर जाते थे,पिताजी बताते थे फिराक साहब अकेले रहते थे घर में उनके कोई परिवार के लोग और काम करने वाले रहते थे,फिराक साहब बड़ी शान से रहते थे छात्रों को बटर टोस्ट खिलाते और कॉफी पिलाते थे, फ़िराक़ साहब ही अकेले ऐसे आदमी थे जो नेहरू को हमेशा जवाहर कहते थे, उस समय पृथ्वीराज कपूर भी अपने दो नाटक पैसा और पठान लेकर इलाहाबाद आए थे,तब इलाहाबाद की छात्र यूनियन के सदस्य पृथ्वीराज से मिलने गए थे,मेरे पिताजी भी गए थे,वो लोग यूनियन के लिए एक चैरिटी शो करवाना चाहते थे, पृथ्वीराज ने मना कर दिया,बोले उन्होंने अपने दो हिट नाटकों पर आधारित दो फिल्म बनाई जिसमें उनका पैसा डूब गया,दोनों फिल्में फ्लॉप रही उन फिल्मों के लिए उन्होंने अपने बेटे राज से दो लाख रुपए उधार किया था,वो बोल रहे थे कि वो अपने बेटे का कर्ज लेकर मरना नहीं चाहते,इसीलिए फिर से अपने पृथ्वी थिएटर को लेकर देश में घूम रहे थे ताकि अपने बेटे का कर्ज चुकता कर सकें, बच्चन जी सिविल लाइंस में र...

प्रधानमंत्री के बेटे

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 इस देश में जाने कितने लोग होंगे जो वेश्याओं के पास जाते हैं और दिन के उजाले में सफेदपोश बने रहते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिक तक का जाने कितनी महिलाओं से सबंन्ध रहा होगा लेकिन सबके सामने स्वीकारने का साहस उन्हें नही होता। सम्बन्ध बनाने में इस देश में लोग रिश्तों की मर्यादा तक भूल जाते हैं।  गांव,शहर, स्कूल कॉलेज-यूनिवर्सिटी में प्रेमी जोड़े होते हैं लेकिन उनमें केवल 10 प्रतिशत ही साहस कर पाते हैं सबके सामने एक दूसरे का हाथ थामने का। 90 प्रतिशत लोग पापा नही मांनेगे,हमारी जाति अलग है,धर्म अलग है,पापा को दहेज चाहिए बोलकर किनारा कर लेते हैं। एक लड़का कैम्ब्रिज जाता है। वहां की यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स अपना खर्च चलाने के लिए खुद काम करते हैं। वो काम रेस्टोरेंट में वेटर का हो या पेट्रोल पंप में पेट्रोल भरने का। वो स्टूडेंट्स अमीर घर के हो या गरीब अपना खर्च खुद चलाने के लिए काम करते हैं।  ऐसे ही एक लड़का रेस्टोरेंट में जाता है और एक खूबसूरत लड़की से उसकी नजर मिलती है जो उसके साथ ही पढ़ती है और अपना खर्च चलाने के लिए उसी रेस्टोरेंट में काम करती है। लड़के को लड़की की ...

सिस्टम नंगा है।

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 राजा को छोड़ कर सब देख रहे हैं कि सिस्टम नंगा है राजा को दिव्य वस्त्र पहनाए गए थे। कहा गया था कि ये कोई साधारण कपड़ा नहीं है। इसे वही देख सकता है जो मन का सच्चा हो। जो ईमानदार हो। जो पवित्र हो। बाकी सबको राजा नंगा दिखाई देगा। राजा आईने के सामने खड़ा था। उसे खुद अपना ढीला लटका हुआ शरीर दिख रहा था। उसे दिख रहा था कि उसके तन पर कुछ नहीं है। लेकिन वो ये कैसे मान लेता कि वो मन का झूठा है? उसने खुद को समझाया कि नहीं, वस्त्र हैं। दिव्य हैं। अलौकिक हैं। और फिर वो निकल पड़ा साम्राज्य घूमने।  दरबारियों ने देखा। दोस्तों ने देखा। सबको दिख रहा था, राजा नंगा है। लेकिन सबने कहा, “अद्भुत। दिव्य। अलौकिक।” कुछ ने तो कहा, “महाराज आप पर तो स्वर्ग उतर आया है।” सच सबको दिख रहा था। झूठ सब बोल रहे थे। सच बोलने में खतरा था। राजा घूमता रहा। किसी में हिम्मत नहीं थी कि कह दे कि महाराज, शरीर की पूरी बायलोजी साफ दिख रही है।  कोई कैसे कह देता सच? इस देश में सच से ऊपर नौकरी है, कुर्सी है, पोस्टिंग है, ट्रांसफर है, बच्चे की फीस है, बैंक बैलेंस है। फिर एक बच्चा आया। उसने राजा को देखा। हंस पड़ा। राजा चौंक...