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Showing posts from August, 2022

पुरानी रसीद

  नरोत्तम सेठ ने आज कहीं व्यस्त होने के कारण ईंट भट्टे पर फिर अपने बेटे को ही भेजा था ।  बेटे का मन क़भी भी भट्टा पर नही लगता , जिसके कारण वह अक्सर ग्राहकों से उलझ जाता था , जबकि नरोत्तम सेठ चाहते थे कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय भट्टा पर दे जिससे वो अपने पुस्तैनी व्यवसाय में दक्ष हो सके। अभी उनका बेटा आकर अपने केबिन में बैठा ही था कि मुनीम आ गया-" भईया जी एक बुजुर्ग फटी-पुरानी पुर्जी लेकर आया है और दस हजार ईंट मांग रहा है।" "क्या मतलब..!" बेटे ने पूछा । "कह रहा है कि सन उन्नीस सौ अड़सठ में पन्द्रह रुपया हजार के भाव से उसने दस हजार ईंट का दाम एक सौ पचास रुपया जमा किए थे जो आज लेने आया है।" "दिमाग खराब है उसका । आज दस हजार ईंट की कीमत अस्सी हजार है, एक सौ पचास रुपये में कैसे दे देंगे , भगा दो उसको यहां से ....।" "पर बड़े बाबूजी के हाथ की दस्तख़त की हुई रसीद है उसके पास है।" "तो क्या हुआ...? तब क्यों नही ले गये थे । अब ,जब ईंट का मूल्य आठ हजार रुपये प्रति हजार है तब ये पन्द्रह रुपये के भाव से ले जाएंगे !" सेठ का लड़का अभी मुंशी ...

फ़र्ज

पिताजी के जाने के बाद आज पहली बार हम दोनों भाईयों में जम कर बहसबाजी हुई। फ़ोन पर ही उसे मैंने उसे खूब खरी-खरी सुना दी।  पुश्तैनी घर छोड़कर मैं कुछ किलोमीटर दूर इस सोसायटी में रहने आ गया था। उन तंग गलियों में रहना मुझे और मेरे बच्चों को कतई नहीं भाता था। हम दोनों मियां-बीबी की अच्छी खासी तनख्वाह के बूते हमने ये बढ़िया से फ्लैट ले लिया। सीधे-साधे से हमारे पिताजी ने कोई वसीयत तो की नहीं पर उस पुश्तैनी घर पर मेरा भी तो बराबर का हक बनता है। छोटा भाई मना नहीं करता, लिखा-पढ़ी को भी राजी है पर दिक्कत अब ये है कि वो मेरे वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोलना चाह रहा है। उसकी टीचर की नौकरी सात महीने पहले छूट चुकी है। दो महीने पहले ही आस-पास कहीं किराये का कमरा लेकर कोचिंग सेंटर खोला है। फोन पर कह रहा था, "आपके वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोल लूँ तो मेरा किराया बच जाएगा।"  अब भला ये क्या बात हुई। चीज मेरी बरतेगा वो। ऊपर से मेरी धर्मपत्नी भी उसी की बात को सही ठहराते हुए बोली, "खोलने दो ना उसे कोचिंग सेंटर, छोटा भाई है आपका। मुश्किल में है कुछ सहारा ही हो जायेगा। आखिर बड़े भाई हो कुछ तो फ़र्...

ऊँगली

 आज किचन में काम करते हुए, ऊँगली कट गयी, पतिदेव वंही थे सो देख लिया, बोले ध्यान रखना चाहिये ऐसे कैसे काम करती हो, सासु माँ बोली, कि ध्यान कहीं ओर होगा ओर आँखे कहीं ओर, ससुर जी तो बस मुँह सिकोड़ कर रह गये ? ओर बात आयी गयी हो गयी, खुद ही enticeptic लगाया फिर घर के सारे काम किये, दवाई लगाते हुए ध्यान आया, कि यदि यही मायके में हुआ होता तो, मेरी माँ दौड़ते हुए आती ओर सबसे पहले हाथ पकड कर कहती, हाय राम कितना खुन निकल रहा है, ये लड़की कभी सुनती नही है, करते हुए चोट को हल्दी लगाती, पापा तो मम्मी को ही डांट लगाते कहते, इतना ही नही, भुआ मामा -नानी दादी - अब शुरु हुआ हिदायतों का सिलसिला, पता नहीं ससुराल मे अकेले कैसे सब सम्भालेगी, अभी छोटी है, सीख जाएगी अभी से kitchen सौंप दिया है उसे, सबको फोन करके खबर दी जाती है कि गुड्डो का हाथ कट गया, सब खबर लेने घर आते है, कि हाय फूल सी बच्ची कुल मिलाकर चोट लगने का असली मज़ा भी मायके में ही आता है, जँहा आपकी परवाह कि जाती है, आपकी चोट को पारिवारिक चोट घोषित करके, प्यार ओर अपनेपन का ऐसा मरहम लगाया जाता है, कि चोट लगवाने का बार बार दिल करता है,

आलू टमाटर की सब्ज़ी

आज बाबूजी की तेरहवीं है। नाते-रिश्तेदार इकट्ठे हो रहे हैं पर उनकी बातचीत, हँसी मज़ाक देख-सुनकर उसका मन उद्दिग्न हो रहा है.."कोई किसी के दुख में भी कैसे हँसी मज़ाक कर सकता है? पर किससे कहे,किसे मना करे" इसीलिये वह बाबूजी की तस्वीर के सामने जाकर आँख बंद करके चुपचाप बैठ गई। अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है.. वह रक्षाबंधन पर मायके आई थी। तब बाबूजी कितने कमजोर लग रहे थे। सबके बीच होने के बावजूद उसे लगा कि जैसे वह कुछ कहना चाहते हों फिर मौका मिलते ही फुसफुसा कर धीरे से बोले भी थे .."बिट्टू... रमा(भाभी) हमको भूखा मार देगी। आधा पेट ही खाना देती है, दोबारा माँगने पर कहती है कि परेशान ना करो ,जितना देते हैं उतना ही खा लिया करो। ज़्यादा खाओगे तो नुकसान करेगा फिर परेशान हम लोगों को करोगे " कहते-कहते उनका गला भर आया।  " पर कभी आपने बताया क्यों नही बाबूजी?" सुनकर सन्न रह गई वह और तुरंत अपने साथ लाई मिठाई से चार पीस बर्फी निकाल कर बाबूजी को दे दिया। वह लगभग झपट पड़े..और जल्दी-जल्दी खाने लगे.. ऐसा लग रहा था मानों बरसों से उन्होंने कुछ खाया ही ना हो। "अरे,अरे,,,,इतना मत...

समाज के साथ मेलजोल क्यो जरूरी है

 सेवानिवृत्त बड़े अधिकारी को अपने कार्यालय जाने की जिज्ञासा हुई। वह अपने मन में बड़े-बड़े सपने लेकर जैसे कि :- मैं जब कार्यालय पहुंचूँगा तो सभी अधिकारी एवं कर्मचारी मेरा बढ़-चढ़कर स्वागत करेंगे तत्काल अच्छा नाश्ता मंगाया जाएगा आदि आदि। ऐसा सोचते सोचते वह अपने वाहन से कार्यालय जा रहा था। जैसे ही दरवाजे पर पहुंचा तो पहरेदार ने रोका और कहा कि "आप अंदर जाने से पहले गाड़ी बाहर ही एक तरफ लगा दें"। इस पर अधिकारी भौचक्का रह गया, और कहा कि "अरे! तुम जानते नहीं हो, मैं यहां का मुख्य अधिकारी रहा हूं। गत वर्ष ही सेवानिवृत्त हुआ हूं"। इस पर पहरेदार बोला- "तब थे, अब नहीं हो। गाड़ी दरवाजे के अंदर नहीं जाएगी"। अधिकारी बहुत नाराज हुआ और वहां के अधिकारी को फोन कर दरवाजे पर बुलाया। अधिकारी दरवाजे पर आया और सेवानिवृत्त मुख्य अधिकारी को अंदर ले गया।गाड़ी भी अंदर करवाई और अपने चेंबर में जाते ही वह चेयर पर बैठ गया और चपरासी से कहा- "साहब को जो भी कार्य हो, संबंधित कर्मचारी के पास ले जाकर बता दो"। चपरासी साहब को ले गया और संबंधित कर्मचारी के काउंटर पर छोड़ आया। मुख्य अ...

रौनक

   पूरे परिवार को एकसूत्र में पिरोकर रखने वाली , सबकी चिंता और परवाह करने में मगन खुद के प्रति बेपरवाह रहने वाली , गाहे-बगाहे हमारी गल्तियों पर अपनी खट्टी-मीठी झिड़कियों से नसीहत देने वाली, चाँद और परियों की कहानियां सुनाकर हमें प्रेरणा देने वाली, मीठी लोरी गुनगुनाकर हमें सपनों की रंग-बिरंगी दुनिया में सुख की नींद सुलाने वाली ,सादा खाने में भी अपने हाथों के जादू से स्वाद का तड़का लगाने वाली, रसोई-चौके में कुछ सामान न होते हुए भी, बढिया पकवान झट से बना डालने वाली , अपने हाथों के स्पर्श से पुराने सामान को एकदम नया सा रूप देने वाली, आर्थिक संकट से जूझते परिवार पर अपने पास सहेज कर रखी गई पूंजी न्यौछावर कर देने वाली , हर अपने-पराए को हंस कर गले लगाने वाली दादी-नानी मां , हर घर-परिवार की रौनक होती हैं ! लेकिन न जाने क्यों आजकल परिवार की यही रौनक अब परिवारों से दूर होकर एकाकी जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं और बच्चे इनके अस्तित्व से अंजान एक अलग ही दुनिया में पल-बढ़ रहे हैं जहां मानवीय मूल्य और संवेदनाएं लगभग लुप्त हो चुकी हैं ! कारण , एकल परिवारों का चलन और रिश्तों से अधिक पैसों को...