वान गाॅग

 वान गाॅग सिरफिरा था। पता नहीं कैसा मस्तिष्क लेकर आया था दुनिया में। हर चीज को अलग नज़रिये से देखता और सुध-बुध खो बैठता था। जीवनभर उसकी किसी से नहीं बनी। आधि-व्याधि दोनों ने जकड़ रखा था। फटेहाली में कहीं पहुँचता तो लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते। किसी के साथ उसका सामंजस्य ही न बैठ पाया। उसकी अनुभूति और विक्षोभ विप्लव की तरह उसके पत्रों में उतरे हैं, जिसे उसने अपने भाई-बहन और मित्रों को लिखा था। 


वह एक देश से दूसरे देशों के चक्कर लगाता रहा, मनोनुकूल रोजगार तलाशता और छोड़ता रहा। लेकिन प्रेतबाधा की तरह पीछा करते दर्द और पेचिश ने आख़िरी सांस तक उसका साथ न छोड़ा। यही उसके सच्चे सहचर थे। हर वक़्त अँतड़ियां चीस मारकर उसे बेकल करती रहतीं। मेरूदंड से उठता वर्तुल दर्द जब रेंगते हुये उसके मस्तिष्क तक पहुँचता तो और भी प्रभंजन पैदा कर देता था।


कम उम्र में ही थक गया था वान गाॅग ! उसके लिए कायनात की कोई रेमेडी कारगर न थी। फिर धीरे-धीरे शायद उसे नियति का विधान समझ में आया। उसे लगा, इससे आगे राह नहीं। अब क्या करता, उसने अपनी पीड़ा को फ़ैंटेसी में उतारना शुरू कर दिया। दर्द अपने शुरूआती दौर में मटमैले, फिर चटख रंग में उभरने लगे। उन्हें देखकर वह लुभा जाता था। वान गाॅग के देह की पीड़ा कल्पना का अवलंब ले दूसरे आयाम में शिफ़्ट हो चुकी थी, लेकिन मन अब भी क्लांत था। 


पागलखाना, एकांतवास और भटकाव के साथ ही उसने कला का चरम भी छू लिया था, लेकिन चैन कहीं न मिला, आत्मतोष की पिपासा जरा भी शांत न हुई। आख़िरी आज़माइश में वह आत्महत्या की तरफ बढ़ा, ख़ुद को गोली मारी ..और शांत हो गया !


उस कलाकार ने कूची और कैनवास को गले से लगाकर रखा, रंग उसकी धमनियों में बहते थे। दुनिया को वह खूब समझता था, लेकिन दुनिया उसे जीते जी न समझ सकी। इस बात की उसने कभी शिक़ायत न की। ख़ुद न केवल रंगों को तिरस्कृत होने से बचाया, बल्कि उन्हें दुनियाभर से मान दिलवाया। कहते हैं, कई पेशे में हाथ-पैर मारने वाला वान गाॅग कभी किसी से संतुष्ट नहीं हुआ ...खुद से भी नहीं। एक बार किसी वेश्या ने उसके कानों की तारीफ क्या कर दी, अपना कान काटकर उसे सौंप दिया और उधर से फ़ारिग हो निकल लिया। ऐसा आत्महंता भला कौन होगा, कटे कान और उटपटांग मुखाकृति में रंग भरना इतना आसान तो नहीं !


वान गाॅग भी हाड़-मांस का जीवित पिंड था, लेकिन मरते ही वह किंवदंति बन गया। उसे काल्पनिक किरदारों की तरह लिखा और पढ़ा गया, उसे किसी रहस्य की तरह समझा और समझाया गया। अपने समय को जैसा उसने देखा था, वैसा ही उतारा, लेकिन ख़ुद ही उस टाइमलाइन से बहिष्कृत था। यह बहिष्कार अनियोजित था। इसका दोष किसी के मत्थे मढ़ने वाला भी कोई अहमक ही होगा।


पेंटिंग को सातवें आसमान तक पहुँचाकर कलाकार खाक हो चुका था। उसकी कलाकृतियों को देखकर लोग रोये। किसी ने उसमें पीड़ा देखी, तो किसी ने जिजीविषा। कोई उसकी भर्त्सना करता तो कोई उससे प्रेरणा लेता और तारीफ करता। कलावंतों ने कहा, गहन निराशा और स्याह क्षणों में भी उसकी पेंटिंग कितनी भास्वर थी। 


यह सब देखने के लिए वह जीवित नहीं था। कला का रिवार्ड उसके लिए बेमानी था, सारी समीक्षा निस्सार थी।


वह जिन क्षणों और अनुभूतियों को जीता, उनका माध्यम और निमित्त भर बन जाया करता था। उन्हें हर वक़्त कैरी करना इतना आसान नहीं। बासी स्मृतियां, दहकता वर्तमान और बीते हुये लमहे कला में अवतरित हुये और पीछे छूटते गये। कलाकार उनसे प्रेरित होने के लिए भला कब रूकता है। उससे अतिमानव या योगियों जैसी उम्मीद व्यर्थ है। वह त्रिकालज्ञ या तत्वदर्शी नही था।


एक नया क्षण आया, हार्मोंस असंतुलित हुये और उसने आप ही आत्मघात कर लिया। पिछले वाक़यों, अनुभूतियों और क्षणों की तरह यह भी एक क़िस्म का आवेग ही था। बस इस बार उसके हाथ में कूची की जगह पिस्टल और मस्तिष्क के कैनवास पर "स्टारी नाइट" थी !

न कहीं बचा हुआ लस्ट था, न लाइफ़ थी !!




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