तुम्हारा एकांत ही तुम्हें मनुष्य बना सकता है, भीड़ तुम्हें भेड़ बना देगी
कुछ लोग हैं जिनका दर्द मैं अच्छी तरह से समझता हूँ.. उनकी उम्र डिग्रियां लेने में बीत गयीं. उनके फेसबुक के “क्वालिफिकेशन” कॉलम में “स्क्रॉल बार” आता है.. क्यूंकि डिग्रियां लिखने की जगह नहीं बची है वहां.. ऐसे लोगों के सामने आप परसेंटेज और ज़्यादा अंक पाने के “पागलपन” को आप ग़लत कह दें तो वो बड़े परेशान हो जाते हैं
इस बात को आप भी समझिये.. ये वैसे ही है जैसे एक औरत “बहु” बनकर सारी उम्र अपनी सास के “ज़ुल्म” को सह चुकी है और उस से आप ये कह दें कि अपनी बहु को “नौकरानी” न समझो, तो वो अंदर ही अंदर आपको “गाली” देगी.. सारी उम्र उस औरत की प्रताड़ना कहाँ निकलेगी? और जिस पल का उसने दशकों इंतज़ार किया अब आप उसे वो पल “एन्जॉय” नहीं करने देंगे? यही परपीड़ा तो उस औरत का सुख है.. और उसे उस सुख से वंचित करोगे तो गाली ही खाओगे.. ऐसे ही दूसरे बच्चों की “परपीड़ा” इन ढेर सारी डिग्री धारियों का “सुख” होता है
मेरे पास ऐसी ऐसे एम्प्लोई रह चुके हैं जो चार से पांच मास्टर डिग्री लिए थे, और मेरे यहाँ डिप्लोमा होल्डर के अंडर में काम कर रहे थे.. एक दो नहीं जाने कितने ऐसे आये और गए.. मैं जब इंटरव्यू लेता था तो कभी उनकी डिग्री नहीं देखता था.. क्यूंकि वो डिग्री मेरी कंपनी नहीं चलाएगी.. हर कंपनी का यही उसूल होता है.. डिग्री है आपके पास, ठीक है.. अब बताईये काम आपको कितना आता है.. आपका दिमाग़ कितना तेज़ है टीम और कम्पनी को मैनेज करने के लिए.. डिग्री है अगर आपके पास और आपका दिमाग़ भी “शार्प” है फिर तो स्वागत है आपका.. मगर ऐसा ज़्यादातर होता नहीं है.. इतनी डिग्रियां आप तभी लेते हैं जब आप अंदर से “डरपोक” होते हैं और समाज और कॉर्पोरेट से आँख मिलाने का आपका हौसला नहीं होता है.. नहीं तो अगर आप कुछ रचनात्मक करने की क्षमता रखते हैं तो डिग्री के लिए इतना रट्टू तोता बनना आपके लिए “बाधा” उत्पन्न करता है.. ज़्यादा पढाई आपके दिमाग़ को “भूंसा” बना देती है और आपको “डरपोक”
लोग उदाहरण देंगे कि “माइक्रोसॉफ्ट” के फलाने भारतीय CEO को देखो, कितना पढ़ा है.. वो लोग ये भूल जाते हैं कि कि वो बिल गेट्स का “नौकर” है और बिल गेट्स कभी “स्नातक” भी नहीं पूरा कर पाए अपना.. बीस साल की उम्र में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया था अपनी कम्पनी बनाने के लिए.. सोचिये कि बिल गेट्स ढेर सारी डिग्री लेने में फंसे होते तो आज माइक्रोसॉफ्ट न होती.. यही हाल गूगल के संस्थापकों का है.. यही हाल बड़ी से बड़ी कंपनियां जिनमें आप अपने बच्चे को “नौकर” बनाने के सपने देखते हैं, उनका है.. आइंस्टीन बेचारे स्नातक के एडमिशन के लिए फ़ेल हो गए थे.. ऐसे ही तमाम वैज्ञानिक थे.. गूगल के सीईओ सुंदर पिचायी के दसवीं में 75% अंक थे
कभी सोचा है आपने कि लाखों डॉक्टरों की भीड़ में आप अपने शहर के “चंद” अच्छे डॉक्टरों का नाम ऊँगली पर गिन सकते हैं? ऐसा क्यूँ होता है.. डिग्री तो हर डॉक्टर के पास है मगर वो क्यूँ नहीं डॉक्टर है अच्छा? वो इसलिए अच्छा डॉक्टर नहीं है क्यूंकि वो “भेडचाल” में डॉक्टर बना है.. ये जो लाखों डॉक्टर बैठे हैं शहर में आपके ये “डिग्री” ले कर डॉक्टर बने हैं.. वो अपने पढ़ाकू माँ बाप के सपनों को पूरा करने के लिए डॉक्टर बने हैं.. “चिकित्सा” उनका जूनून नहीं है.. और इन्हीं लाखों डॉक्टरों के बीच कोई एक आता है जिसके भीतर जूनून होता है मानव शरीर और उसकी कार्यप्रणाली को जाने का.. उसके भीतर जूनून होता है नए नए तरीकों को इजाद करके लोगों को “स्वस्थ” बनाने का.. वो पैदायशी “चिकिस्तक” होता है.. और उसी के पास आप भागते हैं अपने इलाज के लिए.. उसके क्लिनिक में “नंबर” पाने के लिए आप महीनों इंतज़ार करते हैं
आपका जीवन डिग्री बटोरने, मैडल जीतने, और अपने खानदान और समाज में अपने आपको “साबित” करने में बीत गया, ठीक है.. मगर आप ये बिमारी अपने बच्चे को क्यूँ पकड़ा रहे हैं? उन मैडल का आपने क्या किया जो आपको मिले थे? वो जो ट्राफी आपके घर में सजी हैं उनसे आपको और इस समाज को क्या फायदा हुवा? आपके 99% अंक से इस पृथ्वी का क्या भला हुवा? आप पीड़ित किये गए हैं तो क्या आप सारे समाज को ऐसे ही पीड़ित करेंगे? अपने बच्चों के ज़्यादा अंक की मार्कशीट लहरा के किसे आप नीचा दिखा रहे हैं?
अपने बच्चों को अपने पसंद से एक डिग्री लेने दीजिये.. ज़्यादा नंबर से ली या कम से, इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.. उसके बाद उन्हें बोलिए कि जिस विषय में डिग्री ली है उसमें ऐसा “रम” जाएँ कि कुछ नया और बेहतर करें उस फील्ड में.. डिग्री लेने के बाद उन्हें घर से भगा दीजिये और बोलिए कि जा कर लड़ें इस समाज और व्यापार जगत में और अपनी जगह बनायें.. उन्हें बोलिए कि “जीवन” और “बाज़ार” का अनुभव करें स्वयं
अगर आपका बच्चा डिग्री पर डिग्री लिए जा रहा है तो उसे किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाएँ.. क्यूंकि वो शारीरिक और मानसिक तौर पर कहीं न कहीं टूटा हुवा और किसी “फ़ोबिया” से ग्रस्त होगा.. उसका इलाज कराएं.. अगर आपको भी ज़्यादा अंक और ज़्यादा डिग्री की चाह है, तो ख़ुद भी “अच्छे” मनोचिकित्सक से मिलें.. आपका भी इलाज संभव है
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