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Showing posts from March, 2019

*संसार की समस्त प्यारी - प्यारी बेटियों को समर्पित

प्रस्तुत है वो कहानी जो मेरे अंतर्मन को छू गई शहर के एक अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बग़ीचे में तेज़ धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, बड़ी लग्न से पेड़ - पौधों की काट छाँट में लगा था कि तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, "गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।"      गंगादास को आख़िरी के पांँच शब्दों में काफ़ी तेज़ी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वज़ह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है।       शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ़ किया और  चल दिया, द्रुत गति से प्रधानाचार्या के कार्यालय की ओर।        उसे प्रधानाचार्या महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी हृदयगति बढ़ गई थी।  सोच रहा था कि उससे क्या ग़लत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्या महोदया ने  तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।       वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था। पता नहीं क्या ग़लती हो गयी।...

बाबू की हंसी

बाबू की हंसी कल अपनी पुरानी सोसाइटी में गया था। वहां मैं जब भी जाता हूं, मेरी कोशिश होती है कि अधिक से अधिक लोगों से मुलाकात हो जाए। कल अपनी पुरानी सोसाइटी में पहुंच कर गार्ड से बात कर रहा था कि और क्या हाल है आप लोगों का, तभी मोटरसाइकिल पर एक आदमी आया और उसने झुक कर प्रणाम किया। *“संदीप भैया, प्रणाम।”* मैंने पहचानने की कोशिश की। बहुत पहचाना-पहचाना लग रहा था। पर नाम याद नहीं आ रहा था। उसी ने कहा, *"भैया पहचाने नहीं? हम बाबू हैं। बाबू। उधर वाली आंटी के जी के घर काम करते थे।"* मैंने पहचान लिया। अरे ये तो बाबू है। सी ब्लॉक वाली आंटी जी का नौकर। *“अरे बाबू, तुम तो बहुत तंदुरुस्त हो गए हो। आंटी कैसी हैं?”* बाबू हंसा।  *“आंटी तो गईं।”* *“गईं? कहां गईं? उनका बेटा विदेश में था, वहीं चली गईं क्या? ठीक ही किया उन्होंने। यहां अकेले रहने का क्या मतलब था?”* अब बाबू थोड़ा गंभीर हुआ। उसने हंसना रोक कर कहा, *“भैया, आंटी जी भगवान जी के पास चली गईं।”* *“भगवान जी के पास? ओह! कब?”* बाबू ने धीरे से कहा, *“दो महीने हो गए।”* *“क्या हुआ था आंटी को?”* *“कुछ नहीं। बुढ़ापा ...

नारी ही नारी की

        नारी ही नारी की नारी ही नारी की दूश्मन है घर घर में ये बात होती है । सास बहू के झगड़ो की जग जाहिर चर्चा होती है । माँ बहिन बेटी के रूप में पत्नी और बहू के रूप में । एक महिला नारी ही होती है  । फिर भी ईर्षा क्यों करती है । जब भी सास वो बनती है  । भेद भाव घर में करती है । बहू को बेटी जैसा क्यों घर में आदर नहीं करतीं है । आज सास जो बन जाती है एक दिन वो भी बेटी बहू होती है । सास का पद मिलते ही क्यों रौद्र रूप धारण करती है । बेटे की जब शादी करती है मनमाना दहेज माँगती है  । अपनी बेटी की शादी जब करती दहेज विरोधी पक्ष में रहती है । एक महिला नारी होकर भी रूप भाव बदलती रहती है । नारी ही नारी की दुश्मन  है महिला होकर नहीं समझती है । पुरुषों के बरावर हक माँगती अत्याचारों का रोना भी रोती । ऐसे ही नारी के रूप अनेक है नारी की ये मंशा समझ न आती ।    

सब्र की जड़े...

सब्र की जड़े...* *चाहें "जैसी" भी हो।* *इसके फ़ल...* *सदैव "मीठे" होते हैं॥* व्यक्ति क्या है ये महत्वपूर्ण नहीं है         परन्तु व्यक्ति में क्या है ये बहुत महत्वपूर्ण है  

*ऐसे अशआर भी बहुत बड़ी तादाद में हैं, जिनका एक ही मिसरा इतना मशहूर हुआ कि ज़्यादातर लोग दूसरे मिसरे से वाक़िफ़ ही नहीं होते।

ऐसे अशआर भी बहुत बड़ी तादाद में हैं, जिनका एक ही मिसरा इतना मशहूर हुआ कि ज़्यादातर लोग दूसरे मिसरे से वाक़िफ़ ही नहीं होते। ऐसे ही चन्द मशहूर अशआर यहाँ पेश हैं: "ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है, *वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*" *- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़* "ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा, *छूटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई।"* दुख़्तर-ए-रज़ = शराब *- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़* "भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया, *ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"* *- माधव राम जौहर* "चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले, *आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"* *- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी* "दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से, *इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"* *- महताब राय ताबां* "ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम, *रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"* *- क़मर बदायुनी* "ख़ंजर चले किसी पे, तड़पते हैं हम 'अमीर', *सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है...

अधूरा प्यार: लघुकथा।

आज सुबह जब पत्नी के साथ बैठकर चाय के साथ अख़बार पढ़ रहा था तो अचानक ही एक जाना पहचाना चेहरा दिखा. खबर थी कि,"सरपंच के रूप में उत्कृष्ट काम कर रही हैं नीलिमा".  उसका नाम पढ़ते ही दिल में एक हलचल सी हुई. ये वही नीलिमा थी जो इंजीनियरिंग की तैयारी करते समय कब दोस्त बन गयी और दोस्ती कब प्यार में बदल गयी, पता ही नहीं चला था. पत्नी के जाने के बाद मैने ध्यान से फोटो देखा  और खबर पढ़ी. पर हैरान इस बात से था कि वो तो IIT Delhi से बीटेक कर चुकी थी. फिर सरपंच कैसे बन गयी. कई बरसों बाद आज अचानक से उससे बात करने का मन हो रहा था. लेकिन मेरे पास उसका कोई नंबर नहीं था. दिन भर ऑफीस में इंटरनेट पर उसे ढूंढता रहा. फिर फेसबूक पर एक फ़्रेंड से उसका नंबर मिला. ऑफीस से निकलते ही मैने फ़ोन मिलाया. 'हैलो, कौन?" उधर से एक मीठी आवाज़ आई. कुछ सेकेंड तक मैं चुप रहा. फिर बोला, "मैं बोल रहा हूँ." "मैं कौन?" उसने सवाल किया. फिर भी मैं चुप रहा. फिर थोड़ी देर बाद उससने बोला, "कौन? रोहित?" मैने कहा, "हाँ". शायद अब भी उसे मेरी खामोशी को महसूस करने की ...