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Showing posts from 2026

हम जिसे Strong करना हो,उसे आलसी बना दो

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 आपके धंधे आपकी कमाई को सबसे बुरी नजर लगती है आलस की, आप जो भी कर रहे है, अगर आप उस काम में जरा सा भी आलसी हुए,खेल खत्म। चाहे आप बड़ी कंपनी चला रहे हो, देश चला रहे हो या फिर कोई छोटी रेहड़ी। ये भाई सड़क किनारे बिरयानी बेचते है, आप जब भी जायेंगे हमेशा गर्म बिरयानी मिलेगी, एक देग खाली होता रहता है तो दूसरे देग की तैयारी चलती रहती है उसी टाइम में,जब तक पहला देग खाली होगा, तब तक दूसरा देग तैयार। चार या पांच साल में ये इंसान कही किसी बढ़िया दुकान में शिफ्ट हो लेगा,और इसके आस पास के ठेले वालो की पीढ़िया इसी सड़क पर जीवन गुजार देंगी,और मै ऐसा गुस्सा या बददुआ कि नीयत से नहीं कह रहा हू, कारण है। सबसे पहले समझते है कि ये बिरयानी वाला क्यू आगे बढ़ेगा अपनी जिंदगी में,सबसे बड़ी वजह ये है,बंदा आलस नहीं करता है। कभी कभी कुछ देर के लिए जब दुकानदार शांत होती है,तो ये अपने ही देग की बिरयानी लेकर बैठ जाता है,खाता नहीं टेस्ट करता है। फिर चटनी, रायता धीरे धीरे सबका नंबर आता है।रायता या चटनी कोई खास नहीं है इसकी,मतलब ठीक ठाक ही, मजेदार जो है वो है इस भाई कर परोसने का तरीका।क्योंकि भाई बस दुकानदारी शांत ...

ढाई हजार साल पुरानी कही बात जो आज बेहद प्रासंगिक है

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 महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था- "बुढ़ापे में अपनी जवान औलाद के बहुत ज़्यादा करीब रहने की कोशिश, कई बार उन्हें आपसे दूर कर देती है।" यह वाक्य सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन जीवन के लंबे अनुभवों से छनकर निकला एक गहरा सत्य है। कहानी है ली वेई नाम के एक वृद्ध व्यक्ति की। उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात मेहनत की, अपनी इच्छाओं को पीछे रखा, अपने सपनों को छोटा किया ताकि बच्चों के सपने बड़े हो सकें। जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए, अपने परिवार और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए, तो ली वेई ने सोचा कि अब जीवन की संध्या उनके बीच प्रेम और अपनत्व में बीतेगी। उसने अपना घर बेच दिया और बेटे के साथ रहने चला गया। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि भरे हुए घर में भी उसके हिस्से का एकांत बढ़ता जा रहा है। बच्चे अपने काम में व्यस्त थे, बहू अपनी जिम्मेदारियों में, पोते-पोतियाँ अपनी दुनिया में। उसकी बातें आधी सुनी जातीं, उसके सुझाव अनचाही सलाह लगने लगे और उसकी उपस्थिति धीरे-धीरे एक आवश्यकता से अधिक एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जैसी महसूस होने लगी। वह जितना निकट आ...

मजदूर बिरादरी मन ही मन खुद को मालिक से ज्यादा बुद्धिमान समझती है .

 इस देश का गरीब 70 % से ज्यादा चालबाज, धूर्त,झूठा बहानेखोर और मुफ्तखोर और दारूबाज है।जो 30 % सही है वो मेहनत करते है,ईमानदारी से धीरे धीरे बढ़ते है और एक आध पीढ़ी के बाद गरीबी से निकलकर मिडल क्लास में प्रेवश कर देते है।आपने देखा भी होगा अपने आसपास कैसे ना कैसे बच्चे पढ़ाये और फिर सब जॉब लगे और आज जो गरीब था वो खुश है लेकिन जो किसी के पैसे मारते थे,झूठ बोलते थे।मक्कारी करते थे वो वही है आज भी 100 ,200 रुपये मांगते है। मैंने मेरी सोसायटी में कचरे वाले को 500 रुपये अलग से दिये कि भाई तेरी वाइफ पीछे कचरा बीनती है उसके हाथ मे कुछ लग जायेगा। उसके लिए कुछ गलाउज ले लेना और कुछ मास्क । खत्म हो जाये तो बोलना मैं फिर दे दूंगा। कुछ दिन बाद उसकी वाइफ को बिना गलाउज के देखा और पूछा तो बोली साहब ये दारू पी गया। 15 से 20 हजार की नोकरी वाले अपने मालिक से एक सॅलरी एडवांस में हमेशा उधार मांग के रखेंगे और मांगते ही रहेंगे और अगला जैसे ही मांगेगा जॉब चेंज कर देंगे। ट्रांसपोर्ट वाले के ट्रक को बीच मे छोड़कर चले जायेंगे या पीकर ठोक देंगे। उसमे गन्दा डीजल भरके ,अपने 200 रुपये के लिये उसके 40 लाख की ऐसी तैसी क...

मोहनजोदड़ो

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 एक लड़की अचानक ऐसी भाषा बोलने लगी जो हजारों साल पुरानी थी 1. वो मंगलवार 12 अगस्त 2025। सावन का महीना।  वाराणसी के अस्सी घाट के पास, गली में रहने वाला तिवारी परिवार। पंडित शंभू तिवारी, 50 साल, संस्कृत के टीचर। पत्नी उमा, 46 साल, गृहिणी। बेटी अनन्या, 17 साल, 12वीं में थी। सीधी-सादी, टॉप करने वाली लड़की। भरतनाट्यम सीखती थी।  मंगलवार की सुबह 6 बजे अनन्या रोज़ की तरह रियाज़ कर रही थी। माँ ने चाय के लिए आवाज़ दी। "अनन्या बेटा, नीचे आ जा।" अनन्या सीढ़ियों से उतरी। पर चेहरा बदला हुआ था। आँखें लाल। होंठ सूखे।  उमा ने पूछा, "क्या हुआ बेटा? तबियत ठीक नहीं?" अनन्या ने उमा को देखा। और बोलना शुरू किया।  पर वो आवाज़ अनन्या की नहीं थी। भारी, गूँजती हुई। और भाषा हिंदी नहीं थी। संस्कृत भी नहीं। कोई और।  "अहम् जागृतास्मि। कः कालः? कुत्र अस्मि?" उमा के हाथ से चाय गिर गई। "हे भगवान! ये क्या बोल रही है?" शंभू भागे आए। संस्कृत के प्रोफेसर थे। पर ये संस्कृत नहीं थी। कुछ शब्द मिलते जुलते थे, पर व्याकरण अलग। उच्चारण अलग।  अनन्या लगातार बोल रही थी। आँखें बंद। हाथ की मुद्र...

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी 1955

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 मेरे पिताजी 1955 के आसपास इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे तो बच्चन जी और फ़िराक़ साहब उन्हें अंग्रेजी पढ़ाते थे,उस समय छात्र बड़े आसानी से अपने टीचर के घर जाते थे,पिताजी बताते थे फिराक साहब अकेले रहते थे घर में उनके कोई परिवार के लोग और काम करने वाले रहते थे,फिराक साहब बड़ी शान से रहते थे छात्रों को बटर टोस्ट खिलाते और कॉफी पिलाते थे, फ़िराक़ साहब ही अकेले ऐसे आदमी थे जो नेहरू को हमेशा जवाहर कहते थे, उस समय पृथ्वीराज कपूर भी अपने दो नाटक पैसा और पठान लेकर इलाहाबाद आए थे,तब इलाहाबाद की छात्र यूनियन के सदस्य पृथ्वीराज से मिलने गए थे,मेरे पिताजी भी गए थे,वो लोग यूनियन के लिए एक चैरिटी शो करवाना चाहते थे, पृथ्वीराज ने मना कर दिया,बोले उन्होंने अपने दो हिट नाटकों पर आधारित दो फिल्म बनाई जिसमें उनका पैसा डूब गया,दोनों फिल्में फ्लॉप रही उन फिल्मों के लिए उन्होंने अपने बेटे राज से दो लाख रुपए उधार किया था,वो बोल रहे थे कि वो अपने बेटे का कर्ज लेकर मरना नहीं चाहते,इसीलिए फिर से अपने पृथ्वी थिएटर को लेकर देश में घूम रहे थे ताकि अपने बेटे का कर्ज चुकता कर सकें, बच्चन जी सिविल लाइंस में र...

प्रधानमंत्री के बेटे

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 इस देश में जाने कितने लोग होंगे जो वेश्याओं के पास जाते हैं और दिन के उजाले में सफेदपोश बने रहते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिक तक का जाने कितनी महिलाओं से सबंन्ध रहा होगा लेकिन सबके सामने स्वीकारने का साहस उन्हें नही होता। सम्बन्ध बनाने में इस देश में लोग रिश्तों की मर्यादा तक भूल जाते हैं।  गांव,शहर, स्कूल कॉलेज-यूनिवर्सिटी में प्रेमी जोड़े होते हैं लेकिन उनमें केवल 10 प्रतिशत ही साहस कर पाते हैं सबके सामने एक दूसरे का हाथ थामने का। 90 प्रतिशत लोग पापा नही मांनेगे,हमारी जाति अलग है,धर्म अलग है,पापा को दहेज चाहिए बोलकर किनारा कर लेते हैं। एक लड़का कैम्ब्रिज जाता है। वहां की यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स अपना खर्च चलाने के लिए खुद काम करते हैं। वो काम रेस्टोरेंट में वेटर का हो या पेट्रोल पंप में पेट्रोल भरने का। वो स्टूडेंट्स अमीर घर के हो या गरीब अपना खर्च खुद चलाने के लिए काम करते हैं।  ऐसे ही एक लड़का रेस्टोरेंट में जाता है और एक खूबसूरत लड़की से उसकी नजर मिलती है जो उसके साथ ही पढ़ती है और अपना खर्च चलाने के लिए उसी रेस्टोरेंट में काम करती है। लड़के को लड़की की ...

सिस्टम नंगा है।

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 राजा को छोड़ कर सब देख रहे हैं कि सिस्टम नंगा है राजा को दिव्य वस्त्र पहनाए गए थे। कहा गया था कि ये कोई साधारण कपड़ा नहीं है। इसे वही देख सकता है जो मन का सच्चा हो। जो ईमानदार हो। जो पवित्र हो। बाकी सबको राजा नंगा दिखाई देगा। राजा आईने के सामने खड़ा था। उसे खुद अपना ढीला लटका हुआ शरीर दिख रहा था। उसे दिख रहा था कि उसके तन पर कुछ नहीं है। लेकिन वो ये कैसे मान लेता कि वो मन का झूठा है? उसने खुद को समझाया कि नहीं, वस्त्र हैं। दिव्य हैं। अलौकिक हैं। और फिर वो निकल पड़ा साम्राज्य घूमने।  दरबारियों ने देखा। दोस्तों ने देखा। सबको दिख रहा था, राजा नंगा है। लेकिन सबने कहा, “अद्भुत। दिव्य। अलौकिक।” कुछ ने तो कहा, “महाराज आप पर तो स्वर्ग उतर आया है।” सच सबको दिख रहा था। झूठ सब बोल रहे थे। सच बोलने में खतरा था। राजा घूमता रहा। किसी में हिम्मत नहीं थी कि कह दे कि महाराज, शरीर की पूरी बायलोजी साफ दिख रही है।  कोई कैसे कह देता सच? इस देश में सच से ऊपर नौकरी है, कुर्सी है, पोस्टिंग है, ट्रांसफर है, बच्चे की फीस है, बैंक बैलेंस है। फिर एक बच्चा आया। उसने राजा को देखा। हंस पड़ा। राजा चौंक...

At 40 You should realise

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 1. Some people earn a lot more than you in regular jobs because they have better opportunities. 2. Distractions are the biggest enemy of success. They hurt your ability to think. 3. Don’t listen to advice from people who aren’t where you want to be in life. 4. No one is going to solve your problems for you. It’s completely your responsibility. 5. You don’t need a hundred self-help books. You just need to take action and be disciplined. 6. If you didn’t go to college for a specific job (like a doctor or engineer), you can learn sales and make more money in 90 days. 7. Nobody really cares about you, so don’t be shy. Go out and make your own opportunities. 8. If you meet someone smarter than you, work with them instead of competing. 9. Smoking is not helpful. It will make you think slower and lose focus. 10. Being too comfortable can lead to bad habits and feeling down. 11. Don’t share too much information about yourself. Keep some things private. 12. Stay away from alcohol. It can m...

WhatsApp वाले अंकल

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 आज हम जो सनातनी आंदोलन देखते हैं, वह 150 साल से भी कम समय पहले शुरू हुआ था। लेकिन अगर आप कुछ 'WhatsApp वाले अंकल' लोगों से पूछें, तो वे पूरे भरोसे के साथ आपको बताएँगे कि सब कुछ 5000 साल पुराना है। कम से कम इतना तो है ही। कभी-कभी तो 10,000 साल भी बता देते हैं, अगर इंटरनेट की स्पीड अच्छी हो तो। इससे समय को लेकर एक समस्या खड़ी हो जाती है। सनातनी लोग यह भी दावा करते हैं कि महाभारत का युद्ध 5000 साल पहले हुआ था। तो फिर, क्या सनातन धर्म उस युद्ध से पहले शुरू हुआ था या उसके बाद? पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) इस मामले को और भी पेचीदा बना देता है। मुख्यधारा के पुरातत्व विज्ञान के अनुसार, घोड़े और रथ इस उपमहाद्वीप में 3500 साल पहले आए थे। तो अगर महाभारत 5000 साल पहले हुआ था, तो क्या हम यह कह रहे हैं कि अर्जुन ने पाषाण युग (Stone-age) के रथ को काल्पनिक घोड़ों के साथ चलाया था? इस मोड़ पर, इसका जवाब अक्सर यह होता है: "पश्चिमी साज़िश।" ज़ाहिर है, सभी पुरातत्वविद झूठ बोल रहे हैं। कार्बन डेटिंग 'राष्ट्र-विरोधी' है। खुदाई का काम ईसाई प्रचार का हिस्सा है। ज़मीन की भूवैज्ञानि...

जनगणना

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 गुरु,सच बताऊं तो जनगणना ने एक आईना तो दिखा ही दिया कि अमीरी की पहचान सिर्फ बड़े मकानों, बड़ी बड़ी गाड़ियों से नहीं, बल्कि बड़े दिलों से पहचानी जाती है... आलीशान मकानों वाले घर मिले, जहाँ घंटों धूप में खड़े रहने के बाद किसी ने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा... और वहीं टूटी हुई मकानों में रहने वालों ने कम से कम ये तो कहा कि भाई साहब, पहले पानी पी लो... फिर काम कर लेना..." सच कहूँ तो उस दिन समझ आया कि इंसान की औकात उसके घर से नहीं, उसके व्यवहार से पता चलती है कि वाकई में अमीरीयत क्या होती है ।कल एक सज्जन जो खुद को तथाकथित अमीर समझ रहे थे , लास्ट प्रश्न जिसमें फोन नंबर बताना था केवल, भाई साहब नम्बर बताने से पहले दूसरे व्यक्ति,जो की उनके घर काम करता था 15 मिनट तक डांटते रहे और मैं उनके फोन नम्बर का इन्तजार करता रहा‌। तभी मैंने भगवान से प्रार्थना कि प्रभू अमीर उन्हें ही बनाओ जो‌ चु्््या और बकलोल ना हो ,पर मैं नाराज़ नहीं हुआ क्योंकि ट्रेनिंग में बताया गया है खीस दिखाकर मुस्कुराते रहना हैं।😀😀 कुछ लोगों के घर बहुत बड़े थे, लेकिन दिल छोटे निकले और कुछ के पास खुद खाने को कम था पर अपनापन...

गर्मी की छुट्टियों

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 आजकल गर्मी की छुट्टियों को लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो शिक्षक और बच्चे कोई राष्ट्रीय संसाधन नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली मशीन हों जिन्हें बस ऑन करके छोड़ देना चाहिए। छुट्टियाँ आते ही समाज का एक वर्ग और कुछ जिम्मेदार लोग ऐसे प्रतिक्रिया देने लगते हैं जैसे शिक्षा का पूरा पतन केवल गर्मी की छुट्टियों की वजह से हो रहा हो। सबसे पहले यह समझना होगा कि गर्मी की छुट्टियाँ “मौज-मस्ती का बोनस” नहीं, बल्कि भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश की भौगोलिक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकता हैं। 45 डिग्री तापमान में चलने वाले सरकारी स्कूलों की वास्तविकता एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठकर समझी नहीं जा सकती। जिन स्कूलों में पंखे केवल घूमते हैं, हवा नहीं देते, जहाँ बिजली आधा दिन गायब रहती है, जहाँ बच्चे फर्श पर बैठते हैं, वहाँ मई-जून में नियमित पढ़ाई की बात करना संवेदनहीनता है, शिक्षाशास्त्र नहीं। दूसरा बड़ा पूर्वाग्रह यह फैलाया जा रहा है कि “शिक्षक तो वैसे भी बहुत छुट्टियाँ लेते हैं।” यह कथन उन लोगों का सबसे सुविधाजनक हथियार है जिन्हें शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। शिक्षक का काम केव...

कुछ हाथ डिग्री से नहीं, दुआ और अनुभव से बड़े होते हैं।

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 जब अरबपति की पत्नी प्रसव पीड़ा में मौत से लड़ रही थी, 12 डॉक्टर हार चुके थे; तभी फर्श पोंछने वाली गरीब दाई ने कहा, “बच्चा रास्ता मांग रहा है,” और कमरे का घमंड एक पल में सभी की सांसें थमाकर टूट गया बच्चे की धड़कन गिर रही थी, मां की आंखें पलटने लगी थीं, और दिल्ली के सबसे महंगे अस्पताल के बाहर एक गरीब सफाईकर्मी औरत को डॉक्टरों ने दरवाजे से धक्का देकर पीछे कर दिया था। दक्षिण दिल्ली के “सूर्यवंश सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल” की 9वीं मंजिल उस रात किसी पांच सितारा होटल जैसी चमक रही थी, मगर भीतर मौत की आहट घूम रही थी। उसी मंजिल के शाही प्रसव-कक्ष में ईशानी मल्होत्रा 41 घंटे से प्रसव पीड़ा में थी। वह विक्रम मल्होत्रा की पत्नी थी—वही विक्रम मल्होत्रा जिसके होटल, रियल एस्टेट, मीडिया चैनल और टेक कंपनियों के नाम पर आधा दिल्ली-एनसीआर सांस लेता था। अखबारों ने इस बच्चे को “मल्होत्रा साम्राज्य का वारिस” कहा था। सोशल मीडिया पर ईशानी की गोद भराई की तस्वीरें वायरल हुई थीं। चांदी की थालियां, बनारसी साड़ियां, जयपुर से आए कंगन, और मंदिरों में चढ़ाए गए लाखों रुपये के प्रसाद—सब कुछ था। बस उस रात एक चीज नहीं थी।...

पत्थर दिल

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 "सामने बेटे की मौ*त खड़ी थी और हाथ में उसे बचाने का मौका, पर इस बाप ने जो फैसला लिया उसे सुनकर दुनिया के पैरों तले जमीन खिसक गई! क्या कोई इतना पत्थर दिल हो सकता है?" द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस के तानाशाह स्टालिन का बड़ा बेटा, याकोव (Yakov), जर्मन सेना द्वारा पकड़ लिया गया था। हिटलर को लगा कि यह स्टालिन को झुकाने का सबसे सही मौका है। जर्मनी ने एक प्रस्ताव भेजा— "अपने बेटे याकोव को वापस ले लो और बदले में हमारे पकड़े गए फील्ड मार्शल फ्रेडरिक पॉलस (Friedrich Paulus) को रिहा कर दो।" दुनिया को लगा कि एक पिता अपने बेटे को बचाने के लिए कुछ भी करेगा।  एक बाप के लिए भी यह मौका था अपने बेटे की जान बचाने का, लेकिन स्टालिन ने जो कहा वह आज भी इतिहास में दर्ज है। उन्होंने जवाब दिया "मैं एक फील्ड मार्शल का सौदा एक साधारण सिपाही से नहीं कर सकता।" स्टालिन की नज़र में याकोव सिर्फ उनका बेटा नहीं, बल्कि रेड आर्मी का एक लेफ्टिनेंट था। उनके लिए लाखों रूसी सैनिकों की जान उनके अपने बेटे से बढ़कर थी। नतीजा यह हुआ कि याकोव की जेल में ही मृ*त्यु हो गई, लेकिन स्टालिन ने अपने सगे ...

रावण

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 लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला। यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे। एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, "महाराज विभीषण, सब कहते हैं दशानन अजेय था क्योंकि ब्रह्मा का वरदान था। क्या यही उसकी शक्ति का रहस्य था?" विभीषण हँसा, पर हँसी में थकान थी। "वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।" पहला सिर – सुनने वाला रावण पैदा पुलस्त्य के कुल में हुआ, पर जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा से पूछा, "पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?" विश्रवा ने कहा, "क्योंकि वे सुनते नहीं।" रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश की छाया में बैठा, और शिव तांडव नहीं, शिव का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षो...

सत्य

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 जिस दिन हम बिना लाग लपेट के सत्य के लिए आग्रहित होना आरंभ कर देंगे, तब उसी दिन से हम ब्रह्मांड के साथ एकाकारिता का अनुभव करने लगेंगे।  कुछ छूटने का डर, कुछ खोने का अवसाद, संबंधों में नाराजगी का भाव, समाज में छद्म सभ्यता का भाव और हमारी आंतरिक कमजोरी ही हमें सत्य से बहुत दूर ले जाती है और असत्य के साथ बहने को विवश कर देती है , जिसके साथ हमने रहना सीख लिया है या यूं कहीं हम इसके आदी हो चुके हैं। वर्षों तक व्यवस्था की सहते सहते और नियमों का हवाला देते देते हम किस सीमा तक भावना शून्य होकर  यंत्र का कलपुर्जा मात्र बन गए हैं , इसे हमारी आत्मा तक ने स्वीकार करना बंद कर दिया है या दूसरे शब्दों में हमारी आत्मा भी मर चुकी है और मरी हुई आत्मा सिर्फ जिंदगी को घसीटती है जीती नहीं है। सत्य को स्वीकार कर और गलत का सामना करने की क्षमता विकसित करते हुए हम जिंदगी को पल-पल जीना सीख जाते हैं , ठहराव टूट जाता है और हम जीवन और मृत्यु से पार जाकर अपनी सत्ता, अपने अस्तित्व को आनंदित होकर अनुभव करने लगते हैं। सत्य के लिए आग्रह कुछ समय के लिए आपको उद्वेलित कर सकता है लेकिन धीरे-धीरे आदी होने पर ...

गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली हैं l

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 गर्मियों की छुट्टियाँ होने वाली हैं l बच्चे घूमने जाने की ज़िद्द करेंगे l घूमने ज़रूर जाओ l थोड़ा चेंज हो जाता है l पहाड़ों पर जाओ, समुद्र किनारे जाओ, नदियों/झरनों का संगीत सुनने जाओ l  लेकिन एक बात गाँठ बाँध लो l अपनी जान किसी क्रूज वाले या झूले वाले के हाथ में मत दो l किसी रोपवे वाले को तुम्हारे प्राण तार पर मत लटकाने दो l पैराजंपिंग कर के क्यों मरना?  टूरिस्ट प्लेसेज पर इतने सारे थ्रिल डवलप हो गए हैं सब पैसा बनाने के लिए हैं l सुरक्षा मानकों पर एक भी खरा नहीं उतरता l ना इनकी कोई सेफ्टी ऑडिट होती l सब भगवान भरोसे चलता है l  रिलीजियस प्लेसेज पर भूल कर भी मत जाओ l वहाँ सब लुटेरे हैं l लुटेरों के ही भगवान हैं l भगदड़ में दब कर मरने के लिए थोड़े ही मिला है जीवन ? मंदिर के बाऊंसर आपके साथ मार पिटाई करने आपके घर तो आते नहीं l तुम ख़ुद सपरिवार जाते हो मार खाने के लिए… चार चार घंटे लाइन में लगने के लिए l ये सब बिजनेस मॉड्यूल हैं और तुम इनके कस्टमर l इससे ज्यादा कुछ नहीं l  क्रूज़ व्रुज पर मत चढ़ो l राफ्टिंग शाफ़्टिंग मत ही करो l पैरग्लाइडिंग भी रिस्की है l  ऊंच...

बुजुर्ग समझदार थे या हम?

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यह तस्वीर हमारे गांव मानकावास के स्कूल कमेटी की है। इन बुजुर्गों ने आपसी सहयोग से 1950 के दशक में यह स्कूल बनाया था। इस स्कूल से पढ़कर सरकारी नौकरियों में गए, उनमें से कई अफसर भी बने। तब गांव में कोई मंदिर नहीं था, जोकि मैने कल पोस्ट में बताया भी है कि गांव में पहला मंदिर सन् 1967 के बाद बना था, और वह भी उन साधु महात्मा के ही पैसों से बनाया गया था। तब ये बुजुर्ग चाहते तो चंदा करके, या आपसी सहयोग से, जैसे ये स्कूल बनाया था, वैसे ही मंदिर भी बनवा सकते थे! तब इन्होंने सिर्फ स्कूल को ही एहमियत क्यों दी?  अब बात करते हैं, आज के दौर की। अभी पिछले महीने चरखी दादरी में मुख्यमंत्री की रैली थी, तो पंचायतों से गांवों की मांगों के लिए प्रस्ताव मांगे जा रहे थे। मेरे गांव से एक भाई ने मांग रखी कि स्कूल के मुख्य द्वार की मरम्मत करवाई जाए। इस पर विधायक जी ने कहा कि यह भी कोई मांग है, इसे तो विधायक कोटे से ही ठीक करवा देंगे, कोई बड़ी मांग करो।  तब मुझे इन बुजुर्गों का ख्याल आया कि एक ये बुजुर्ग थे जो अपने दम पर पूरा स्कूल बना गए, और एक हम हैं, कि उनके बनाए हुए स्कूल के मुख्य द्वार की मरम्मत भी...

राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है. मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है

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  2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरु किया. देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द ख़त्म हो जाएगा. हज़ारों की भीड़ जमा हो गई. क्रांति को नाम मिला India Against Corruption. नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए. मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं. मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया. उस दौर में अक्सर बहन के घर मुलाक़ात होती थी. एक दिन उन्होंने मुझे कहा, “अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं.” कुछ हफ़्तों बाद आग्रह कर के वो अपनी गाड़ी में मुझे महाराष्ट्र भवन ले गईं. वहाँ एक कमरे में उन्होंने मुझे अन्ना हज़ारे से मिलवाया. उन्होंने अन्ना हज़ारे से मेरे बारे में अच्छी अच्छी बातें कीं. मैं चुप बैठा रहा. फिर अन्ना करवट पलट कर सो गए और हम कमरे से बाहर आ गए. एक दिन मैंने बहन से धीरे से कहा: “मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूँ. आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख़्ता कर लें. कल ये एक पार्टी बनेगा. आप सेटिंग करके चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव का टिकट लें. आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे. बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवा...

दिल की कॉपी

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 मुझे ऐसा महसूस होता है की मेरी उम्र ज़्यादा लंबी नहीं होगी, मेरी मौत भरी जवानी मैं हो जाएगी ऐसा लगता है जैसे हर लम्हा आख़िरी हो, हर दिन आख़िरी हो, हर रात आख़िरी रात हो, ऐसा लगता है जैसे मेरे सब ख़्वाब हसरतों मैं बदल जाएँगे जैसे मेरी ख्वाहिशें मर जाएँगीं और मैं बिलकुल तन ह रह जाऊँगा, । "हमारी मौत जवानी मैं लिख दी जाती है, हम ऐसे लोग फ़क़त मुँह दिखाने आते हैं।"

New normal in 5 years

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 अगले 5 साल में इंडिया में extra marital affairs भी धीरे-धीरे normal लगने लगेंगे, और शायद इसे cheating भी नहीं कहा जाएगा। इसके लिए नए fancy नाम आ जाएंगे, जैसे companionship, extensionship वगैरह। अभी यह बात आपको अजीब लग रही होगी और लगेगा कि ऐसा justify नहीं किया जा सकता, लेकिन समझो कैसे ये धीरे-धीरे होता है। Gleeden नाम की एक app आ चुकी है जो खास extra marital relationships के लिए है, और इंडिया में इसके लगभग 40 लाख downloads हो चुके हैं। Bangalore इसमें सबसे आगे है, और The Economic Times जैसी बड़ी news भी इस पर लिख रही है। सोचने वाली बात है। आज के time में अगर कोई cheat करता है तो वो छुपकर करता है, कोई openly नहीं बताता। लेकिन जब इस चीज़ को market बनाया जाने लगे, उसमें पैसा लगाया जाए, और उसे justify किया जाए, तो धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलने लगती है। जैसे 20-25 साल पहले boyfriend girlfriend जैसी बातें openly नहीं होती थीं। relationships hidden रहते थे, और एक unsaid rule होता था कि शादी से पहले कुछ नहीं करेंगे। फिर ये सब normalize हुआ, उसके बाद live-in relationship आया, फिर situations...

हर वृद्ध पुरुष को इसे पढ़कर चिंतन अवश्य करना चाहिए

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  । 1. पुरुष बूढ़ा होता है, जबकि स्त्री परिपक्व होती है। 2. जैसे ही पुरुष अपने बच्चों की शादी कर देता है और परिवार की आर्थिक नींव मजबूत कर देता है, परिवार में उसका वरिष्ठ और सम्मानित स्थान धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। 3. इसके बाद उसे बोझ समझा जाने लगता है — चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अनिश्चित स्वभाव वाला बूढ़ा व्यक्ति। 4. जिन कठोर निर्णयों से उसने कभी पत्नी और बच्चों के लिए व्यवस्था बनाई थी, आज उन्हीं निर्णयों की चीर-फाड़ होकर आलोचना होती है; एक न एक कारण से उसे दोषी ठहरा दिया जाता है। और यदि वास्तव में उससे कोई गलती हुई हो — तो भगवान ही रक्षा करे। 5. वृद्ध स्त्री को, इसके विपरीत, बच्चों और बहुओं से सहानुभूति मिलती है — क्योंकि उसके माध्यम से अभी भी कई काम करवाने होते हैं। 6. सही समय आने पर वह समझदारी से पति के पक्ष से बच्चों के पक्ष में चली जाती है। 7. जब पति उम्र में बड़ा हो, तो पत्नी बहू के साथ तालमेल बना लेती है, ताकि बेटा उससे दूर न हो और उसकी देखभाल करता रहे। 8. पुरुष ने जीवन में चाहे कितनी ही महान उपलब्धियाँ हासिल की हों — बुढ़ापे में वे किसी काम नहीं आतीं। 9. जबकि वृद्ध स्त्री...

हमारे जाने के बाद

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 हमारे जाने के 100 साल बाद शायद किसी को हमारा नाम भी याद नहीं रहेगा... तो फिर इतनी भागदौड़ किसलिए? दोस्त, आज से 100 साल बाद हम इस दुनिया में नहीं होंगे। हम अपने अपनों के साथ मिट्टी में सो चुके होंगे। जिस घर को बनाने के लिए हमने दिन-रात मेहनत की... कितनी कुर्बानियाँ दीं... कितनी रातें जागकर काम किया... उसी घर में तब कुछ और लोग रह रहे होंगे। आज जिन चीज़ों को हम "ये मेरा है" कहकर दिल से लगाते हैं, वे सब किसी और के पास होंगी। हमारी अगली पीढ़ी... शायद हमारा नाम भी ठीक से याद न रख पाए। हम में से कितने लोग अपने परदादा या उनके पिता का नाम जानते हैं? हमारे जाने के बाद कुछ साल लोग हमें याद करेंगे... फोटो देखेंगे... बातें करेंगे... लेकिन धीरे-धीरे सब धुंधला हो जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे अस्तित्व का कोई निशान भी नहीं बचेगा। तब सवाल उठता है - हम इतना क्यों लड़ते हैं? इतना अहंकार किसलिए? इतनी चिंता, तनाव और प्रतिस्पर्धा क्यों? हम "सब कुछ पाने" की दौड़ में लगे रहते हैं... लेकिन क्या सच में वही सबसे ज़रूरी है? कितनी बार हमने घूमने का प्लान टाल दिया? कितनी बार माँ-बाप को गले लग...