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Showing posts from July, 2018

राधिका

          मैं जब शादी होकर ससुराल आई , तो मैंने देखा वहां पर मेरी बड़ी ननद का राज चलता है । और हर कोई उन्हीं की बात मानता था , कोई उनके सामने किसी बात पर बहस नहीं करता था । मैंने अपने पति से बात करने की कोशिश की थी , उन्होंने यही कहा कि "वह जो बोले वह काम कर दो बाकी तुम्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं है अगर वह गलत भी बोलेगी तो हां कह देना" मुझे यह समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या है कि हर कोई उनसे डरता है कोई भी उनको कोई बोल नही सकता वह  रूठ जाती थी, यहां तक की मेरे सास ससुर भी उनकी बातें मानते थे । वह जॉब करती थी। मुझे वह पत्थर दिल लगती थी । वे मुुुझसे ज्यादा बात भी नहीं करती थी । उनका एक रूटिन बना था उसमें कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता था वह 6:00 बजे उठ कर घूमने जााती थी 8:00 बजे उन्हें नाश्ता चाहिए था पेपर के साथ चाय नाश्ता करनेे के बाद 10:00 बजे ऑफिस जाती थी ।ऑफिस से 4:00 बजे वापस आती थी । और आकर आराम कुर्सी पर आराम करती थी शाम को टहलने निकलती थी उसके बाद 9:00 बजे सो जाती थी उनका पूरा रूटीन था और सब काम टाइम टेेेेबल से ही करती थी ।मगर वह वह घर का कोई काम नह...
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“The Iron never lies to you. You can walk outside and listen to all kinds of talk, get told that you’re a god or a total bastard. The Iron will always kick you the real deal. The Iron is the great reference point, the all-knowing perspective giver. Always there like a beacon in the pitch black. I have found the Iron to be my greatest friend. It never freaks out on me, never runs. Friends may come and go. But two hundred pounds is always two hundred pounds.”

*हमारे शब्द ही हमारे कर्म है।* *महाभारत के युद्ध के बाद*

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*हमारे शब्द ही हमारे कर्म है।* *महाभारत के युद्ध के बाद* 18 दिन के युद्ध ने द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। उसकी आंखे मानो किसी खड्डे में धंस गई थी, उनके नीचे के काले घेरों ने उसके रक्ताभ कपोलों को भी अपनी सीमा में ले लिया था। श्याम वर्ण और अधिक काला हो गया था । युद्ध से पूर्व प्रतिशोध की ज्वाला ने जलाया था और युद्ध के उपरांत पश्चाताप की आग तपा रही थी । ना कुछ समझने की क्षमता बची थी ना सोचने की । कुरूक्षेत्र मेें चारों तरफ लाशों के ढेर थे। जिनके दाह संस्कार के लिए न लोग उपलब्ध थे न साधन । शहर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर केे महल मेंं निश्चेष्ट बैठी हुई शूूूून्य को ताक रही थी । तभी कृष्ण कक्ष में प्रवेश करते हैं ! महारानी द्रौपदी की जय हो । द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है कृष्ण उसके सर को सहलातेे रहते हैं और रोने देते हैं थोड़ी देर में उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं । *द्रोपती*...

मानवता का अप्रतिम उदाहरण।

कल बाज़ार में फल खरीदने गया, तो देखा कि एक फल की रेहड़ी की छत से एक छोटा सा बोर्ड लटक रहा था, उस पर मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था... "घर मे कोई नहीं है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टॉयलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल लें, रेट साथ में लिखे हैं। पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, धन्यवाद!!" अगर आपके पास पैसे नहीं हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाज़त है..!! मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले दर्जन भर केले लिये, बैग में डाले, प्राइस लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया, वहाँ सौ-पचास और दस-दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमें रख कर उसे ढंक दिया। बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं उधर से  निकला, तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो मुझे देखकर मुस्कुराया और बोला "साहब! फल तो खत्म हो गए।" उसका नाम पूछा तो बोला: "सीताराम" फिर हम सामने वाले ढ...

वाराणसी#काशी

वाराणसी। काशी में एक ऐसा भी थाना है जहां आज भी इस थाने का प्रभारी थाने की मुख्य कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पता वो बैठा भी होता है तो अपने ऑफिस में कुर्सी के बगल में एक दूसरी कुर्सी लगाकर।दरअसल ये थाना है वाराणसी कोतवाली का जहां के इंचार्ज बाबा कालभैरव को कहा जाता हैं। यही नहीं आज तक इस थाने का निरीक्षण किसी डीएम या एसएसपी ने नहीं किया है क्योंकि वो तो खुद ही अपने ज्वाइनिंग से पहले यहां आशीर्वाद लेने आते हैं और जिसे बाबा चाहते हैं वो नगरी में कार्य करता है।तो आइए जाने क्या है इस मंदिर और इस थाने की अनसुनी कहानी। वाराणसी विशेश्वरगंज इलाके में शहर का कोतवाली थाना है और इसी थाने के ठीक पीछे बाबा कालभैरव का मंदिर है। वर्तमान प्रभारी राजेश सिंह ने OneIndia से बात करते हुए कहा कि ये परंपरा आज की नहीं है। ये परंपरा सालों से चली आ रही है, कोतवाली थाने के इस इंस्पेक्टर के ऑफिस में दो कुर्सियां लगाई गई हैं। जिसमे जो मेन चेयर है उसपर बाबा काल भैरव विराजमान होते हैं और इस थाने का इंस्पेक्टर बगल की कुर्सी पर बैठता है। यही नहीं राजेश सिंह ने कहा की इस थाना क्षेत्र में अपराध से लेकर सामा...

बेटे डोली में विदा नही होते

बेटे डोली में विदा नही होते, और बात है मगर --- उनके नाम का "ज्वाइनिंग लेटर" आँगन छूटने का पैगाम लाता है ! जाने की तारीखों के नज़दीक आते आते मन बेटे का चुपचाप रोता है अपने कमरे की दीवारें देख देख घर की आखरी रात नही सोता है, होश संभालते संभालते घर की जिम्मेदारियां संभालनेने लगता है विदाई की सोच में बैचेनियों का समंदर हिलोरता है शहर, गलियाँ , घर छूटने का दर्द समेटे सूटकेस में किताबें और कपड़े सहेजता है जिस आँगन में पला बढ़ा, आज उसके छूटने पर सीना चाक चाक फटता है अपनी बाइक , बैट , कमरे के अजीज पोस्टर छोड़ आँसू छिपाता मुस्कुराता निकलता है ......... अब नही सजती गेट पर दोस्तों की गुलज़ार महफ़िल ना कोई बाइक का तेज़ हॉर्न बजाता है बेपरवाही का इल्ज़ाम किसी पर नही अब झिड़कियाँ सुनता देर तक कोई नही सोता है वीरान कर गया घर का कोना कोना जाते हुए बेटी सा सीने से नही लगता है ट्रेन के दरवाजे में पनीली आंखों से मुस्कुराता है दोस्तों की टोली को हाथ हिलाता अलगाव का दर्द जब्त करता, खुद बोझिल सा लगता है बेटे डोली में विदा नही होते ये और बात है ........ फिक्र करत...

कलियुग का लक्ष्मण

" भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (इतवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा। " क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?" " नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।" " अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला। "छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।" " बस भैया ", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया। " अपना मकान" , " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे। भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये। प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई ...

"कच्ची नीम की निम्बौरी सावन जल्दी अईयो रे.........''

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सावन मनभावन हम सभी के जीवन में मनभावन सावन से जुड़ी कुछ खट्टी-मीठी यादें ,कुछ किस्से-कहानियाँ जरुर होते हैं । किसी दोस्त,परिवार या प्यार के साथ बीता कोई बरसात का  दिन और कुछ नही तो बचपन में अपने शरारती मनभावन सावन दोस्तों के साथ मिलकर झमाझम  बरसात में की गई ढेर सारी शैतानियाँ,इन्हें तो कोई भुला ही नही सकता ।ये टिप टिप करती बूँदें जाने क्या -क्या भूला बिसरा याद दिलाती हैं ! यादों का शहद घुला होता है इन बूंदों में ...! ये बूँदें बहुत कुछ कहती है गुनगुनाती है पर चौतरफा शोर से घिरे हुए हम इन्हे अनसुना कर देते है । ये और-और की तृष्णा औरों से ज्यादा जोड़ने की चाहत और बाहर -भीतर के शोर से घिरे हम जब अपनी ही आवाज़ को अनसुना कर देते है तो भला बूँदों की आवाज़ को कैसे सुनेंगे !! वरना कौन ऐसा है जिसे झमाझम बारिश को देख बचपन की शैतानियां याद ना आती हो ! बूंदों के हथेलियाँ  को छूते ही यादों के सन्दूक खुद व खुद खुल जाते हैं । आज सावन को खिड़की से देखते हुए जब छन -छन करती बूँदों के सुर में पत्तों को थिरकते देखा तो अहसास हुआ कि  जीवन की आपाधापी में जाने कब इतने व्यस्त...