कभी इतने ऊँचे मत होना कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ . न कभी इतने बुद्धिजीवी कि मेहनतकशों के रंग से अलग हो जाए तुम्हारा रंग . इतने इज़्ज़तदार भी न होना कि मुँह के बल गिरो तो आँखें चुराकर उठो . न इतने तमीज़दार ही कि बड़े लोगों की नाफ़रमानी न कर सको कभी . इतने सभ्य भी मत होना कि छत पर प्रेम करते कबूतरों का जोड़ा तुम्हें अश्लील लगने लगे और कंकड़ मारकर उड़ा दो उन्हें बच्चों के सामने से . न इतने सुथरे ही होना कि मेहनत से कमाए गए कॉलर का मैल छुपाते फिरो महफ़िल में . इतने धार्मिक मत होना कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ . न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको . कभी इतने स्थायी मत होना कि कोई लड़खड़ाए तो अनजाने ही फूट पड़े हँसी . और न कभी इतने भरे-पूरे कि किसी का प्रेम में बिलखना और भूख से मर जाना लगने लगे गल्प। .
दिन के चौबीस घंटों में तुम्हें एक घंटा मौन रहना जरूरी है, जब भी तुम्हारी सुविधा हो। तुम्हारा आंतरिक संवाद चलता रहेगा लेकिन तुम उसके भागीदार मत बनो। बिना संलग्न हुए सुनो। कुंजी यह है कि आंतरिक वार्तालाप को इस भांति सुनो जैसे दो व्यक्तियों को बोलते हुए सुनते हो। तटस्थ रहो। संलग्न मत होओ, दिमाग का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को क्या बता रहा है इसे सुनो। जो भी आ रहा है उसे आने दो, उसे दबाओ मत; सिर्फ साक्षी रहो। तुमने वर्षों से जो भी कूड़ा इकट्ठा किया है वह निकलेगा। दिमाग को कभी इस कचरे को बाहर फेंकने की इजाजत नहीं दी गई है। एक बार मौका मिलने पर मन ऐसे दौड़ेगा जैसे लगाम छूटने पर घोड़ा भागता है।उसे भागने दो। तुम सिर्फ बैठो और अवलोकन करो। इस तरह सिर्फ देखना धीरज की कला है। तुम उस घोड़े पर सवार होना चाहोगे, उसे दिशा देना चाहोगे इधर या उधर क्योंकि यह तुम्हारी पुरानी आदत है। इस आदत को तोड़ने के लिए तुम्हें धीरज की जरूरत है। मन जहां भी जाए उसे सिर्फ देखना। इसमें कोई...
सावन मनभावन हम सभी के जीवन में मनभावन सावन से जुड़ी कुछ खट्टी-मीठी यादें ,कुछ किस्से-कहानियाँ जरुर होते हैं । किसी दोस्त,परिवार या प्यार के साथ बीता कोई बरसात का दिन और कुछ नही तो बचपन में अपने शरारती मनभावन सावन दोस्तों के साथ मिलकर झमाझम बरसात में की गई ढेर सारी शैतानियाँ,इन्हें तो कोई भुला ही नही सकता ।ये टिप टिप करती बूँदें जाने क्या -क्या भूला बिसरा याद दिलाती हैं ! यादों का शहद घुला होता है इन बूंदों में ...! ये बूँदें बहुत कुछ कहती है गुनगुनाती है पर चौतरफा शोर से घिरे हुए हम इन्हे अनसुना कर देते है । ये और-और की तृष्णा औरों से ज्यादा जोड़ने की चाहत और बाहर -भीतर के शोर से घिरे हम जब अपनी ही आवाज़ को अनसुना कर देते है तो भला बूँदों की आवाज़ को कैसे सुनेंगे !! वरना कौन ऐसा है जिसे झमाझम बारिश को देख बचपन की शैतानियां याद ना आती हो ! बूंदों के हथेलियाँ को छूते ही यादों के सन्दूक खुद व खुद खुल जाते हैं । आज सावन को खिड़की से देखते हुए जब छन -छन करती बूँदों के सुर में पत्तों को थिरकते देखा तो अहसास हुआ कि जीवन की आपाधापी में जाने कब इतने व्यस्त...
Comments
Post a Comment