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कन्यादान नहीं करूंगा

 कन्यादान नहीं करूंगा जाओ , मैं नहीं मानता इसे , क्योंकि मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं , जिसको दान में दे दूँ ; मैं बांधता हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में , पति के साथ मिलकर निभाना तुम , मैं तुम्हें अलविदा नहीं कह रहा , आज से तुम्हारे दो घर , जब जी चाहे आना तुम , जहाँ जा रही हो , खूब प्यार बरसाना तुम , सब को अपना बनाना तुम , पर कभी भी , न मर मर के जीना , न जी जी के मरना तुम , तुम अन्नपूर्णा , शक्ति , रति सब तुम , ज़िंदगी को भरपूर जीना तुम , न तुम बेचारी , न अबला , खुद को असहाय कभी न समझना तुम , मैं दान नहीं कर रहा तुम्हें , मोहब्बत के एक और बंधन में बाँध रहा हूँ , उसे बखूबी निभाना तुम .................

इंसान जाने कहां खो गये हैं....!

जाने क्यूँ, अब शर्म से, चेहरे गुलाब नहीं होते। जाने क्यूँ, अब मस्त मौला *मिजाज नहीं होते। पहले बता दिया करते थे, *दिल की बातें*, जाने क्यूँ,अब चेहरे, खुली किताब नहीं होते। सुना है,बिन कहे, दिल की बात, समझ लेते थे गले लगते ही, दोस्त, हालात समझ लेते थे। तब ना फेस बुक था, ना स्मार्ट फ़ोन, ना ट्विटर अकाउंट, एक चिट्टी से ही, दिलों के जज्बात, समझ लेते थे। सोचता हूँ, हम कहाँ से कहाँ आ गए, व्यावहारिकता सोचते सोचते, भावनाओं को खा गये।* अब भाई भाई से, समस्या का *समाधान,कहाँ पूछता है, अब बेटा बाप से, उलझनों का निदान, कहाँ पूछता है बेटी नहीं पूछती, *माँ से गृहस्थी के सलीके, अब कौन गुरु के, चरणों में बैठकर, ज्ञान की परिभाषा सीखता है। परियों की बातें, अब किसे भाती है, अपनों की याद, अब किसे रुलाती है, अब कौन, गरीब को सखा बताता है, अब कहाँ, कृष्ण सुदामा को गले लगाता है जिन्दगी में, हम केवल *व्यावहारिक हो गये हैं, *मशीन बन गए हैं हम सब, *इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!