लौट आया नरेन
आज तक तो कभी उसके साथ ऐसा नहीं हुआ था। लेकिन आज उसके साथ यह क्या हो रहा है, वह समझ ही नहीं पा रहा। कभी भावना गीत बन जाती है, तो कभी गीत भावना में बह जाता है। वह अपने आप को पर्वत की सूखी चोटी समझता रहा है, फिर आज वह हिमाच्छादित शिखर कैसे बनता जा रहा है?
अभी-अभी पापा का फोन आया था। हालांकि उन्होंने शब्दों में तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन उनके बार-बार रुंधते गले और रह-रह कर नाक सुड़कने की आवाज ने बहुत कुछ कह दिया था।
उसे काफ़ी वर्ष पहले पढ़ी पापा की एक लघुकथा 'लौट आओ नरेन' याद आ रही थी। लघुकथा का नायक नरेन बिल्कुल उसी की तरह एमबीबीएस करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चला जाता है और फिर वहीं का होकर रह जाता है। कथा-नायक का पिता उसे बहुत समझाता है- 'मेरे और अपनी मम्मी के लिए नहीं, तो अपनी मातृभूमि के लिए ही आ जाओ बेटा! उसका कर्ज तो तुम हजारों जन्म निछावर करके भी नहीं उतार सकते। अमेरिका के लोग तो बहुत धनी हैं, लेकिन तुम्हारे देश के गरीब मरीज़ तो तुम्हारे पास ईलाज के लिए नहीं आ पायेंगे ना! फिर उन्हें तुम्हारी उच्च शिक्षा और प्रतिभा का क्या फायदा हुआ?' आदि-आदि। लेकिन कथा-नायक पर इसका कोई असर नहीं हुआ- 'इन सब व्यर्थ की बातों के लिए मैं अपना कैरियर तो बर्बाद नहीं कर सकता ना!' और कथा-नायक का पिता पापा के टूटते शब्दों की तरह ही टूटकर चला गया था।
उसे लगा कि यह लघुकथा अभी-अभी फिर लिखी गई है और इसका नायक कोई और नहीं वह स्वयं है। किंतु वह इसका अंत पहले जैसा नहीं होने देगा। उसने सोचा और पापा को फोन लगा दिया- "मैं इंडिया आ रहा हूं पापा!"
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