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Showing posts from November, 2020

सब यहीं छूट जाता है।

 *रात मैं पत्नी के साथ होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नाश्ता करने गया। क्योंकि नाश्ता का समय साढ़े दस बजे तक ही होता है, इसलिए होटल वालों ने बताया कि जिसे जो कुछ लेना है, वो साढ़े दस बजे तक ले ले। इसके बाद बुफे बंद कर दिया जाएगा।* *कोई भी आदमी नाश्ते  में क्या और कितना खा सकता है? पर क्योंकि नाश्ताबंदी का फरमान आ चुका था इसलिए मैंने देखा कि लोग फटाफट अपनी कुर्सी से उठे और कोई पूरी प्लेट फल भर कर ला रहा है, कोई चार छोले भटुरे का  ऑर्डर कर रहा है। कोई इडली, डोसा उठा लाया तो  एक आदमी दो-तीन गिलास जूस के उठा लाया। कोई बहुत से टोस्ट प्लेट में भर लाया और साथ में शहद, मक्खन और सरसो की सॉस भी।*  *मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठ कर ये सब देखता रहा ।* *एक-दो मांएं अपने बच्चों के मुंह में खाना ठूंस रही थीं। कह रही थीं कि फटाफट खा लो, अब ये रेस्त्रां बंद हो जाएगा।*   *जो लोग होटल में ठहरते हैं, आमतौर पर उनके लिए नाश्ता मुफ्त होता है।*  *मतलब होटल के किराए में सुबह का नाश्ता शामिल होता है।*  *मैंने बहुत बार बहुत से लोगों को देखा है कि वो कोशिश करते हैं कि सुबह द...

घर में छूटी औरतों

 बहु लिवाने गई बारात के पीछे  घर पर बची औरतों के जिम्मे  उतने ही काम होते हैं, जितने बारात की अगुवाई  मेहमानवाज़ी करते घरातियों के जिम्मे! बिखरे कंघों, सेफ्टीपिनों हेयरक्लिपों, दुपट्टों, चूड़ियों, बची पूड़ियों सूखती भाजी,  बूढ़ी अम्मा की नाराजी, हेयर ड्रायरों के प्लग सबके अधखुले बैगों  सूटकेसों को सहेजकर  गिनकर रखते कुल जमा नग, ढोलक, बतासे , देवघर में सजे  दई-पितरों की आन थापे - हत्थड़ी के  आगे जलते दीए, दरियों की झाड़ पुंछावट बहु के कमरे की साज सजावट उनींदे बैठकर गवते गीत ब्याहली की अगुवाई को याद कर गिनती भूल-बिसरी रसम-रीत आरते के थाल की रोली मीठे चावल को पकती मेवों की सौंधी बघारी  बड़बूढ़न के सोने को ढूंढकर बिछते गद्दे भंडारे में सहेजकर रखते  भाजी-परोसे के डिब्बे, मेहमान विदाई को गिनकर भरते लिफाफे , साड़ी-जोड़े संग गोले रुमाल और साफे , इन सबके बीच  घर पर बची औरतें  इस धर-उठाई में बन जाती हैं  वे बैकस्टेज पर्फार्मिंग आर्टिस्ट्स  जिनकी पर्फार्मेंस शादी की  एलबम की तस्वीरों और वीडियो फिल्म में  कवर होने ...

लौट आया नरेन

 आज  तक तो कभी उसके साथ ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन आज उसके साथ यह क्या हो रहा है, वह समझ ही नहीं पा रहा। कभी भावना गीत बन जाती है, तो कभी गीत भावना में बह जाता है। वह अपने आप को पर्वत की सूखी चोटी समझता रहा है, फिर आज वह हिमाच्छादित शिखर कैसे बनता जा रहा है? अभी-अभी पापा का फोन आया था। हालांकि उन्होंने शब्दों में तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन उनके बार-बार रुंधते गले और रह-रह कर नाक सुड़कने की आवाज ने बहुत कुछ कह दिया था। उसे काफ़ी वर्ष पहले पढ़ी पापा की एक लघुकथा 'लौट आओ नरेन' याद आ रही थी। लघुकथा का नायक नरेन बिल्कुल उसी की तरह एमबीबीएस करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चला जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। कथा-नायक का पिता उसे बहुत समझाता है- 'मेरे और अपनी मम्मी के लिए नहीं, तो अपनी मातृभूमि के लिए ही आ जाओ बेटा! उसका कर्ज तो तुम हजारों जन्म निछावर करके भी नहीं उतार सकते। अमेरिका के लोग तो बहुत धनी हैं, लेकिन तुम्हारे देश के गरीब मरीज़ तो तुम्हारे पास ईलाज के लिए नहीं आ पायेंगे ना! फिर उन्हें तुम्हारी उच्च शिक्षा और प्रतिभा का क्या फायदा हुआ?' आदि-आदि। लेकिन कथा-ना...

मेरे जाने के बाद

  मेरे जाने के बाद कहीं कोई उदास नहीं होगा  सिवाय ख़ुद मेरे जैसे किसी के आने जाने को लेते हैं वैसे ही मेरे जाने को लेंगे सब लोग ख़ुद मुझे भी इसी तरह लेना चाहिए अपने जाने को  सब मुझे विदा करेंगे गर्मजोशी से और लग जाएंगे अपने अपने कामों में मैं सुबह-सुबह जागते ही जिस पेड़ को  देखता था खिड़की खोलकर  वह पेड़ मुझे याद नहीं करेगा  जिस पानी से अपनी प्यास बुझाता था  जिस पानी से मल-मल कर खूब नहाता था मैं वह पानी नहीं याद करेगा जो हवा दिन-रात मेरी सांसों को चलना सिखाती थी वो हवा नहीं याद करेगी मुझे मैं जिस घर को छोड़कर जाऊँगा  उस घर को भी नहीं याद आऊंगा मैं जबकि इस घर को कभी नहीं भूल पाऊँगा मैं इस घर में कई-कई रात मैं बेहद फूट-फूटकर फफक-फफककर रोया हूँ क्या कोई सुन पाएगा ? जो कोई आएगा इस घर में मेरी जगह क्या यह घर उसे बता पाएगा किसकी प्रतीक्षा रही दिन-रात इस घर में मुझे ? क्या इस घर की छत को याद आएँगी मेरी वो डबडब लाचार आँखें जो रात-भर ताकती थीं उसे एकटक अकारण इस घर की चौखट को क्या याद आएँगे मेरे वो पाँव जो हरदम थके-थके से लौटते थे क्या इस घर के दरवाजे को या...

पुरुष

 पुरुष का रोना  व्याकुल कर जाता है, उस आसमान को जिसने अपना दर्द हंसते हंसते  सौंप दिया था, एक दिन बारिश को ! पुरुष का रोना  हरबार ढूंढता है मां का आँचल, प्रेमिका का काजल, बहन का कांधा, अपने तकिए का कोना! पुरुष के रोते ही  पुरुष हो जाती है  वह स्त्री जो पोंछती है उसके आँसूं , और मर जाता है  वह दर्द जो जीत कर  मुस्कुरा रहा था  उस पुरुष से ! पुरुष के रोने से टूट जाते हैं पितृसत्ता के पाषाण हृदय ताले  और खुल जाते हैं द्वार  उन अहसासों के जो उसे उसके भी  इंसान होने का अहसास दिलाते हैं ! पुरुष के रोते ही पृथ्वी आकाश से  अपनी गति, स्थिति और  कक्षा की मंत्रणा कर हिसाब लगाती है उस आँसू का जो गृहों की चाल के सारे गणित  बिगाड़ कर रख देता है