कविताएं

 प्रशस्तिपत्रों के लिए 

नहीं लिखी जाती कविताएं,

न ही फूलमालाएं पहनकर 

भव्य मंचों के माईकों से निकल 

तालियाँ बटोरने के लिए.

न तो बैस्टसैलर किताब 

होने के लिए और 

और न ही किसी सौ करोड़ कल्ब की 

फिल्म का गीत बन 

इयरफोन के लूप में बजने के लिए

लिखी जाती है. 

कविताएं समाज की 

अंतिम पंक्ति में हारकर

मुंह छिपाए खड़े

उस जीर्ण-क्षीण शोषित के

कंपकपाते होठों की 

बुदबुदाहट में ठहर 

नारा बनने की 

चाह में लिखी जाती हैं,

वह नारा 

जो उसे पुन: साहस प्रदान करेगा! 

वह उठेगा

वह लड़ेगा

वह जीतेगा. 


निन्यानवें प्रतिशत अभागी कविताएं 

नारा नहीं बन पाती और

प्रशस्तिपत्र , तालियां, फूलमालाएं

बेस्टसेलर का खिताब पाती हैं.


नारा बनी कविताएं ही कालजयी कहलाती हैं! 


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