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Showing posts from June, 2022

बेटी या लक्ष्मी

  *हर लडकी के लिए प्रेरक कहानी...* *और लड़कों के लिए अनुकरणीय शिक्षा...,* कोई भी लडकी की सुदंरता उसके चेहरे से ज्यादा दिल की होती है। ...पति ने घर मेँ पैर रखा....‘अरी सुनती हो !' आवाज सुनते ही पत्नी हाथ मेँ पानी का गिलास लेकर बाहर आयी और बोली "अपनी बेटी का रिश्ता आया है, अच्छा भला इज्जतदार सुखी परिवार है, लडके का नाम युवराज है । बैँक मे काम करता है।  बस बेटी हाँ कह दे तो सगाई कर देते है." बेटी उनकी एकमात्र लडकी थी.. घर मेँ हमेशा आनंद का वातावरण रहता था । कभी कभार सिगरेट व पान मसाले के कारण उनकी पत्नी और बेटी के साथ कहा सुनी हो जाती लेकिन वो मजाक मेँ निकाल देते । बेटी खूब समझदार और संस्कारी थी । S.S.C पास करके टयूशन, सिलाई का काम करके पिता की मदद करने की कोशिश करती । अब तो बेटी ग्रेज्यूऐट हो गई थी और नौकरी भी करती थी लेकिन बाप उसकी पगार मेँ से एक रुपया भी नही लेते थे... और रोज कहते ‘बेटी यह पगार तेरे पास रख तेरे भविष्य मेँ तेरे काम आयेगी ।' दोनो घरो की सहमति से बेटी और युवराज की सगाई कर दी गई और शादी का मुहूर्त भी निकलवा दिया. अब शादी के 15 दिन और बाकी थे. बाप ने बेटी ...

जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए

 पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना… पति- क्यों?? उसने कहा..- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी… पति- क्यों?? पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी… पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता… पत्नी- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस.. पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे… पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!! पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो… पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाहपाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे… पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में?? तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा... पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी? बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस.. पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपन...

ईगो

... अभी एक साल भी नहीं हुआ था दोनों की शादी को कि दोनों में झगड़ा हो गया किसी बात पर ... जरा सी अनबन हुईं और दोनो के बीच बातचीत बंद हो गई ...वैसे दोनो बराबर पढ़ें - लिखे , दोनो अपनी नौकरी में व्यस्त तो दोनों का इगो भी बराबर ... वहीं पहले मैं क्यों बोलूं....मे कयो झुकूं.... तीन दिन हो गए थे पर दोनों के बीच बातचीत बिल्कुल बंद थी ... कल सुधा ने ब्रेकफास्ट में पोहे बनाये, पोहे में मिर्च बहुत ज्यादा हो गई सुध ने चखा नही तो उसे पता भी नहीं चला...और मोहन ने भी नाराजगी की वजह से बिना कुछ कहे पूरा नाश्ता किया पर एक शब्द नही बोला, लेकिन अधिक तीखे की वजह से सर्दी में भी वह पसीने से भीग गया बाद मे जब सुधा ने ब्रेकफास्ट किया तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ.... एक बार उसे लगा कि वह मोहन से सॉरी बोलना चाहिए.. लेकिन फिर उसे अपनी फ्रैंड की सीख याद आ गई कि अगर तुम पहले झुकी तो फिर हमेशा तुम्हें ही झुकना पड़ेगा और वह चुप रह गई हालांकि उसे अंदर ही अंदर अपराध बोध हो रहा था अगले दिन सन्डे था तो मोहन की नींद देर से खुली घड़ी देखी तो नौ बज गए थे , उसने सुधा की साइड देखा, वह अभी तक सो रही थी , वह तो रोज जल्दी ...

वान गाॅग

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 वान गाॅग सिरफिरा था। पता नहीं कैसा मस्तिष्क लेकर आया था दुनिया में। हर चीज को अलग नज़रिये से देखता और सुध-बुध खो बैठता था। जीवनभर उसकी किसी से नहीं बनी। आधि-व्याधि दोनों ने जकड़ रखा था। फटेहाली में कहीं पहुँचता तो लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते। किसी के साथ उसका सामंजस्य ही न बैठ पाया। उसकी अनुभूति और विक्षोभ विप्लव की तरह उसके पत्रों में उतरे हैं, जिसे उसने अपने भाई-बहन और मित्रों को लिखा था।  वह एक देश से दूसरे देशों के चक्कर लगाता रहा, मनोनुकूल रोजगार तलाशता और छोड़ता रहा। लेकिन प्रेतबाधा की तरह पीछा करते दर्द और पेचिश ने आख़िरी सांस तक उसका साथ न छोड़ा। यही उसके सच्चे सहचर थे। हर वक़्त अँतड़ियां चीस मारकर उसे बेकल करती रहतीं। मेरूदंड से उठता वर्तुल दर्द जब रेंगते हुये उसके मस्तिष्क तक पहुँचता तो और भी प्रभंजन पैदा कर देता था। कम उम्र में ही थक गया था वान गाॅग ! उसके लिए कायनात की कोई रेमेडी कारगर न थी। फिर धीरे-धीरे शायद उसे नियति का विधान समझ में आया। उसे लगा, इससे आगे राह नहीं। अब क्या करता, उसने अपनी पीड़ा को फ़ैंटेसी में उतारना शुरू कर दिया। दर्द अपने शुरूआती दौर में मटमैल...

पति-पत्नी के सम्बंधों पर आधारित|

शादी की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल था। प्रेम भी बहुत था दोनों में लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए। इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे। अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन सी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके। पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है। डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया। अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे। एक-दूसरे की डायरियाँ लीं। पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई। आखिर में महिला प्रथम की परिपाटी के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की। पहला पन्ना...... दूसरा पन्ना........ तीसरा पन्ना ..... आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ...