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Showing posts from July, 2021

अब और मत झुकना

*पीठ में बहुत दर्द था* डाॅक्टर ने कहा अब और  मत झुकना  अब और अधिक झुकने की गुंजाइश नहीं रही झुकते-झुकते  तुम्हारी रीढ़ की हड्डी में  गैप आ गया है  सुनते ही हँसी और रोना  एक साथ आ गया... ज़िंदगी में पहली बार  किसी के मुँह से  सुन रही थी ये शब्द  "मत झुकना..." बचपन से तो  घर के बड़े, बूढ़ों   माता-पिता और समाज से यही सुनती आई है, "झुकी रहना..." नारी के  झुके रहने से ही बनी रहती है गृहस्थी... नारी के  झुके रहने से ही बने रहते हैं संबंध नारी के  झुके रहने से ही बना रहता है प्रेम...प्यार...घर...परिवार झुकती गई, झुकते रही, झुकी रही, भूल ही गई... उसकी कहीं कोई  रीढ़ भी है... और ये आज कोई  कह रहा है "झुकना मत..." परेशान-सी सोच रही है कि क्या सच में  लगातार झुकने से  रीढ़ की हड्डी  अपनी जगह से खिसक जाती है ? और उनमें कहीं गैप, कहीं ख़ालीपन आ जाता है ? सोच रही है... बचपन से आज तक क्या क्या खिसक गया उसके जीवन से कहाँ कहाँ ख़ालीपन आ गया उसके अस्तित्व में  कहाँ कहाँ गैप आ गया उसके अंतरतम में  ...

अब मुझे भी जाना है

 मृत सागर की तरह अब मुझे भी हो जाना है,, जिस तरह उसकी गहराई में,, उतर न पाता कोई लहरे उसे तैरा देती हैं, डूबने नहीं देती,, और बाहर की ओर धकेल देतीं हैं,,, उसी तरह मुझे समाहित नहीं करना कुछ भी भीतर मेरे,, मुझे भी उदासीन हो जाना है .. जिस तरह उसमें घनत्व की अधिकता है,, उसी तरह मुझे भी बुन लेना है अपनी अन्तरात्मा को सघनता से कि कोई न पहुच पाए वहां तक,, न कोई आघात,न कोई औषधि.. जिस तरह उसमें लवणता  सबसे ज्यादा है,, उसी तरह मुझे भी  मिठास छोड़कर खारा हो जाना है..।

मुनीम_साहब

हमारे यहाँ एक मुनीम साहब थे, जोड़ घटाने में अत्यंत निपुण। बाबूजी उनको समाधानी कहते थे, ऐसा नही है कि वे हर समस्या का समाधान करना जानते थे, लेकिन उनसे मिलकर समस्याग्रस्त व्यक्ति शांति का अनुभव करता था।  इसका कारण मात्र इतना था कि यदि किसी व्यक्ति ने अपनी किसी समस्या का ज़िक्र उनसे किया तो मुनीम साब तुरंत बताते की वे स्वयं उस समस्या से बहुत लम्बे समय से जूझ रहे हैं। यदि कोई उनके पास रोता हुआ पहुँचता तो मुनीम साहब उसकी बात सुनते-सुनते उससे भी अधिक ज़ोर से रोने लगते थे, मुनीम साहब को रोता देखकर वो व्यक्ति अपना रोना भूलकर उनको चुप करने में व्यस्त हो जाता था।  एक दिन मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछा की वे ऐसा क्यों करते हैं ?  मुनीम साहब बोले- आदमी को समाधान से ज़्यादा तसल्ली, दूसरे की समस्या से मिलती है। अधिकतर लोगों को अपने दर्द की दवाई नहीं बल्कि हमदर्द चाहिए होता है, हमदर्दी दिखाने से उस पीड़ित व्यक्ति को लगता है की वो अकेला नहीं है जो कष्ट से जूझ रहा है, सम पीड़ा का भाव उसको चिंतामुक्त करते हुए आनंद से भर देता है। मैंने कहा- लेकिन इससे उनकी समस्या तो समाप्त नहीं होती, वो तो जैसी...