कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .
सावन मनभावन हम सभी के जीवन में मनभावन सावन से जुड़ी कुछ खट्टी-मीठी यादें ,कुछ किस्से-कहानियाँ जरुर होते हैं । किसी दोस्त,परिवार या प्यार के साथ बीता कोई बरसात का दिन और कुछ नही तो बचपन में अपने शरारती मनभावन सावन दोस्तों के साथ मिलकर झमाझम बरसात में की गई ढेर सारी शैतानियाँ,इन्हें तो कोई भुला ही नही सकता ।ये टिप टिप करती बूँदें जाने क्या -क्या भूला बिसरा याद दिलाती हैं ! यादों का शहद घुला होता है इन बूंदों में ...! ये बूँदें बहुत कुछ कहती है गुनगुनाती है पर चौतरफा शोर से घिरे हुए हम इन्हे अनसुना कर देते है । ये और-और की तृष्णा औरों से ज्यादा जोड़ने की चाहत और बाहर -भीतर के शोर से घिरे हम जब अपनी ही आवाज़ को अनसुना कर देते है तो भला बूँदों की आवाज़ को कैसे सुनेंगे !! वरना कौन ऐसा है जिसे झमाझम बारिश को देख बचपन की शैतानियां याद ना आती हो ! बूंदों के हथेलियाँ को छूते ही यादों के सन्दूक खुद व खुद खुल जाते हैं । आज सावन को खिड़की से देखते हुए जब छन -छन करती बूँदों के सुर में पत्तों को थिरकते देखा तो अहसास हुआ कि जीवन की आपाधापी में जाने कब इतने व्यस्त...
पिछले दिनों सोना 56% के करीब ऊपर गया। प्रॉपर्टी और स्टॉक्स में भी उछाल आया। लेकिन सैलरी 6-7% की दर से कम हुई। जिन्हें मार्केट रेट से बढ़ना चाहिए वो नहीं बढ़ रही। कंपनियां हायरिंग बंद कर रही हैं। ज्यादा स्किल्ड लोग कम सैलरी में नौकरी करने को मजबूर है जिसके चलते कम स्किल्ड और अनुभवी लोगों, नए नए कॉलेज से निकले बच्चों को जायज नौकरी नहीं मिल रही है। इस सब में मिडिल क्लास पिछड़ रहा हैं। उसे पता नहीं है लेकिन वो धीरे धीरे गरीबी की तरफ बढ़ रहा है। सरकार टैक्स बढ़ाती जा रही है। GST हो या इनकम टैक्स , सरकार अपनी आमदनी को पूरी तरह रेग्यूलेट कर रही है। लेकिन कर्मचारियों की आमदनी को भगवान भरोसे छोड़ा हुआ है। उनके वेजेज/तनख्वाह को रेग्यूलेट नहीं कर रही। न उनको मिलने वाली कोईं सुविधा रेग्यूलेटेड है। टैक्स का मारा उद्योगपति भी कर्मचारियों सेअमानवीय ढंग से काम करवाना चाहता है। ताकि उसका मुनाफा बढ़ सके। वो एक ही आदमी से डबल शिफ्ट और काम के घंटे बढ़वाना चाहता है। उद्योगपति कह रहा की इतवार को भी काम करो। घर बैठ के बीवी का मुंह देखोगे क्या। महिलाओं की भी नाइट शिफ्ट शुरू करो। ये सब एक चैन है। ऊपर से न...
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