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Showing posts from August, 2019

बिना दहेज़ के

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, उसके चहरे पर पहले तो बिल्कुल मासूम सी मुस्कराहट फैल जाती है, फिर वह मुस्कराहट उदासी में बदलते हुए पलकों पर अश्रु के बूँदों के रूप में नज़र आने लगती है। फिर थोड़ा नाख़ुश सा होकर कहती है, मैँ कहती थी ना पुरानी बातें तकलीफ़ देती है, ना जाने क्यों तुम हमेशा गुजरे ज़माने की बातें करते हो? उसने बताया कि वह बचपन में बहुत शरारती थी, घर में सबसे छोटी थी तो सबकी लाडली भी थी। निश्चय ही वह बचपन में बहुत खूबसूरत और चंचल रही होगी। उसके दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनें है।बहुत कहने पर उसने अपनी संक्षिप्त आपबीती सुनाई, उसने बताया कि जब वह बारहवीं कक्षा में थी तो उसके घर पर उसके छोटे भैया का दोस्त आया करता था, परिवार में सब लोग उसके व्यक्तित्व और व्यवहार से प्रभावित थे। वह अक्सर छोटे भैया के साथ ही आता और हल्का - फुल्का चाय नाश्ता करके फिर भैया के साथ ही चला जाता था। पहली बार जब मैं उनदोनों को चाय देने गई तो वह लड़का मुझे बहुत ही उदास नजरों से देर तक देखता रहा था। धीरे - धीरे उसका घर पर आना - जाना बढ़ गया था, मुझे भी वह अच्छा लगता था मगर हमारे बीच एक - दूसरे को देखने के अलावा ...

बेटी पढ़ाओ बेटी ।

पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए  गिद कर रही थी ।  “किस भाव से दिए भाई?” पापा ने सवाल किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया…… पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है….जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। . पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने। यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब… अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे माँग पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी…. जिसकी शादी उसने तीन साल पहले एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी…… उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी छोटी बातों प...

अनोखी ससुराल

तीज का त्यौहार आने वाला था। तुलसी जी की दोनों बहुओं के मायके से तीज का सामान भर भर के उनके भाइयों द्वारा पहुंचा दिया गया था। छोटी बहू मीरा का यह शादी के बाद पहला त्यौहार था। चूँकि मीरा के माता पिता का बचपन में ही देहांत हो जाने के कारण, उसके चाचा चाची ने ही उसे पाला था इसलिए और हमेशा हॉस्टल में रहने के कारण उसे यह सब रीति-रिवाजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। पढ़ने में होशियार मीरा को कॉलेज के तुरंत बाद जॉब मिल गई। आकाश और वो दोनों एक ही कंपनी में थे। जहां दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया और घरवालों ने भी बिना किसी आपत्ति के दोनों की शादी करवा दी। आज जब मीरा ने देखा कि उसकी जेठानियों के मायके से शगुन में ढ़ेर सारा सुहाग का सामान, साड़ियां, मेहंदी, मिठाईयां इत्यादि आया है तो उसे अपना कद बहुत छोटा लगने लगा।मायके के नाम पर उसके चाचा चाची का घर तो था, परंतु उन्होंने मीरा के पिता के पैसों से बचपन में ही हॉस्टल में एडमिशन करवा कर अपनी जिम्मेदारी निभा ली थी और अब शादी करवा कर उसकी इतिश्री कर ली थी। आखिर उसका शगुन का सामान कौन लाएगा, ये सोच सोचकर मीरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। जेठानियो...