Posts

Showing posts from March, 2022

बाप_बेटी का प्रेम समुद्र से भी गहरा है।

बेटी की विदाई के वक्त बाप ही सबसे आखिरी में रोता है, क्यों, चलिए आज आप विस्तारित रूप से समझिए। बाकी सब भावुकता में रोते हैं, पर बाप उस बेटी के बचपन से विदाई तक के बीते हुए पलों को याद कर करके रोता है। #माँ_बेटी के रिश्तों पर तो बात होती ही है, पर बाप और बेटी का रिश्ता भी समुद्र से गहरा है। हर बाप घर के बेटे को गाली देता है, धमकाता और मारता है, पर वही बाप अपनी बेटी की हर गलती को नकली दादागिरी दिखाते हुए, नजर अंदाज कर देता है। बेटे ने कुछ मांगा तो एक बार डांट देता है, पर अगर बिटिया ने धीरे से भी कुछ मांगा तो बाप को सुनाई दे जाता है और जेब में रूपया हो या न हो पर बेटी की इच्छा पूरी कर देता है। दुनिया उस बाप का सब कुछ लूट ले तो भी वो हार नही मानता, पर अपनी बेटी के आंख के आंसू देख कर खुद अंदर से बिखर जाए उसे बाप कहते हैं। और बेटी भी जब घर में रहती है, तो उसे हर बात में बाप का घमंड होता है। किसी ने कुछ कहा नहीं कि वो बेटी तपाक से बोलती है, "पापा को आने दे फिर बताती हूं।" बेटी घर में रहती तो माँ के आंचल में है, पर बेटी की हिम्मत उसका बाप रहता है। बेटी की जब शादी में विदाई होती है तब...

महाभारत

 18 दिन के युद्ध ने,  द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था ... शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था..  पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था  अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।  तभी, श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं द्रौपदी  कृष्ण को देखते ही  दौड़कर उनसे लिपट जाती है ...  कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं  थोड़ी देर में,  उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।  द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ?? ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था । कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती वह हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है.. तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !  तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,  सारे कौरव समाप्त हो गए  तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !  द्रोपदी: सखा,  तुम मेरे घा...

सुख-दुख

गंगा नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था। पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे।   एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा।   जो आड़ा गिरा वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा।”   वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा– रुक जा गंगा….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा!   पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी.. वह लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े भी वहीं पहुंचेगा, जहां लड़कर.. थककर.. हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा।   वहीं दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था।   यह कहता हुआ कि “चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा… चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा….तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा।"  ...

consciousness

 यह पूरी सृष्टि तीन ही चीजों से बनी है स्पेस मैटर और टाइम तीनों में कॉमन यह है कि ये तीनों unconscious यानी चेतना विहीन तत्व हैं हम भी स्पेस मैटर और टाइम का हिस्सा हैं लेकिन हममे चेतना यानी consciousness है. इसलिए हम इस सृष्टि के चेतनाशील तत्व हैं. धरती चांद सितारे धूमकेतु आकाशगंगाये और हमारे ज्ञात यूनिवर्स में मौजूद जितने भी तत्व हैं सभी हमारे जैसे ही गतिशील हैं लेकिन उनमें चेतना नही है.इसलिए ये सभी सृस्टि के जड़ तत्व हैं. यह हमारा सूरज है गतिशील है यह कभी पैदा हुआ इस समय यह अपनी जवानी की दहलीज पर है और एक दिन वह समाप्त हो जायेगा. इसी सूरज का चक्कर लगाने वाली हमारी गतिशील मगर जड़ पृथ्वी पर विचरने वाला यह एक मामूली जीव है सूरज की तरह यह जीव भी गतिशील है यह भी कभी पैदा हुआ और इसकी भी मृत्यु निश्चित है दोनो में फर्क सिर्फ चेतना का है इस मामूली चींटी में चेतना है और यह विशाल सूरज चेतनविहीन है. अब सवाल यह है कि चेतना है क्या ? वह क्या चीज है जिसे हम चेतना कहते हैं चेतना आती कहाँ से है ? चेतना या कॉन्सेसनेस ही जीवन या जीवित होने का आधार है जिसमे यह नही वह जड़ है जिसमे यह है वह चेतन है. जीव...

रोटी

    पहली "सबसे स्वादिष्ट" रोटी "माँ की "ममता" और "वात्सल्य" से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।  एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।" उन्होंने आगे कहा  "हाँ, वही तो बात है।         दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और "समर्पण" भाव होता है जिससे "पेट" और "मन" दोनों भर जाते हैं।", क्या बात कही है यार ?" ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं।       फिर तीसरी रोटी किस की होती है?" एक दोस्त ने सवाल किया।       "तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें "कर्तव्य" का भाव होता है जो कुछ कुछ स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है", थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई।      "लेकिन यह चौथी रोटी कौन सी होती है ?" मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा-         "चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इन्सान का "पेट" भरता है न ही "मन" तृप्त होता है और "स्वाद" की तो...

नया युग(कविता)

बचपन की यादों को, मैं भूला सकती नहीं। मां के आँचल की यादे, कभी भूल सकती नहीं। दादा दादी और नाना नानी, का लाड़ प्यार हमें याद है। वो चाची की चुगली, चाचा से करना। भाभी की शिकायत भैया से करना। बदले में पैसे पाना, आज भी याद है। और उस पैसे से, चाट खाना भी याद है। भाई बहिनों का प्यार, और लड़ना भी याद है। भैया की शादी का वो दृश्य, आज भी आंखों के समाने है। जिसमे भाभी की विदाई पर, उनका जोर से रोना याद है। खुदकी शादी और विदाई का, हर लम्हा याद आ रहा है। मां बाप के द्वारा दी गई, हिदायते और नसियाते।  मैं आजतक नहीं भूली  और न भूलूंगी। क्योंकि अपनी दुनियाँ को  मैं खोकर आई हूँ। पर दिलमें नई उमंगे लेकर, साथ पिया के आई हूँ। जो अब है मेरी जिंदगी के आधार स्तम्भ। मानो मेरी जीवन का यही है अब संसार। छोड़कर माता पिता और,  भाई बहिन को मैं। नये माता पिता नंद देवर,  भाई बहिन जैसे पाये है। छोड़ छोटी सी दुनियाँ को, मैं बड़ी दुनियाँ में आई हूँ। अब जबावदारियों का बोझ, स्वंय के कंधों पर उठाई हूँ। क्योंकि दिया पिया ने मुझे  इतना स्नेह प्यार जो।  जिससे अब खुद की  नई दुनियाँ बसाई हूँ। ...