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Showing posts from 2026

रावण

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 लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला। यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे। एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण, सब कहते हैं दशानन अजेय था क्योंकि ब्रह्मा का वरदान था। क्या यही उसकी शक्ति का रहस्य था?" विभीषण हँसा, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।" पहला सिर – सुनने वाला रावण पैदा पुलस्त्य के कुल में हुआ, पर जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।" रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश की छाया में बैठा, और शिव तांडव नहीं, शिव का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षो...

सत्य

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 जिस दिन हम बिना लाग लपेट के सत्य के लिए आग्रहित होना आरंभ कर देंगे, तब उसी दिन से हम ब्रह्मांड के साथ एकाकारिता का अनुभव करने लगेंगे।  कुछ छूटने का डर, कुछ खोने का अवसाद, संबंधों में नाराजगी का भाव, समाज में छद्म सभ्यता का भाव और हमारी आंतरिक कमजोरी ही हमें सत्य से बहुत दूर ले जाती है और असत्य के साथ बहने को विवश कर देती है , जिसके साथ हमने रहना सीख लिया है या यूं कहीं हम इसके आदी हो चुके हैं। वर्षों तक व्यवस्था की सहते सहते और नियमों का हवाला देते देते हम किस सीमा तक भावना शून्य होकर  यंत्र का कलपुर्जा मात्र बन गए हैं , इसे हमारी आत्मा तक ने स्वीकार करना बंद कर दिया है या दूसरे शब्दों में हमारी आत्मा भी मर चुकी है और मरी हुई आत्मा सिर्फ जिंदगी को घसीटती है जीती नहीं है। सत्य को स्वीकार कर और गलत का सामना करने की क्षमता विकसित करते हुए हम जिंदगी को पल-पल जीना सीख जाते हैं , ठहराव टूट जाता है और हम जीवन और मृत्यु से पार जाकर अपनी सत्ता, अपने अस्तित्व को आनंदित होकर अनुभव करने लगते हैं। सत्य के लिए आग्रह कुछ समय के लिए आपको उद्वेलित कर सकता है लेकिन धीरे-धीरे आदी होने पर ...

गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली हैं l

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 गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली हैं l बच्चे घूमने जाने की ज़िद्द करेंगे l घूमने ज़रूर जाओ l थोड़ा चेंज हो जाता है l पहाड़ों पर जाओ, समुद्र किनारे जाओ, नदियों/झरनों का संगीत सुनने जाओ l  लेकिन एक बात गाँठ बाँध लो l अपनी जान किसी क्रूज वाले या झूले वाले के हाथ में मत दो l किसी रोपवे वाले को तुम्हारे प्राण तार पर मत लटकाने दो l पैराजंपिंग कर के क्यों मरना?  टूरिस्ट प्लेसेज पर इतने सारे थ्रिल डवलप हो गए हैं सब पैसा बनाने के लिए हैं l सुरक्षा मानकों पर एक भी खरा नहीं उतरता l ना इनकी कोई सेफ्टी ऑडिट होती l सब भगवान भरोसे चलता है l  रिलीजियस प्लेसेज पर भूल कर भी मत जाओ l वहाँ सब लुटेरे हैं l लुटेरों के ही भगवान हैं l भगदड़ में दब कर मरने के लिए थोड़े ही मिला है जीवन ? मंदिर के बाऊंसर आपके साथ मार पिटाई करने आपके घर तो आते नहीं l तुम ख़ुद सपरिवार जाते हो मार खाने के लिए… चार चार घंटे लाइन में लगने के लिए l ये सब बिजनेस मॉड्यूल हैं और तुम इनके कस्टमर l इससे ज्यादा कुछ नहीं l  क्रूज़ व्रुज पर मत चढ़ो l राफ्टिंग शाफ़्टिंग मत ही करो l पैरग्लाइडिंग भी रिस्की है l  ऊंच...

बुजुर्ग समझदार थे या हम?

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यह तस्वीर हमारे गांव मानकावास के स्कूल कमेटी की है। इन बुजुर्गों ने आपसी सहयोग से 1950 के दशक में यह स्कूल बनाया था। इस स्कूल से पढ़कर सरकारी नौकरियों में गए, उनमें से कई अफसर भी बने। तब गांव में कोई मंदिर नहीं था, जोकि मैने कल पोस्ट में बताया भी है कि गांव में पहला मंदिर सन् 1967 के बाद बना था, और वह भी उन साधु महात्मा के ही पैसों से बनाया गया था। तब ये बुजुर्ग चाहते तो चंदा करके, या आपसी सहयोग से, जैसे ये स्कूल बनाया था, वैसे ही मंदिर भी बनवा सकते थे! तब इन्होंने सिर्फ स्कूल को ही एहमियत क्यों दी?  अब बात करते हैं, आज के दौर की। अभी पिछले महीने चरखी दादरी में मुख्यमंत्री की रैली थी, तो पंचायतों से गांवों की मांगों के लिए प्रस्ताव मांगे जा रहे थे। मेरे गांव से एक भाई ने मांग रखी कि स्कूल के मुख्य द्वार की मरम्मत करवाई जाए। इस पर विधायक जी ने कहा कि यह भी कोई मांग है, इसे तो विधायक कोटे से ही ठीक करवा देंगे, कोई बड़ी मांग करो।  तब मुझे इन बुजुर्गों का ख्याल आया कि एक ये बुजुर्ग थे जो अपने दम पर पूरा स्कूल बना गए, और एक हम हैं, कि उनके बनाए हुए स्कूल के मुख्य द्वार की मरम्मत भी...

राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है. मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है

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  2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरु किया. देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द ख़त्म हो जाएगा. हज़ारों की भीड़ जमा हो गई. क्रांति को नाम मिला India Against Corruption. नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए. मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं. मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया. उस दौर में अक्सर बहन के घर मुलाक़ात होती थी. एक दिन उन्होंने मुझे कहा, “अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं.” कुछ हफ़्तों बाद आग्रह कर के वो अपनी गाड़ी में मुझे महाराष्ट्र भवन ले गईं. वहाँ एक कमरे में उन्होंने मुझे अन्ना हज़ारे से मिलवाया. उन्होंने अन्ना हज़ारे से मेरे बारे में अच्छी अच्छी बातें कीं. मैं चुप बैठा रहा. फिर अन्ना करवट पलट कर सो गए और हम कमरे से बाहर आ गए. एक दिन मैंने बहन से धीरे से कहा: “मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ. आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख़्ता कर लें. कल ये एक पार्टी बनेगा. आप सेटिंग करके चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट लें. आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे. बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवा...

दिल की कॉपी

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 मुझे ऐसा महसूस होता है की मेरी उम्र ज़्यादा लंबी नहीं होगी, मेरी मौत भरी जवानी मैं हो जाएगी ऐसा लगता है जैसे हर लम्हा आख़िरी हो, हर दिन आख़िरी हो, हर रात आख़िरी रात हो, ऐसा लगता है जैसे मेरे सब ख़्वाब हसरतों मैं बदल जाएँगे जैसे मेरी ख्वाहिशें मर जाएँगीं और मैं बिलकुल तन ह रह जाऊँगा, । "हमारी मौत जवानी मैं लिख दी जाती है, हम ऐसे लोग फ़क़त मुँह दिखाने आते हैं।"

New normal in 5 years

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 अगले 5 साल में इंडिया में extra marital affairs भी धीरे-धीरे normal लगने लगेंगे, और शायद इसे cheating भी नहीं कहा जाएगा। इसके लिए नए fancy नाम आ जाएंगे, जैसे companionship, extensionship वगैरह। अभी यह बात आपको अजीब लग रही होगी और लगेगा कि ऐसा justify नहीं किया जा सकता, लेकिन समझो कैसे ये धीरे-धीरे होता है। Gleeden नाम की एक app आ चुकी है जो खास extra marital relationships के लिए है, और इंडिया में इसके लगभग 40 लाख downloads हो चुके हैं। Bangalore इसमें सबसे आगे है, और The Economic Times जैसी बड़ी news भी इस पर लिख रही है। सोचने वाली बात है। आज के time में अगर कोई cheat करता है तो वो छुपकर करता है, कोई openly नहीं बताता। लेकिन जब इस चीज़ को market बनाया जाने लगे, उसमें पैसा लगाया जाए, और उसे justify किया जाए, तो धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलने लगती है। जैसे 20-25 साल पहले boyfriend girlfriend जैसी बातें openly नहीं होती थीं। relationships hidden रहते थे, और एक unsaid rule होता था कि शादी से पहले कुछ नहीं करेंगे। फिर ये सब normalize हुआ, उसके बाद live-in relationship आया, फिर situations...

हर वृद्ध पुरुष को इसे पढ़कर चिंतन अवश्य करना चाहिए

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  । 1. पुरुष बूढ़ा होता है, जबकि स्त्री परिपक्व होती है। 2. जैसे ही पुरुष अपने बच्चों की शादी कर देता है और परिवार की आर्थिक नींव मजबूत कर देता है, परिवार में उसका वरिष्ठ और सम्मानित स्थान धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। 3. इसके बाद उसे बोझ समझा जाने लगता है — चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अनिश्चित स्वभाव वाला बूढ़ा व्यक्ति। 4. जिन कठोर निर्णयों से उसने कभी पत्नी और बच्चों के लिए व्यवस्था बनाई थी, आज उन्हीं निर्णयों की चीर-फाड़ होकर आलोचना होती है; एक न एक कारण से उसे दोषी ठहरा दिया जाता है। और यदि वास्तव में उससे कोई गलती हुई हो — तो भगवान ही रक्षा करे। 5. वृद्ध स्त्री को, इसके विपरीत, बच्चों और बहुओं से सहानुभूति मिलती है — क्योंकि उसके माध्यम से अभी भी कई काम करवाने होते हैं। 6. सही समय आने पर वह समझदारी से पति के पक्ष से बच्चों के पक्ष में चली जाती है। 7. जब पति उम्र में बड़ा हो, तो पत्नी बहू के साथ तालमेल बना लेती है, ताकि बेटा उससे दूर न हो और उसकी देखभाल करता रहे। 8. पुरुष ने जीवन में चाहे कितनी ही महान उपलब्धियाँ हासिल की हों — बुढ़ापे में वे किसी काम नहीं आतीं। 9. जबकि वृद्ध स्त्री...

हमारे जाने के बाद

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 हमारे जाने के 100 साल बाद शायद किसी को हमारा नाम भी याद नहीं रहेगा... तो फिर इतनी भागदौड़ किसलिए? दोस्त, आज से 100 साल बाद हम इस दुनिया में नहीं होंगे। हम अपने अपनों के साथ मिट्टी में सो चुके होंगे। जिस घर को बनाने के लिए हमने दिन-रात मेहनत की... कितनी कुर्बानियाँ दीं... कितनी रातें जागकर काम किया... उसी घर में तब कुछ और लोग रह रहे होंगे। आज जिन चीज़ों को हम "ये मेरा है" कहकर दिल से लगाते हैं, वे सब किसी और के पास होंगी। हमारी अगली पीढ़ी... शायद हमारा नाम भी ठीक से याद न रख पाए। हम में से कितने लोग अपने परदादा या उनके पिता का नाम जानते हैं? हमारे जाने के बाद कुछ साल लोग हमें याद करेंगे... फोटो देखेंगे... बातें करेंगे... लेकिन धीरे-धीरे सब धुंधला हो जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे अस्तित्व का कोई निशान भी नहीं बचेगा। तब सवाल उठता है - हम इतना क्यों लड़ते हैं? इतना अहंकार किसलिए? इतनी चिंता, तनाव और प्रतिस्पर्धा क्यों? हम "सब कुछ पाने" की दौड़ में लगे रहते हैं... लेकिन क्या सच में वही सबसे ज़रूरी है? कितनी बार हमने घूमने का प्लान टाल दिया? कितनी बार माँ-बाप को गले लग...

दस ग्राम श्मशान साथ ले आना चाहिए।

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आपने कभी चिता जलते देखी है ? चिता पूरी तरह से जलने में ढाई से तीन घंटे का समय लगता है, यह समय मृत शरीर के वजन, उपयोग की गई लकड़ियों की मात्रा, प्रयोग की गई सामग्री घी आदि और मौसम की स्थिति पर भी निर्भर कर सकता है। शुरुआती समय में चिता के आसपास व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अनुसार भीड़ मौजूद रहती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे भीड़ कम होती चली जाती है, लोग अपनी उपस्थिति लगाकर अपना चेहरा दिखाकर जाते रहते हैं, अगर अंतिम संस्कार के लिए कई लोग एक साथ किसी दूर के स्थान से, एक ही वाहन (गाड़ी) से आएं हैं तो ऐसे में लोग उपस्थित रहते हैं, क्योंकि उनके पास वापस जाने का कोई साधन नहीं होता, वरना अंत के दस-पंद्रह मिनट तक मुश्किल से तीन-चार लोग ही श्मशान घाट में बचते हैं। अंतिम तीन-चार लोग वो होते हैं जो उस मृत व्यक्ति के एकदम करीबी होते हैं यानी उसका पुत्र, पुत्र ना होने की स्थिति में वह व्यक्ति जो अंतिम संस्कार कर रहा होता है, उसके सगे संबंधी उसके भाई उसके अन्य परिवार के लोग, या फिर वो लोग जिनका उन उपस्थित लोगों से निकटतम संबंध (स्वार्थ) होता है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो जिसका मृत व्यक्...

मर्द

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 ये जो 2014, अतीक और नोटबंदी वाली कान्ट्रवर्सी है, ये एक न्यूक्लियर ब्लास्ट जैसा है।  इसके शुरुआती रेडीअस में जो आयेगा वो भस्म और वाष्प होगा। हड्डियाँ भी न मिलेंगी। लेकिन जब डस्ट सैटल होगी, तब धुरंधर 2 एक नई कान्ट्रवर्सी लेकर आयेगी। इसमें हार्ड कोर सूडो फेमनिस्ट्स की तरफ विलाप का शोर सुनाई देगा। क्योंकि धुरंधर की हिरोइन के पास वाकई में कुछ खास स्क्रीनटाइम नहीं है। पिछली वाली हिरोइन – उलफ़त उर्फ सौम्या टंडन भी – एक थप्पड़ मारने की मशीन भर रह गई हैं। इसके इतर किस फ़ीमेल किरदार के पास स्ट्रॉंग स्क्रीनटाइम है धुरंधर में? जवाब है कोई नहीं।  पर स्क्रीनटाइम से इतर, धुरंधर की फ़ीमेल के पास स्ट्रॉंग कैरेक्टर ज़रूर है। पाक्सतां जैसे हार्डकोर पैट्रीआर्क देश में भी एक ऐसी कन्या दिखाई गई है जो अपनी मर्ज़ी से जीती है, अपनी मर्ज़ी से शादी करती है, अपनी इच्छा से माफ़ करती है, मना करने के बावजूद वो सवाल करती है, जवाब माँगती है और सारे लॉजिक्स से खुद को परे करके, अपने प्रेमी की ढेर सारी फ़िक्र करती है।  इसके बावजूद आप कह सकते हैं कि इसने बच्चे पैदा करने के सिवा किया ही क्या है?  पर जनाब य...

प्रधानाचार्य

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 विद्यालय का प्रधानाचार्य “मिलनसार दिखने” के दबाव में यदि अपनी निर्णय क्षमता खो देता है, तो वह धीरे-धीरे नेतृत्व नहीं, बल्कि प्रभावों का शिकार बन जाता है। यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच यही है कि एक प्रधानाचार्य का काम सभी को खुश रखना नहीं, बल्कि सही और न्यायपूर्ण निर्णय लेना है। और यह निर्णय मित्रता, दबाव या अफवाहों के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्य, प्रमाण और विवेक के आधार पर ही संभव है। यह धारणा कि प्रधानाचार्य को हर समय मित्रवत होना चाहिए, शिक्षा के पेशेवर ढाँचे को कमजोर करती है। एक शिक्षक और प्रधानाचार्य के बीच संबंध सम्मान और स्पष्टता का होना चाहिए, न कि अनावश्यक घुलने-मिलने का। अत्यधिक मित्रता कई बार निर्णयों की निष्पक्षता को प्रभावित करती है, जिससे न केवल व्यवस्था बिगड़ती है बल्कि कार्यसंस्कृति भी प्रभावित होती है। इसलिए प्रधानाचार्य का सख्त होना कोई नकारात्मक गुण नहीं, बल्कि एक आवश्यक पेशेवर विशेषता है—बशर्ते उसमें संवेदनशीलता और न्याय का संतुलन भी मौजूद हो। निर्णय प्रक्रिया की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि वह कितनी प्रमाण आधारित है। विद्यालय में हर दिन अनेक शिकायतें, सुझाव और आरोप ...

जब कुर्सी रह जाती है, दिमाग चला जाता है

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  ————————————————— बचपन से एक बात समझाई गई थी कि किसी भी काम को करने के लिए सबसे जरूरी चीज दिमाग है। शरीर थक जाए तो आदमी आराम कर सकता है। उम्र ज्यादा हो जाए तो आदमी धीमा चल सकता है। लेकिन अगर दिमाग साथ छोड़ दे तो आदमी खुद भी खतरे में होता है और उसके भरोसे बैठे लोग भी। बचपन में यह बात सिर्फ घर की लगती थी। बड़ा हुआ तो समझ में आया कि यह सिर्फ घर की नहीं, पूरे देश की भी बात है। कुछ दिन पहले एक डॉक्टर मित्र बता रहे थे कि डिमेंशिया नाम की बीमारी बड़ी अजीब होती है। आदमी चलता फिरता रहता है, बोलता भी रहता है। कभी-कभी तो बिल्कुल सामान्य लगता है। लेकिन धीरे धीरे उसकी स्मृति कमजोर होने लगती है। उसे याद नहीं रहता कि उसने अभी क्या कहा, क्या किया, किससे मिला। वह एक ही बात बार-बार दोहराने लगता है। फैसले गड़बड़ होने लगते हैं। डॉक्टर ने कहा कि परिवारों में यह बीमारी बड़ी कठिन स्थिति पैदा कर देती है। घर के लोग समझ जाते हैं कि अब बुजुर्ग को आराम देना चाहिए। गाड़ी की चाबी उनसे ले ली जाती है। बैंक का काम बेटा या बेटी संभाल लेते हैं। धीरे धीरे जिम्मेदारियां बदल जाती हैं। यानी परिवार मान लेता है कि अब नि...

अकेले खाता है वह चोर है।

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 आप किसी भी शहर में जाएं, किसी भी गाँव-खेड़े में हों, वहां सुबह के समय होटल में नाश्ता करने वालों की भीड़ दिख जाएगी. जलेबी, समोसा, आलूबड़ा, पकोड़ा, पोहा, पूरी-सब्जी और गर्म चाय लेते हुए लोग आपको हर जगह दिखाई देंगे. इनमें ९९% पुरुष दिखाई पड़ेंगे आपको. ये पुरुष सुबह के वक्त नहा कर या बिना नहाए ही घर से बाहर इस नाश्ते का आनंद लेते दूकान के बाहर भीड़ लगाकर या टेबल-कुर्सियों पर आसीन होकर अवश्य मिलेंगे.  मेरे मन में यह प्रश्न कई वर्षों से उठ रहा है कि इस भीड़ में घर की महिलाएं क्यों नहीं दिखाई पड़ती? क्या वे इस समय अपने घरेलू काम में व्यस्त रहती हैं? या, उन्हें सुबह नाश्ता करने की ज़रुरत महसूस नहीं होती, या, उनके पति, भाई या देवर उन्हें अपने साथ लेकर बाहर नहीं निकलते? कुछ पुरुषों का यह गोपनीय कार्यक्रम लगभग रोज चलता है, शायद ही वे अपने घर में बताते होंगे कि उन्होंने बाहर का नाश्ता लिया है.   मान लिया जाए कि किसी कारण से घर की महिलाएं नहीं निकल पायी तो क्या उनके लिए नाश्ता पैक करके ले जाया जाता है? उत्तर है, '(लगभग) नहीं.' मैं बचपन से हलवाई के धंधे से जुड़ा हुआ हूँ, मैंने करीब से देख...

अच्छा नहीं लगता बुढ़ापा पिता पर।

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 पिता पर बुढ़ापा अच्छा नहीं लगता हर किसी के आगे हाथ जोड़ देना अरे साहब, अरे साहब कहकर बातें करना जिससे अच्छे से बात करना चाहिए, झिड़कना उसे खामखाँ बेमतलब के आदमी से घंटों बातें करना खाँसते हुए ज़िद पर अड़ेंगे, हर एक काम ख़ुद करेंगे वश का नहीं जो उनके, करेंगे उसे ही सबसे पहले तिस पर लोगों का यह कहना— ''अरे भई बुढ़ापा है, उलझो मत'', बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता पिता बुढ़ापे में अच्छे नहीं लगते या शायद अच्छा नहीं लगता बुढ़ापा पिता पर।

अहंकार की वर्दी और स्वाभिमान का सैल्यूट: एक अनकही दास्तान...!!

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 दरोगा पत्नी ने बेरोज़गार पति को अपमानित किया 5 मिनट बाद SP आए और सैल्यूट किया पूरा थाना सन्न रह गया...!! मधुपुर गाँव में सुबह की शुरुआत मिठाई की दुकान से उठने वाली इलायची और केसर की खुशबू से होती थी। राघव, एक साधारण कद-काठी का युवक, जिसके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, अपने पिता मोहन साहब की मदद करता था। राघव केवल एक हलवाई का बेटा नहीं था, वह गाँव की उम्मीद था। यूपीएससी (UPSC) की तैयारी के लिए जब वह दिल्ली गया, तो उसके पास जेब में कम और आँखों में सपने ज्यादा थे...!! दिल्ली के मुखर्जी नगर की एक छोटी सी कोठरी में राघव ने सात साल बिताए। वहीं उसकी मुलाकात अभिषेक से हुई। अभिषेक के पास प्रतिभा थी, लेकिन संसाधन नहीं। राघव अक्सर अपनी रातों की नींद और ट्यूशन के पैसे अभिषेक की फीस के लिए दे देता था। वह कहता, “दोस्त, आज तू पढ़ ले, कल जब तू अफसर बनेगा तो देश का भला होगा।” राघव का खुद का चयन नहीं हुआ, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। वह मधुपुर लौटा ताकि अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बन सके...!! गाँव लौटने के बाद राघव की शादी निधि से हुई। निधि एक महत्वाकांक्षी लड़की थी। शादी के ही दिन जब...

हम आपको ज़बरदस्ती रंग नहीं लगाएंगे

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 ये कौन से देवर-भाभी हैं  जिनके बीच में अवैध संबंध हैं? अखबारों में  न्यूज़ पर  यू ट्यूब पर  इंस्टाग्राम पर किन देवरों और भाभियों की वीडियोज़ हैं? जिन्हें चटखारे लेकर देखते हैं  हमारे घरों के  छोटे-छोटे बच्चे  स्खलित हो जाते हैं  आयु से पहले ही  इतने उत्तेजित हो जाते हैं  कि टूट पड़ते हैं सगी बहनों पर!  --- कितनी रंगीन थीं हमारी होलियाँ  देवर रंग लेकर भागते थे  भाभियों के पीछे  भाभियाँ छुप जाती थीं  नहानघरों में  कमरों में  रसोइयों में  हम खिड़की की जाली के भीतर से फेंक देते थे  पानी में घुला हुआ कोढ़िया रंग  घर के बुजुर्ग डांटते थे हमें  वही रंगी हुई भाभियाँ  परोसती थीं हमें  गुझिया, भुजिया, चाय और शरबत   कहाँ गए वे देवर?  क्या वे देवर आज भी कहीं-कहीं मौजूद हैं?  --- भाभियाँ जानती थीं  देवरों ने शराब पी रखी है  या गांजा  या भांग  या अफीम  या डोडा  या अमल  लेकिन भाभियों को भरोसा था देवरों पर  देवर  गाल रंग देत...

पुस्तकालय

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 अपने घर में पुस्तकालय अवश्य बनाएं — यह आज के डिजिटल युग में भी सबसे स्मार्ट और फायदेमंद फैसलों में से एक है। घर में पुस्तकालय बनाने के प्रमुख फायदे ज्ञान और सीखने की आदत — किताबें हमेशा हाथ के पास रहती हैं, जिससे पढ़ने की आदत बनती है। बच्चे और बड़े दोनों में जिज्ञासा बढ़ती है और लाइफलॉन्ग लर्निंग की शुरुआत होती है। एकाग्रता और शांति — यह एक ऐसा कोना बन जाता है जहाँ मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया से दूर जाकर फोकस के साथ पढ़ाई या किताब पढ़ी जा सकती है। परिवार का बंधन मजबूत — माता-पिता बच्चों के साथ बैठकर पढ़ें तो परिवार में अच्छी बातचीत बढ़ती है और स्क्रीन टाइम कम होता है। घर की खूबसूरती और वैल्यू — अच्छी तरह सजा हुआ पुस्तकालय घर को आकर्षक बनाता है और रियल एस्टेट वैल्यू भी बढ़ा सकता है। तनाव कम करने वाला स्पेस — किताबों से घिरा माहौल मन को सुकून देता है, रिचार्ज होने का बेहतरीन तरीका है। पैसे की बचत — बार-बार नई किताबें खरीदने की बजाय पहले से संग्रहित किताबें दोबारा पढ़ी जा सकती हैं। घर में पुस्तकालय कैसे बनाएं (कम खर्च और कम जगह में भी) जगह चुनें — बेडरूम का एक कोना, लिविंग रूम की दीवा...

इश्तेहार

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 अंग्रेज सरकार की तरफ़ से सेना में भर्ती के लिए जारी किया गया यह इश्तेहार उस दौर की हकीकत बयान करता है, जब युवाओं को लालच, इनाम और “इज़्ज़त” के नाम पर फौज में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया जाता था। 🇮🇳📜 इस तस्वीर में एक व्यक्ति की फौज में भर्ती होने से पहले और बाद की स्थिति दिखाकर यह समझाने की कोशिश की गई है कि सेना में जाना तरक़्क़ी और सम्मान का रास्ता है। 🗣️ इश्तेहार में लिखा गया है: “भाइयों जल्दी चलो, दौड़ो वरना पछताओगे… सरकार बहादुर ने पचास रुपया इनाम के बजाय अब पैंसठ रुपया इनाम कर दिया है। दस रुपया भर्ती होने पर, 40 रुपया पलटन पहुँचने पर और 15 रुपया कवायद पास करने पर मिलेगा। ग्यारह रुपया माहवार तनख्वाह के अलावा हर छह महीने पर 25 रुपया ‘ज़माना-ए-लड़ाई’ के लिए मिलेगा। लाम (मोर्चे) पर जाने पर पाँच रुपया माहवार भत्ता और दिया जाएगा। कपड़ा और खाना हर हालत में मुफ़्त मिलेगा…” 📌 भर्ती की शर्तें: उम्र 18 से 30 साल, क़द 5 फ़ीट 2 इंच, सीना 32 इंच। पैदल पलटन और तोपखाने के लिए अलग-अलग जातियों का उल्लेख भी किया गया है। यह इश्तेहार उस समय की सामाजिक बनावट, आर्थिक हालात और औपनिवेशिक नीत...

“जो चीज़ें पहली नज़र में बहुत कूल लगती हैं, उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यही होती है कि उनका असर ज्यादा दिन नहीं टिकता।”

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प्रसिद्ध साहित्यकार शिवानी की बेटी ईरा पांडे अपनी माँ की जीवनी में एक दिलचस्प प्रसंग दर्ज करती हैं। वह लिखती हैं कि उनके नाना के ठीक बगल वाले घर में डेनियल पंत रहते थे, जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था। नाना की सोच काफ़ी रूढ़िवादी थी, इसलिए उन्होंने दोनों घरों के बीच एक दीवार खड़ी करवा दी—ताकि “उनकी दुनिया” और “हमारी दुनिया” अलग-अलग रहें। घर में सख़्त निर्देश थे कि उस तरफ़ न देखा जाए, न कोई मेल-जोल हो। शिवानी ने कहीं लिखा है कि डेनियल पंत के घर से उठने वाली मसालेदार मांस की खुशबू उनके साधारण ब्राह्मण रसोईघर तक पहुँच जाती थी और उनकी दाल, आलू की सब्ज़ी और चावल को फीका बना देती थी। यह वर्णन उसी घर का था, जिसके मुखिया तारादत्त पंत ने 1874 में हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया था—और इस तरह वे कुमाऊँ की उस “नीरस” ब्राह्मण रसोई से आज़ाद हो गए थे। इसी डेनियल पंत की बेटी आयरीन रूथ पंत ने आगे चलकर अपने से दस साल बड़े, पहले से विवाहित और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से विवाह किया। इसके साथ ही उन्होंने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। दिलचस्प बात यह है कि लियाकत अली खा...

तीसहजारी खौफ और दिल्ली का सुल्तान !!

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     नाम सुन कर आपको दिल्ली की मशहूर अदालत का ख्याल आता होगा । आयेगा भी ! आज दिल्ली में तीसहजारी कोर्ट नामी जगह है । लेकिन ये नाम पड़ा कैसे ? तो चलिये चलते हैं आज से 243 साल पहले की दिल्ली घूमने ।    मुगलिया सल्तनत ने कई सिख गुरूओं को शहीद किया , और फिर लाल किले के दीवान ए आम में बैठ कर सन 1716 में सिखों के बहादुर योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर को 740 सिखों के साथ शहीद करने का फरमान सुनाया गया था । इस बात की खालसा फौज के मन में कसक रहती थी ।  फिर आया 1781 खालसा फौजों ने जनरल बघेल सिंह , बाबा जस्सा सिंह की अगुवाई में सोनीपत , से बागपत तक के यमुना पार के हिस्से कब्जा कर लिया, अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के तुरन्त बाद खालसा फौजें दिल्ली की ओर बढ ने लगीं । उनका इरादा दिल्ली सल्तनत पर कब्जा करना नहीं वरन शहीद गुरूओं के शहीदी स्थलों पर गुरूद्वारा न बनाने की बादशाह की नाफरमानी या टालने की नीति पर उसे सबक सिखाना था ।  खालसा सेनाऐं जनरल बघेल सिंह, बाबा जस्सा सिंह अहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढि़या की कप्तानी में अलग अलग दिशाओं से दिल्ली की ओर...

भौव्रुवण (बभ्रुवाहन): वह पुत्र जो अर्जुन को पराजित कर सका — और इतिहास ने जिसे भुला दिया

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 भौव्रुवण (बभ्रुवाहन): वह पुत्र जो अर्जुन को पराजित कर सका — और इतिहास ने जिसे भुला दिया महाभारत के उस महासंग्राम में, जहाँ शंखनाद भीष्म, कर्ण, अर्जुन और द्रोण के नामों से गूँजता है— वहाँ एक ऐसा योद्धा भी था, जिसकी निःशब्दता युद्धघोष से कहीं अधिक भारी थी। उसका नाम था बभ्रुवाहन— जिसे भौव्रुवण के नाम से भी जाना गया। वह न दुर्बल था। न अशिक्षित। न तुच्छ। वह केवल विस्मृत कर दिया गया। ⸻ यश से दूर जन्म भौव्रुवण का जन्म मणिपुर में हुआ— हस्तिनापुर की राजनीति और कुरुक्षेत्र की रक्तरंजित कीर्ति से बहुत दूर। उसके पिता थे अर्जुन— अपने युग के महानतम धनुर्धर। उसकी माता थीं चित्रांगदा— एक योद्धा-रानी, जिन्होंने अपने पुत्र को कथाओं का राजकुमार नहीं, बल्कि भूमि और प्रजा का रक्षक बनाकर पाला। अर्जुन चले गए। निर्दयता से नहीं— नियति के आह्वान पर। और भौव्रुवण बड़ा हुआ— पिता की छाया के बिना, पर राजा के दायित्व के भार के साथ। ⸻ तालियों के बिना सामर्थ्य भौव्रुवण ने साधना की— निस्तब्धता में। न किसी गुरु ने उसका यश गाया। न किसी ऋषि ने उसके भविष्य की घोषणा की। फिर भी वह बना—  • अस्त्र-शस्त्रों का निष्णात ...

शत्रुघ्न — वह भ्राता जिसे इतिहास भूल गया

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  स्मरण किया जाता है राम का — आदर्श राजा के रूप में। चर्चा होती है लक्ष्मण की — निष्ठावान छाया के रूप में। नमन किया जाता है भरत को — उस भ्राता के रूप में जिसने राज करते हुए भी राज नहीं किया। परंतु शत्रुघ्न— सबसे छोटे भ्राता— ऐसे जीवन में जिए, जहाँ स्मृति पहुँच ही नहीं सकी। ⸻ भूमिका के बिना जन्म शत्रुघ्न का जन्म नेतृत्व के लिए नहीं हुआ। वे राम के साथ वन जाने के लिए नहीं चुने गए। न ही उनसे भरत की भाँति त्याग की अपेक्षा की गई। बाल्यकाल से ही उन्होंने एक सत्य स्पष्ट रूप से जान लिया— उनके लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं था। अतः उन्होंने स्वयं अपना स्थान चुना— भरत के समीप, मौन में, निष्ठा में, निरंतर। ⸻ जिस प्रेम का कोई नाम न था जब भरत विलाप करते थे, शत्रुघ्न रात्रि भर जागते रहते थे। जब भरत ने राम के वनवास का दोष स्वयं पर लिया, शत्रुघ्न ने भी वह भार अपने हृदय में धारण किया— जबकि वह उनका अपराध नहीं था। उन्होंने राम से कभी कम प्रेम नहीं किया। उन्होंने धर्म की कभी उपेक्षा नहीं की। उन्होंने केवल मौन में प्रेम किया— और मौन प्रेम प्रायः भुला दिया जाता है। ⸻ वह क्रोध जिसे व्यक्त करने की अनुमति न म...