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Showing posts from 2026

Yugi

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 *समझौता नहीं साहस* हनीमून से लौटते ही पति ने हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन खेल शिक्षिका के पास ऐसा सबूत था जिसने पूरे परिवार की साज़िश उजागर कर दी! शादी के सात दिन बाद, मसूरी से लौटते ही आदित्य ने गाज़ियाबाद वाले फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसने कुंडी चढ़ाई। धीरे-धीरे अपनी चमड़े की बेल्ट निकाली। फिर नई-नवेली दुल्हन सिया से बोला, “अब तुम्हें सिखाना पड़ेगा कि इस घर की बहू कैसे बनकर रहती है।” सिया वहीं ठिठक गई। उसके हाथ में अभी भी पहाड़ों से लाया हुआ छोटा सूटकेस था। माथे की बिंदी हल्की धुंधली हो चुकी थी। हाथों की मेहंदी अभी पूरी तरह फीकी भी नहीं पड़ी थी। कुछ घंटे पहले तक जो पति हर जगह उसका हाथ थामे घूम रहा था, अब उसी के हाथ में बेल्ट थी। सिया की उम्र 25 वर्ष थी। वह गाज़ियाबाद के एक सरकारी विद्यालय में खेल शिक्षिका थी। बच्चे उसका सम्मान करते थे क्योंकि वह अनुशासन, आत्मविश्वास और आत्मरक्षा की ट्रेनिंग भी देती थी। उसका स्वभाव शांत था। कम बोलती थी। यही कारण था कि लोग अक्सर उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी समझ बैठते थे। लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग थी। सिया का बचपन उत्तराखंड के एक छो...

मन ठीक नहीं है।

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 "नोएडा के उस कमरे से उठता एक सवाल" कुछ खबरें पढ़कर हम आगे बढ़ जाते हैं। कुछ खबरें भीतर कहीं रुक जाती हैं। राकेश मेहता की मौत की खबर भी ऐसी ही है। दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव, 1975 बैच के आईएएस अधिकारी, करीब चार दशक तक प्रशासन में रहे, दिल्ली की व्यवस्था को बहुत करीब से देखा और उसे बनाने में भूमिका निभाई। दिल्ली नगर निगम के आयुक्त रहे, दिल्ली के मुख्य सचिव रहे और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के समय महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। जिन लोगों के साथ उन्होंने काम किया, वे उन्हें एक अनुभवी और प्रभावशाली अधिकारी के रूप में याद करते हैं। लेकिन जीवन के आखिरी दिनों में वे नोएडा के सेक्टर 82 में एक किराये के फ्लैट में अकेले रह रहे थे। 6 सितंबर को वहीं उनकी मौत हुई। पुलिस को एक नोट मिला, जिसमें लंबे समय से चली आ रही बीमारी और स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों का उल्लेख था। पुलिस के मुताबिक उन्होंने किसी को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार नहीं बताया था। उनके परिवार के सदस्य दूसरे शहर और देश में रहते थे। मामले की जांच चल रही है। इन बातों के आगे हमें रुक जाना चाहिए। क्योंकि किसी व्यक्ति के मन में उस आखि...

संदेश माता-पिता को

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 बच्चे बिगड़ नहीं रहे!...उन्हें बिगाड़ने के लिए पूरा बाजार खड़ा है!पूरा व्यापार चल रहा है....... गानों, फिल्मों, वेब सीरीज ,हिंसक वीडियो गेम और सोशल मीडिया पर नशे, हथियार और गुंडागर्दी को हीरो बनाने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। सोशल अकाउंट बंद हों, भारी जुर्माना लगे और अपराध के लिए उकसाने पर जेल भी हो। हर एक स्कूल एक दिन की गैरहाजिरी को भी गंभीरता से लेकर तुरंत परिवार को बताए। बच्चों के सोशल अकाउंट ओर उनके स्कूल बैग चेक हो।बच्चों के लिए रोज खेल का समय अनिवार्य करे। सड़क किसी की रील, रौब या यारी दिखाने की जगह नहीं है। बाइकों पर झुंड बनाकर स्टंट, हूटिंग, रास्ता रोकना और यारी-दोस्ती के नाम पर हुड़दंग सब पर तत्काल लगाम लगे। धार्मिक यात्रा आस्था है, कानून से छुट्टी नहीं। यात्रा किसी भी धर्म की हो।नशा, हथियार, उपद्रव और हिंसा पर रत्तीभर ढील न मिले। जहाँ अवैध हथियार और नशा खुलेआम दिखाई दें, वहाँ सरकार और पुलिस की जवाबदेही तय हो। हाई स्कूलों के बाथरूमों में नशीली दवाइयों के रैपर,सिरिंज,गर्भ निरोधक गोलियां या ओर भी शर्मनाक चीजें मिलती है। जिन्हें देखकर कोई भी दहशत में आ जाए। लेकिन मां बाप दोन...

भूख

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 Hangry (हैंग्री) = भूख से जुड़ा गुस्सा। ब्राह्मण 'हैंग्री' हैं, इसलिए उनके नए देवता भी गुस्से में हैं। जब से ब्राह्मणों ने वैदिक तरीके छोड़े और बनिया प्रभाव में आकर जैन तरीके अपनाए, तब से वे अपना आपा खो रहे हैं। खराब खान-पान की आदतों की वजह से वे अब हिंदू धर्म को 'सनातन धर्म' के तौर पर रीब्रांड कर रहे हैं (इससे उन्हें सिख और जैन वोट मिलते हैं, जबकि पुराने 'हिंदुत्व' ब्रांड से ऐसा नहीं होता था)। आइए, असली हिंदू धर्म की तुलना इस आधुनिक 'हैंग्री सनातन धर्म' से करते हैं... 1. ज़बरदस्त लुक-बदलाव: शांति को अलविदा, मस्कुलर बॉडी को नमस्ते याद है जब भगवान हनुमान को विनम्रता, भक्ति और आंतरिक शक्ति के प्रतीक के तौर पर दिखाया जाता था? उसे भूल जाइए। नया हनुमान ऐसा दिखना चाहिए जैसे कोई जिम-ब्रो हो जिसका क्रिएटिन (creatine) दरवाज़े पर ही चोरी हो गया हो। उनकी आँखें चमकती लाल होनी चाहिए, चेहरे पर हमेशा गुस्से वाली शिकन होनी चाहिए, और उनका अंदाज़ ऐसा हो जैसे कह रहे हों, "मैं इसी पार्किंग लॉट में तुमसे लड़ूँगा।" अगर कोई देवता गुस्से से भरे कॉमिक बुक एंटी-हीरो ज...

दर्द

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 देश में एक नया राष्ट्रीय प्रोग्राम शुरू हुआ है, बिभाजन विभीषिका स्मृति दिवस । दर्द समय के साथ भर जाते हैं। हर घाव को बार-बार कुरेदते रहना ज़रूरी नहीं होता। कई बार भूल जाना ही आगे बढ़ने का सबसे मानवीय तरीका होता है। तमाम परिवारों की पुश्तैनी दुश्मनियाँ तीसरी या चौथी पीढ़ी में जाकर खत्म हो जाती हैं। नई पीढ़ी को अक्सर ठीक-ठीक पता भी नहीं होता कि उनके दादा या परदादा किस बात पर एक-दूसरे के दुश्मन थे। और शायद यही अच्छा है। क्योंकि अगर हर पीढ़ी अपने हिस्से का पुराना हिसाब लेकर बैठ जाए, तो कोई परिवार कभी शांति से नहीं जी पाएगा। देश भी कुछ ऐसा ही होता है। हमारे देश का बँटवारा इस भूगोल पर रहने वाले लोगों के लिए सिर्फ नक्शे की एक लकीर नहीं था। वह एक बहुत गहरा घाव था। लाखों लोग अपने घर, जमीन, रिश्ते और अपनी पूरी पिछली जिंदगी छोड़कर इधर से उधर हुए। बहुतों ने अपने लोगों को खोया। बहुतों ने हिंसा देखी। उस पीड़ा की गहराई को शब्दों में समेटना मुश्किल है। लेकिन समय का काम शायद यही है कि वह सबसे गहरे घाव पर भी धीरे-धीरे नई त्वचा उगा देता है। बँटवारे का विनाश झेलने वाले परिवारों की अब चौथी, पाँचवीं पी...

इसीलिए न पूंजीवाद बेहतर है न साम्यवाद। बेहतर है समाजवाद जो उपरोक्त दोनों में से किसी को बेलगाम नही होने देता

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 तो असल बात यह है: आज अगर आप ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ की आलोचना करें, तो तुरंत आपको "कम्युनिस्ट" करार दिया जाता है। वे इसे नफ़रत से "लेफ्ट विंग" (वामपंथी) कहते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि हिंदू धर्म का मतलब ही पूंजीवाद है। यह एक चालाक चाल है, लेकिन यह गलत है!!!! आइए हिंदू पौराणिक कथाओं के दो सबसे उलझे हुए किरदारों—इंद्र और बलि—के ज़रिए बुनियादी बातों को समझते हैं। इंद्र दक्षिणपंथियों (RW) के पसंदीदा हैं, और बलि वामपंथियों (LW) के। और दोनों ही गलत वजहों से। इंद्र, जो चीज़ों को जमा करने (hoarding) के शौकीन थे। उन्होंने सबकी मदद से क्षीर सागर (दूध का सागर) मथा, लेकिन अच्छी चीज़ें खुद स्वर्ग में रख लीं। सारी दौलत हड़प ली, किसी के साथ कुछ नहीं बांटा, फिर भी ज़िंदगी दुखी रही। क्यों? क्योंकि स्वर्ग ही नरक को जन्म देता है। जब सारा खाना आपके पास हो, तो बाकी दुनिया भूखी मरती है। इसे 'मत्स्य न्याय' कहते हैं—बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। संस्कृत में पूंजीवाद के लिए पहले से ही एक शब्द था, और वह कभी भी तारीफ भरा शब्द नहीं था। मज़ेदार बात यह है कि असल में कोई इंद्र की...

हम जिसे Strong करना हो,उसे आलसी बना दो

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 आपके धंधे आपकी कमाई को सबसे बुरी नजर लगती है आलस की, आप जो भी कर रहे है, अगर आप उस काम में जरा सा भी आलसी हुए,खेल खत्म। चाहे आप बड़ी कंपनी चला रहे हो, देश चला रहे हो या फिर कोई छोटी रेहड़ी। ये भाई सड़क किनारे बिरयानी बेचते है, आप जब भी जायेंगे हमेशा गर्म बिरयानी मिलेगी, एक देग खाली होता रहता है तो दूसरे देग की तैयारी चलती रहती है उसी टाइम में,जब तक पहला देग खाली होगा, तब तक दूसरा देग तैयार। चार या पांच साल में ये इंसान कही किसी बढ़िया दुकान में शिफ्ट हो लेगा,और इसके आस पास के ठेले वालो की पीढ़िया इसी सड़क पर जीवन गुजार देंगी,और मै ऐसा गुस्सा या बददुआ कि नीयत से नहीं कह रहा हू, कारण है। सबसे पहले समझते है कि ये बिरयानी वाला क्यू आगे बढ़ेगा अपनी जिंदगी में,सबसे बड़ी वजह ये है,बंदा आलस नहीं करता है। कभी कभी कुछ देर के लिए जब दुकानदार शांत होती है,तो ये अपने ही देग की बिरयानी लेकर बैठ जाता है,खाता नहीं टेस्ट करता है। फिर चटनी, रायता धीरे धीरे सबका नंबर आता है।रायता या चटनी कोई खास नहीं है इसकी,मतलब ठीक ठाक ही, मजेदार जो है वो है इस भाई कर परोसने का तरीका।क्योंकि भाई बस दुकानदारी शांत ...

ढाई हजार साल पुरानी कही बात जो आज बेहद प्रासंगिक है

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 महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था- "बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहने की कोशिश, कई बार उन्हें आपसे दूर कर देती है।" यह वाक्य सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन जीवन के लंबे अनुभवों से छनकर निकला एक गहरा सत्य है। कहानी है ली वेई नाम के एक वृद्ध व्यक्ति की। उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात मेहनत की, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा, अपने सपनों को छोटा किया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, अपने परिवार और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए, तो ली वेई ने सोचा कि अब जीवन की संध्या उनके बीच प्रेम और अपनत्व में बीतेगी। उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के साथ रहने चला गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि भरे हुए घर में भी उसके हिस्से का एकांत बढ़ता जा रहा है। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे, बहू अपनी जिम्मेदारियों में, पोते-पोतियाँ अपनी दुनिया में। उसकी बातें आधी सुनी जातीं, उसके सुझाव अनचाही सलाह लगने लगे और उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे एक आवश्यकता से अधिक एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जैसी महसूस होने लगी। वह जितना निकट आ...

मजदूर बिरादरी मन ही मन खुद को मालिक से ज्यादा बुद्धिमान समझती है .

 इस देश का गरीब 70 % से ज्यादा चालबाज, धूर्त,झूठा बहानेखोर और मुफ्तखोर और दारूबाज है।जो 30 % सही है वो मेहनत करते है,ईमानदारी से धीरे धीरे बढ़ते है और एक आध पीढ़ी के बाद गरीबी से निकलकर मिडल क्लास में प्रेवश कर देते है।आपने देखा भी होगा अपने आसपास कैसे ना कैसे बच्चे पढ़ाये और फिर सब जॉब लगे और आज जो गरीब था वो खुश है लेकिन जो किसी के पैसे मारते थे,झूठ बोलते थे।मक्कारी करते थे वो वही है आज भी 100 ,200 रुपये मांगते है। मैंने मेरी सोसायटी में कचरे वाले को 500 रुपये अलग से दिये कि भाई तेरी वाइफ पीछे कचरा बीनती है उसके हाथ मे कुछ लग जायेगा। उसके लिए कुछ गलाउज ले लेना और कुछ मास्क । खत्म हो जाये तो बोलना मैं फिर दे दूंगा। कुछ दिन बाद उसकी वाइफ को बिना गलाउज के देखा और पूछा तो बोली साहब ये दारू पी गया। 15 से 20 हजार की नोकरी वाले अपने मालिक से एक सॅलरी एडवांस में हमेशा उधार मांग के रखेंगे और मांगते ही रहेंगे और अगला जैसे ही मांगेगा जॉब चेंज कर देंगे। ट्रांसपोर्ट वाले के ट्रक को बीच मे छोड़कर चले जायेंगे या पीकर ठोक देंगे। उसमे गन्दा डीजल भरके ,अपने 200 रुपये के लिये उसके 40 लाख की ऐसी तैसी क...

मोहनजोदड़ो

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 एक लड़की अचानक ऐसी भाषा बोलने लगी जो हजारों साल पुरानी थी 1. वो मंगलवार 12 अगस्त 2025। सावन का महीना।  वाराणसी के अस्सी घाट के पास, गली में रहने वाला तिवारी परिवार। पंडित शंभू तिवारी, 50 साल, संस्कृत के टीचर। पत्नी उमा, 46 साल, गृहिणी। बेटी अनन्या, 17 साल, 12वीं में थी। सीधी-सादी, टॉप करने वाली लड़की। भरतनाट्यम सीखती थी।  मंगलवार की सुबह 6 बजे अनन्या रोज़ की तरह रियाज़ कर रही थी। माँ ने चाय के लिए आवाज़ दी। "अनन्या बेटा, नीचे आ जा।" अनन्या सीढ़ियों से उतरी। पर चेहरा बदला हुआ था। आँखें लाल। होंठ सूखे।  उमा ने पूछा, "क्या हुआ बेटा? तबियत ठीक नहीं?" अनन्या ने उमा को देखा। और बोलना शुरू किया।  पर वो आवाज़ अनन्या की नहीं थी। भारी, गूँजती हुई। और भाषा हिंदी नहीं थी। संस्कृत भी नहीं। कोई और।  "अहम् जागृतास्मि। कः कालः? कुत्र अस्मि?" उमा के हाथ से चाय गिर गई। "हे भगवान! ये क्या बोल रही है?" शंभू भागे आए। संस्कृत के प्रोफेसर थे। पर ये संस्कृत नहीं थी। कुछ शब्द मिलते जुलते थे, पर व्याकरण अलग। उच्चारण अलग।  अनन्या लगातार बोल रही थी। आँखें बंद। हाथ की मुद्र...

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी 1955

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 मेरे पिताजी 1955 के आसपास इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे तो बच्चन जी और फ़िराक़ साहब उन्हें अंग्रेजी पढ़ाते थे,उस समय छात्र बड़े आसानी से अपने टीचर के घर जाते थे,पिताजी बताते थे फिराक साहब अकेले रहते थे घर में उनके कोई परिवार के लोग और काम करने वाले रहते थे,फिराक साहब बड़ी शान से रहते थे छात्रों को बटर टोस्ट खिलाते और कॉफी पिलाते थे, फ़िराक़ साहब ही अकेले ऐसे आदमी थे जो नेहरू को हमेशा जवाहर कहते थे, उस समय पृथ्वीराज कपूर भी अपने दो नाटक पैसा और पठान लेकर इलाहाबाद आए थे,तब इलाहाबाद की छात्र यूनियन के सदस्य पृथ्वीराज से मिलने गए थे,मेरे पिताजी भी गए थे,वो लोग यूनियन के लिए एक चैरिटी शो करवाना चाहते थे, पृथ्वीराज ने मना कर दिया,बोले उन्होंने अपने दो हिट नाटकों पर आधारित दो फिल्म बनाई जिसमें उनका पैसा डूब गया,दोनों फिल्में फ्लॉप रही उन फिल्मों के लिए उन्होंने अपने बेटे राज से दो लाख रुपए उधार किया था,वो बोल रहे थे कि वो अपने बेटे का कर्ज लेकर मरना नहीं चाहते,इसीलिए फिर से अपने पृथ्वी थिएटर को लेकर देश में घूम रहे थे ताकि अपने बेटे का कर्ज चुकता कर सकें, बच्चन जी सिविल लाइंस में र...

प्रधानमंत्री के बेटे

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 इस देश में जाने कितने लोग होंगे जो वेश्याओं के पास जाते हैं और दिन के उजाले में सफेदपोश बने रहते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिक तक का जाने कितनी महिलाओं से सबंन्ध रहा होगा लेकिन सबके सामने स्वीकारने का साहस उन्हें नही होता। सम्बन्ध बनाने में इस देश में लोग रिश्तों की मर्यादा तक भूल जाते हैं।  गांव,शहर, स्कूल कॉलेज-यूनिवर्सिटी में प्रेमी जोड़े होते हैं लेकिन उनमें केवल 10 प्रतिशत ही साहस कर पाते हैं सबके सामने एक दूसरे का हाथ थामने का। 90 प्रतिशत लोग पापा नही मांनेगे,हमारी जाति अलग है,धर्म अलग है,पापा को दहेज चाहिए बोलकर किनारा कर लेते हैं। एक लड़का कैम्ब्रिज जाता है। वहां की यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स अपना खर्च चलाने के लिए खुद काम करते हैं। वो काम रेस्टोरेंट में वेटर का हो या पेट्रोल पंप में पेट्रोल भरने का। वो स्टूडेंट्स अमीर घर के हो या गरीब अपना खर्च खुद चलाने के लिए काम करते हैं।  ऐसे ही एक लड़का रेस्टोरेंट में जाता है और एक खूबसूरत लड़की से उसकी नजर मिलती है जो उसके साथ ही पढ़ती है और अपना खर्च चलाने के लिए उसी रेस्टोरेंट में काम करती है। लड़के को लड़की की ...

सिस्टम नंगा है।

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 राजा को छोड़ कर सब देख रहे हैं कि सिस्टम नंगा है राजा को दिव्य वस्त्र पहनाए गए थे। कहा गया था कि ये कोई साधारण कपड़ा नहीं है। इसे वही देख सकता है जो मन का सच्चा हो। जो ईमानदार हो। जो पवित्र हो। बाकी सबको राजा नंगा दिखाई देगा। राजा आईने के सामने खड़ा था। उसे खुद अपना ढीला लटका हुआ शरीर दिख रहा था। उसे दिख रहा था कि उसके तन पर कुछ नहीं है। लेकिन वो ये कैसे मान लेता कि वो मन का झूठा है? उसने खुद को समझाया कि नहीं, वस्त्र हैं। दिव्य हैं। अलौकिक हैं। और फिर वो निकल पड़ा साम्राज्य घूमने।  दरबारियों ने देखा। दोस्तों ने देखा। सबको दिख रहा था, राजा नंगा है। लेकिन सबने कहा, “अद्भुत। दिव्य। अलौकिक।” कुछ ने तो कहा, “महाराज आप पर तो स्वर्ग उतर आया है।” सच सबको दिख रहा था। झूठ सब बोल रहे थे। सच बोलने में खतरा था। राजा घूमता रहा। किसी में हिम्मत नहीं थी कि कह दे कि महाराज, शरीर की पूरी बायलोजी साफ दिख रही है।  कोई कैसे कह देता सच? इस देश में सच से ऊपर नौकरी है, कुर्सी है, पोस्टिंग है, ट्रांसफर है, बच्चे की फीस है, बैंक बैलेंस है। फिर एक बच्चा आया। उसने राजा को देखा। हंस पड़ा। राजा चौंक...

At 40 You should realise

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 1. Some people earn a lot more than you in regular jobs because they have better opportunities. 2. Distractions are the biggest enemy of success. They hurt your ability to think. 3. Don’t listen to advice from people who aren’t where you want to be in life. 4. No one is going to solve your problems for you. It’s completely your responsibility. 5. You don’t need a hundred self-help books. You just need to take action and be disciplined. 6. If you didn’t go to college for a specific job (like a doctor or engineer), you can learn sales and make more money in 90 days. 7. Nobody really cares about you, so don’t be shy. Go out and make your own opportunities. 8. If you meet someone smarter than you, work with them instead of competing. 9. Smoking is not helpful. It will make you think slower and lose focus. 10. Being too comfortable can lead to bad habits and feeling down. 11. Don’t share too much information about yourself. Keep some things private. 12. Stay away from alcohol. It can m...

WhatsApp वाले अंकल

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 आज हम जो सनातनी आंदोलन देखते हैं, वह 150 साल से भी कम समय पहले शुरू हुआ था। लेकिन अगर आप कुछ 'WhatsApp वाले अंकल' लोगों से पूछें, तो वे पूरे भरोसे के साथ आपको बताएँगे कि सब कुछ 5000 साल पुराना है। कम से कम इतना तो है ही। कभी-कभी तो 10,000 साल भी बता देते हैं, अगर इंटरनेट की स्पीड अच्छी हो तो। इससे समय को लेकर एक समस्या खड़ी हो जाती है। सनातनी लोग यह भी दावा करते हैं कि महाभारत का युद्ध 5000 साल पहले हुआ था। तो फिर, क्या सनातन धर्म उस युद्ध से पहले शुरू हुआ था या उसके बाद? पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) इस मामले को और भी पेचीदा बना देता है। मुख्यधारा के पुरातत्व विज्ञान के अनुसार, घोड़े और रथ इस उपमहाद्वीप में 3500 साल पहले आए थे। तो अगर महाभारत 5000 साल पहले हुआ था, तो क्या हम यह कह रहे हैं कि अर्जुन ने पाषाण युग (Stone-age) के रथ को काल्पनिक घोड़ों के साथ चलाया था? इस मोड़ पर, इसका जवाब अक्सर यह होता है: "पश्चिमी साज़िश।" ज़ाहिर है, सभी पुरातत्वविद झूठ बोल रहे हैं। कार्बन डेटिंग 'राष्ट्र-विरोधी' है। खुदाई का काम ईसाई प्रचार का हिस्सा है। ज़मीन की भूवैज्ञानि...

जनगणना

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 गुरु,सच बताऊं तो जनगणना ने एक आईना तो दिखा ही दिया कि अमीरी की पहचान सिर्फ बड़े मकानों, बड़ी बड़ी गाड़ियों से नहीं, बल्कि बड़े दिलों से पहचानी जाती है... आलीशान मकानों वाले घर मिले, जहाँ घंटों धूप में खड़े रहने के बाद किसी ने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा... और वहीं टूटी हुई मकानों में रहने वालों ने कम से कम ये तो कहा कि भाई साहब, पहले पानी पी लो... फिर काम कर लेना..." सच कहूँ तो उस दिन समझ आया कि इंसान की औकात उसके घर से नहीं, उसके व्यवहार से पता चलती है कि वाकई में अमीरीयत क्या होती है ।कल एक सज्जन जो खुद को तथाकथित अमीर समझ रहे थे , लास्ट प्रश्न जिसमें फोन नंबर बताना था केवल, भाई साहब नम्बर बताने से पहले दूसरे व्यक्ति,जो की उनके घर काम करता था 15 मिनट तक डांटते रहे और मैं उनके फोन नम्बर का इन्तजार करता रहा‌। तभी मैंने भगवान से प्रार्थना कि प्रभू अमीर उन्हें ही बनाओ जो‌ चु्््या और बकलोल ना हो ,पर मैं नाराज़ नहीं हुआ क्योंकि ट्रेनिंग में बताया गया है खीस दिखाकर मुस्कुराते रहना हैं।😀😀 कुछ लोगों के घर बहुत बड़े थे, लेकिन दिल छोटे निकले और कुछ के पास खुद खाने को कम था पर अपनापन...

गर्मी की छुट्टियों

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 आजकल गर्मी की छुट्टियों को लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो शिक्षक और बच्चे कोई राष्ट्रीय संसाधन नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली मशीन हों जिन्हें बस ऑन करके छोड़ देना चाहिए। छुट्टियाँ आते ही समाज का एक वर्ग और कुछ जिम्मेदार लोग ऐसे प्रतिक्रिया देने लगते हैं जैसे शिक्षा का पूरा पतन केवल गर्मी की छुट्टियों की वजह से हो रहा हो। सबसे पहले यह समझना होगा कि गर्मी की छुट्टियाँ “मौज-मस्ती का बोनस” नहीं, बल्कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश की भौगोलिक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता हैं। 45 डिग्री तापमान में चलने वाले सरकारी स्कूलों की वास्तविकता एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठकर समझी नहीं जा सकती। जिन स्कूलों में पंखे केवल घूमते हैं, हवा नहीं देते, जहाँ बिजली आधा दिन गायब रहती है, जहाँ बच्चे फर्श पर बैठते हैं, वहाँ मई-जून में नियमित पढ़ाई की बात करना संवेदनहीनता है, शिक्षाशास्त्र नहीं। दूसरा बड़ा पूर्वाग्रह यह फैलाया जा रहा है कि “शिक्षक तो वैसे भी बहुत छुट्टियाँ लेते हैं।” यह कथन उन लोगों का सबसे सुविधाजनक हथियार है जिन्हें शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। शिक्षक का काम केव...