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Showing posts from July, 2022

चिडि़यों की टोली

  चिडि़यों की टोली उतरती है दोपहर में दो बजे। स्कूल बस ग्लोरी अपार्टमेंट्स के सामने रुकती है। सबसे पहले रजत की आवाज गूंजती है, ‘‘दादी, हम आ गए।’’ हम यानी ग्लोरी अपार्टमेंट्स के फ्लैटों में रहने वाले बच्चे भले ही अलग-अलग हैं, पर दादी सबकी एक हैं। उन्होंने ही बच्चों को नाम दिया है-चिडि़यों की टोली। दादी यानी उमा देवी हंसती हुई सबको एक-एक थैली पकड़ाती हैं। ‘‘आज मैंने तुम्हारी मनपसंद मिठाई बनाई है। शाम को आना नई कहानी सुनाएंगे तुम्हारे बाबा।“ बच्चों के बाबा हैं उमादेवी के पति अजयसिंह। वह भी एक तरफ खड़े हंस रहे हैं।उमादेवी और अजयसिंह एक फ्लैट में अकेले रहते हैं। उनके दो बेटे हैं-श्यामल और सुरेश। दोनों अपने-अपने परिवार के साथ अमरीका जाकर बस गए हैं। बीच में जब भारत आते हैं तो माता-पिता से एक बार जरूर कहते हैं-‘‘यहां क्या रखा है? अमरीका चलकर रहिए न।’’ दोनों चुप रहते हैं-यानी उत्तर साफ है कि उन्हें कहीं नहीं जाना। दादी और बाबा चिडि़यों की टोली को कैसे छोड़ें! उनका यह मौन उत्तर घर के नौकर बिलासी को भी अच्छा लगता है। आखिर वह कहां जाएगा उमादेवी और अजयसिंह के अमरीका जाने के बाद? एक दिन उमादेवी...

तुम जैसे हो वैसा ही सारा अस्तित्व हो जाता है

 बड़ी प्राचीन कथा है कि रामदास राम की कथा कह रहे हैं। कथा इतनी प्रीतिकर है, राम की कहानी इतनी प्रीतिकर है कि हनुमान भी सुनने आने लगे। हनुमान ने तो खुद ही आंखों से देखी थी सारी कहानी। लेकिन फिर भी कहते हैं, रामदास ने ऐसी कही कि हनुमान को भी आना पड़ा। खबर मिली तो वह सुनने आने लगे। बड़ी अदभुत थी। छिपे-छिपे भीड़ में बैठकर सुनते थे। पर एक दिन खड़े हो गए, खयाल ही न रहा कि छिपकर सुनना है, छिपकर ही आना है। क्योंकि रामदास कुछ बात कहे जो हनुमान को जंची नहीं, गलत थी, क्योंकि हनुमान मौजूद थे। और यह आदमी तो हजारों साल बाद कह रहा है। तो उन्होंने कहा कि देखो, इसको सुधार कर लो। रामदास ने कहा कि जब हनुमान लंका गए और अशोक वाटिका में गए, और उन्होंने सीता को वहा बंद देखा, तो वहा चारों तरफ सफेद फल खिले थे। हनुमान ने कहा, यह बात गलत है, तुम इसमें सुधार कर लो। फूल लाल थे, सफेद नहीं थे। रामदास ने कहा, तुम बैठो, बीच में बोलने की जरूरत नहीं है। तुम हो कौन? फूल सफेद थे। तब तो हनुमान को अपना रूप बताना पड़ा। हनुमान ही हैं! भूल ही गए सब। कहा कि मैं खुद हनुमान हूं। प्रगट हो गए। और कहा कि अब तो सुधार करोगे? तुम हजारों ...

ओशो

 तुर्गनेव की एक बड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक गांव में एक महामूर्ख था, लोग उस पर बहुत हंसते थे। गांव का महामूर्ख, सारा गाव उस पर हंसता था। आखिर गांव में एक फकीर आया और उस महामूर्ख ने उस फकीर से कहा कि और सब पर तुम्हारी कृपा हौती है, मुझ पर भी करो, क्या जिंदगीभर मैं लोगों के हंसने का साधन ही बना रहूंगा? लोग मुझे महामूर्ख समझते हैं और मैं हूं नहीं। फकीर ने कहा, एक काम कर, जहां भी कोई किसी ऐसी चीज की बात कर रहा हो जिसको सिद्ध करना कठिन हो, तू विरोध में हो जाना। जैसे कोई कह रहा हो कि ईश्वर की कृपा, तू फौरन पकड़ लेना शब्द कि कहौ है ईश्वर, कैसा ईश्वर, सिद्ध करो! कोई कहता हो, चांद सुंदर है, फौरन पकड़ लेना, जबान पकड़ लेना कि क्या प्रमाण है? मैं कहता हूं, कहौ है सौंदर्य? कैसा सौंदर्य? कोई कहता हो, गुलाब का फूल सुंदर है कोई कहता हो, यह स्त्री जा रही है, देखो कितनी प्रसादपूर्ण है, कितनी सुंदर—पकड़ लेना जबान उसकी, छोड़ना मत। जहां भी सौंदर्य की, सत्य की, शिवम् की कोई चर्चा हो रही हो, तू पकड़ लेना। क्योंकि न सत्य सिद्ध होता, न सौंदर्य सिद्ध होता, न शिवम् सिद्ध होता, ये चीजें सिद्ध होती ही नहीं। इनके लिए कोई...

तुम्हारा एकांत ही तुम्हें मनुष्य बना सकता है, भीड़ तुम्हें भेड़ बना देगी

कुछ लोग हैं जिनका दर्द मैं अच्छी तरह से समझता हूँ.. उनकी उम्र डिग्रियां लेने में बीत गयीं. उनके फेसबुक के “क्वालिफिकेशन” कॉलम में “स्क्रॉल बार” आता है.. क्यूंकि डिग्रियां लिखने की जगह नहीं बची है वहां.. ऐसे लोगों के सामने आप परसेंटेज और ज़्यादा अंक पाने के “पागलपन” को आप ग़लत कह दें तो वो बड़े परेशान हो जाते हैं इस बात को आप भी समझिये.. ये वैसे ही है जैसे एक औरत “बहु” बनकर सारी उम्र अपनी सास के “ज़ुल्म” को सह चुकी है और उस से आप ये कह दें कि अपनी बहु को “नौकरानी” न समझो, तो वो अंदर ही अंदर आपको “गाली” देगी.. सारी उम्र उस औरत की प्रताड़ना कहाँ निकलेगी? और जिस पल का उसने दशकों इंतज़ार किया अब आप उसे वो पल “एन्जॉय” नहीं करने देंगे? यही परपीड़ा तो उस औरत का सुख है.. और उसे उस सुख से वंचित करोगे तो गाली ही खाओगे.. ऐसे ही दूसरे बच्चों की “परपीड़ा” इन ढेर सारी डिग्री धारियों का “सुख” होता है मेरे पास ऐसी ऐसे एम्प्लोई रह चुके हैं जो चार से पांच मास्टर डिग्री लिए थे, और मेरे यहाँ डिप्लोमा होल्डर के अंडर में काम कर रहे थे.. एक दो नहीं जाने कितने ऐसे आये और गए.. मैं जब इंटरव्यू लेता था तो कभी उनकी डिग्री...

अयोग्यता की आकांक्षा

लोक प्रशासन में पढ़ते हैं कि सभी सरकारी कार्यालयों पर पार्किंसन सिद्धांत लागू होता है, जिसका अर्थ यह है कि प्रत्येक अधिकारी व कर्मचारी अपना अधीनस्थ चाहता है व काम टालकर नीचे की ओर भेजता है और इस प्रकार नीचे का कर्मचारी कार्याधिक्य बताकर और नीचे कर्मचारी की नियुक्ति करना चाहता है व उससे काम लेकर खुद आराम करना चाहता है, इस प्रकार प्रत्येक कार्यालय में कर्मचारियों की संख्या बढ़ती जाती है,व एक ऐसा व्यक्ति हर जगह मिल जाता है जिसे कम वेतन व सबसे ज्यादा जिम्मेदारी मिलती है, कोई भी गलती होने के बाद उस साबसे नीचे वाले व्यक्ति पर ही कार्यवाही होती है,क्योंकि बार फ़ाइल या नोटशीट को शुरू करने वाला वही है । एक और सिद्धांत है जो यह कहता है कि हर व्यक्ति तब तक तरक्की करता है जब तक कि वह ऐसे पद पर न पहुंच जाए जिसके लिये वह अयोग्य हो,या जिसके लायक वह न हो, उदाहरण के लिए कोई क्लर्क कुछ वर्ष वाद उसी विभाग में छोटा अधिकारी बन जाता है,वह योग्य लिपिक था लेकिन  अधिकांश मामलों में अधिकारी के रूप में उसमें नियंत्रण क्षमता न होने के कारण वह अयोग्य सिद्ध होता है,वह अधिकारी बनने के बाद भी अपना कार्य छोड़कर बार बा...