consciousness
यह पूरी सृष्टि तीन ही चीजों से बनी है स्पेस मैटर और टाइम तीनों में कॉमन यह है कि ये तीनों unconscious यानी चेतना विहीन तत्व हैं हम भी स्पेस मैटर और टाइम का हिस्सा हैं लेकिन हममे चेतना यानी consciousness है. इसलिए हम इस सृष्टि के चेतनाशील तत्व हैं.
धरती चांद सितारे धूमकेतु आकाशगंगाये और हमारे ज्ञात यूनिवर्स में मौजूद जितने भी तत्व हैं सभी हमारे जैसे ही गतिशील हैं लेकिन उनमें चेतना नही है.इसलिए ये सभी सृस्टि के जड़ तत्व हैं.
यह हमारा सूरज है गतिशील है यह कभी पैदा हुआ इस समय यह अपनी जवानी की दहलीज पर है और एक दिन वह समाप्त हो जायेगा.
इसी सूरज का चक्कर लगाने वाली हमारी गतिशील मगर जड़ पृथ्वी पर विचरने वाला यह एक मामूली जीव है सूरज की तरह यह जीव भी गतिशील है यह भी कभी पैदा हुआ और इसकी भी मृत्यु निश्चित है दोनो में फर्क सिर्फ चेतना का है इस मामूली चींटी में चेतना है और यह विशाल सूरज चेतनविहीन है.
अब सवाल यह है कि चेतना है क्या ? वह क्या चीज है जिसे हम चेतना कहते हैं चेतना आती कहाँ से है ?
चेतना या कॉन्सेसनेस ही जीवन या जीवित होने का आधार है जिसमे यह नही वह जड़ है जिसमे यह है वह चेतन है. जीवन की जितनी भी इकाई इस सृष्टि में मौजूद है उसमे यही consciousness यानी चेतना होती है मगर यह चेतना या कॉन्सेसनेस है क्या ? आइये पहले इसको समझते हैं.
विज्ञान कहता है कि unconscious से conscious बना इसे समझने के लिए समय मे बहुत पीछे जाना होगा करीब 3 अरब 80 करोड़ साल पहले समुद्र की गहराइयों में वह अभिक्रिया शुरू हुई जिससे बड़ी मात्रा में अमिनो एसिड नामक द्रव्य बना करोड़ों वर्षों के बाद इसी द्रव्य से बना प्रोटीन प्रोटीन से बना डी इन ए मोलूक्युल.
इस पूरी प्रक्रिया में करोड़ो साल लगे करीब 3 अरब साल पहले तक धरती पर कोई भी चेतनायुक्त जीव नही था डीएनए मोलूक्युल से बने शुरुआती मिक्रोर्गेनिज्म. इन मिक्रोर्गेनिज्म को चेतनशीलता का पहला स्टेप कहा जा सकता है जीवन के इस आरंभिक स्टेप से आगे बढ़ते हुए बेसिक लाइफ स्ट्रक्चर की शुरुआत होने में एक अरब सालों का लम्बा वक्त लगा.
अब जो जीव हमारे सामने है यह कॉन्सेसनेस की उस अवस्था मे है जहां उसे केवल ऊर्जा हासिल कर अपनी संख्या बढ़ानी है. इसमें कॉन्सेसनेस के गुण की शुरुआत तो हो चुकी है लेकिन अभी यह उतना एडवांस नही हुआ कि इसे हम जीव कह सकें फिर भी यह जीवन की नर्सरी तो है ही.
करोड़ों वर्षों के बाद इसी नर्सरी से वो शुरुआती माइक्रोऑर्गेनिज्म विकसित होने शुरू हुए जिनका जीवन भोजन सुरक्षा और प्रजनन पर आधारित था चेतना की इन शुरुआती इकाइयों को हम जीवन की वास्तविक शुरुआत कह सकते हैं इन्ही से विकसित होकर करोड़ों वर्षों के बाद अमीबा जैसे जीव आस्तित्व में आये जिनमे चेतना के गुण थे यह विकास प्रक्रिया की अदभुत खोज थी क्योंकि अब इस वीरान और चेतनविहीन धरती को एक नया साथी मिल चुका था जो धरती के कठोर वातावरण के साथ अपने अस्तित्व को बनाये और बचाये रखने का संघर्ष कर रहा था हालांकि पृथ्वी के आगे इस आरंभिक चेतना की कोई औकात नही थी फिर भी धरती के गर्भ में चेतना का प्रथम शुक्राणु पनप चुका था.
यह कैसे सम्भव हुआ ? इसके लिए लेबोरेटरी में हमने अमोनो एसिड बना कर देख लिया है कि रासायनिक परीक्षणों से उस तत्व को बनाया जा सकता है जो जीवन की शुरुआत के लिए सबसे जरूरी तत्व होता है.
3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती पर घटने वाली अमोनोएसिड वाली परिघटना करोड़ों वर्षो के विकास के बाद अमीबा वाले युग तक पहुंची इस समय तक धरती पर जीवन की असंख्य अलग अलग इकाइयां विकसित हो चुकी थीं अमीबा वाले इस युग मे धरती पर जीवन की जो बेसिक डाइवर्सिटी मौजूद थी इन्ही के वंशज दो अरब वर्षों के लंबे अंतराल के बाद और विकासवाद की बिल्कुल अलग अलग परिस्थितियों से गुजरते हुए डायनासोर युग तक पहुंचने में कामयाब हुए.
करीब साढ़े 6 करोड़ साल पहले धरती ने एक धूमकेतु की वजह से भयंकर विनाशलीला का सामना किया जिसमें डायनासोर समेत सभी बड़े जीव मारे गए.
डायनासोर काल के बाद धरती पर जीवन की जो विविधता कायम थी आज की धरती पर उन्ही के वंसज राज कर रहे हैं आज पृथ्वी पर जीवन की जो विविधता हम देखतें उसकी जड़ें साढ़े तीन अरब साल पुरानी हैं.
चेतना के शुरुआती विकास के बाद आखिर में पिछले कुछ लाख साल पहले ही होमोसेपियंस नामक जीव का उदय हुआ जो जीवन के वटवृक्ष की किसी प्राचीन शाखा से ही निकला था.
आगे चलकर यही प्राणी अपने अस्तित्व को बनाये या बचाये रखने के संघर्ष में दूसरे जीवों से बहुत आगे निकल गया फिर भी वह एक पशु से ज्यादा कुछ नही था क्योंकि दूसरे किसी भी जीव की तरह इस जानवर की चेतना भी भोजन सुरक्षा और प्रजजन तक सीमित थी जीने के लिए उसे भोजन की जरूरत थी अपने आस्तित्व को प्रकृति की कठोरता से बचाये रखने के लिए उसका सुरक्षित रहना जरूरी था और अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए उसे प्रजजन की जरूरत थी.
विकासवाद की दौड़ में इंसान जितना सीखता गया उस की चेतना दूसरे जीवों के consciousness के मुकाबले एडवांस्ड होता चला गया.
Consciousness की श्रेणी में इंसान ही वह जीव है जो सबसे उपर है इंसान सोच सकता है प्लानिंग कर सकता है ख्वाब देख सकता है और यह सवाल कर सकता है कि मैं कौन हूँ ? मनुष्य के कॉन्सेसनेस का यह स्तर उसके लम्बे विकासवाद की देन है.
आप देखेंगे कि मनुष्य में भी एक बहुत बड़ा वर्ग वह है जो समकालीन ज्ञान विज्ञान में पिछड़ गया है उसके consciousness में और जो ज्ञान विज्ञान और शिक्षा से जुड़ा इंसान है दोनों की समझ में काफी अंतर है.
अब हम अगर चेतना को जीवन की शर्त मान लेते हैं तब इस मामले में इंसान और चींटी दोनों एक जैसे हैं दोनों को भोजन की जरूरत पड़ती है दोनों खुद को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद करते हैं और दोनों प्रजनन करते हैं दोनों पैदा होते हैं जवान होते हैं बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं चेतना के पैमाने पर दोनों में कोई फर्क नही है.
अब आते हैं उस सवाल पर जो सबसे महत्वपूर्ण है आखिर वह क्या है जिसे हम "मैं" कहते हैं ?
यही वह सवाल है जो हमें किसी आत्मा को मानने पर मजबूर करता है इसे समझने के लिए हमें अपने अब तक के विकासवाद के इतिहास को समझना होगा जीवन के अरबों वर्षों के विकासक्रम में पिछले 50 हजार वर्षों का इतिहास ही हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण दौर साबित हुआ जिसमें हमने संवाद करना सीखा और सामाजिकता की ओर आगे बढ़ते चले गये.
हमारे व्यक्तित्व के लिए या जो कुछ भी हम आज हैं उसके लिए हमारा जीन्स हमारा परिवार हमारा समाज हमारा एनवायरनमेंट और हमारी व्यवस्था जिम्मेदार है. आप अपने अंदर के मैं को महसूस कर पाते हैं क्योंकि आप आज के ज्ञान विज्ञान संस्कार दर्शन की समझ के साथ जी रहे हैं यदि इस समझ को थोड़ी देर के लिए आपसे छीन लिया जाए तो आपमे और उस जानवर में कोई विशेष अंतर नही बचेगा जिसकी समझ भोजन सुरक्षा और प्रजजन तक सीमित है.
इस समय हम consciousness की उस अवस्था मे हैं जिसे हमने अपने विकासक्रम के द्वारा पिछले हजारों वर्षों के दौरान हासिल किया है जो विचार संस्कार दर्शन और जिज्ञासाओं पर आधारित है इन्ही सब की वजह से हम सोच पाते हैं और हमारे इस "मैं" का स्रोत भी यहीं से निकलता है.
आपने उन बच्चों की कहानियां पढ़ी होंगी जो किसी दुर्घटनावश जंगल मे जानवरों के बीच पलने को मजबूर हुए थे जब उन्हें पकड़ा गया तो वे हमारे समाज का हिस्सा कभी नही बन पाए उन्हें जिंदगी भर पिंजरे में कैद रखना पड़ा क्योंकि उन्हें जो वातावरण परिवार समाज और व्यवस्था मिली वो उसमे वैसे ही ढल गए.
हमारा consciousness एक बच्चे के consciousness से ऊँचे दर्जे का है एक 12 साल के बच्चे का consciousness एक बंदर के consciousness से कहीं बेहतर है बन्दर का मैं चींटी के consciousness से ऊपर है तो चींटी का मैं अमीबा के consciousness से श्रेष्ठ है.
Consciousness की ये सभी अवस्थाएं जीवन के विकासक्रम की ही देन हैं जो अरबों वर्षों के दौरान इवॉल्व हुई हैं इसलिए हमारे अंदर का मैं भी हमारे एवोल्यूशन का ही एक हिस्सा है जिसे हमें समझने की जरूरत है.
इसे समझ गए तो आत्मा परमात्मा की हमारी सभी पुरातन अवधारणाएं पल भर में समाप्त हो जाएंगी और हम एक स्वस्थ मनुष्य बन जाएंगे धर्म मजहब का संक्रमण जब तक इंसानी दिमागों में घुसा रहेगा हम इंसान होते हुए भी इंसान नही रहेंगे क्योंकि स्वस्थ विचारों से ही स्वस्थ इंसान बनता है और स्वस्थ इंसानों से ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव हो सकता है.
आत्मा रूह की कल्पनाएं हमारी अज्ञानता की उपज थी और इसी अज्ञानता की बुनियाद पर हमने धर्म रूपी जहालत के बड़े बड़े हवाई किले खड़े कर दिए जिसकी दीवारों के भीतर मानवता को तबाह करने के भयंकर षड्यंत्र चलाये जा रहे हैं विज्ञान और मानवतावादी विचारों के प्रहार से पाखण्डों का यह किला ध्वस्त होगा और इसकी मजबूत दिखाई देने वाली दीवारें पल भर में मिट्टी में मिल जाएंगी तब घृणा हिंसा और शोषण की मानसिकता समाप्त हो जाएगी तब ही मानवता के उस नवीन युग की शुरुआत हो पाएगी जो सत्य प्रेम और परिवर्तन पर आधारित होगा.
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