मार्कशीट
।बच्चों पर हमेशा आदर्श संतान बनने का दबाव होता है । काश इस बात पर भी जोर दिया जाता कि आदर्श "माता-पिता" कैसे बने तो हम बेहतर नागरिकों से घिरे होते । माता पिता बड़ी चतुराई से कहते है कि हमने बच्चें पर पढ़ाई का कोई दबाव नही बनाया । यदि आप बच्चों के साथ हर समय उसके सिलेबस, टीचर्स, क्लास के काम्पटीटर बच्चों, उनकी ट्यूशन में किये इन्वेस्टमेंट , टेस्ट के टॉपर बच्चें के परसेंटेज, सलेक्शन लिस्ट पर बात करते हो तो ये भी प्रकार का स्मार्ट साइकोलॉजिकल प्रेशर है । कोई भी माता पिता बच्चें को मारपीट कर प्रेशर नही बनाते ।
"तुम लोगों को हमने इतनी फेसिलिटी दी है । हमारे समय पढ़ाई पर इतना खर्च ही नही किया गया । हम कंजूसी से रहकर तुम्हारी इतनी महंगी फीस पटा रहे है । बस तुम फ़ला टेस्ट क्लियर कर लो तो सब सही हो जाएगा।"
पेरेंट्स के लिए बच्चों की मेंटल हेल्थ कोई इश्यू ही नही है । माना कि नम्बरों के दबाव की मानसिक यंत्रणा से गुजरने वाला हर बच्चा सोसाइड नही करता मगर उसमें इतनी हीनता बोध आ ही जाती है कि वो खुद के अस्तित्व का आकलन नम्बर से ही करता है । नम्बर के आधार पर खुद को कमतर मान लेने वाला बच्चा अपनी नैसर्गिक ऊर्जा खो देता है ।माता पिता को समझने की जरूरत है कि प्वाइंट प्वाइंट में आगे पीछे हुए नम्बर या फ़ला कालेज़ या फ़ला एग्जाम में सलेक्शन नही हुआ तो जिंदगी खत्म नही होती । मार्कशीट खुशियों की गारंटी नही है लेकिन माता पिता द्वारा दिया गया मॉरल सपोर्ट बच्चें के व्यक्तित्व में स्थायी आत्मविश्वास लाता है और हाँ ये आत्मविश्वास सफलता की गारंटी है जो जिंदगी भर साथ चलता है ।
कोई बात नही फला कालेज़ में एडमिशन नही मिला, दूसरे में हो जाएगा। कोई बात नही इतने परसेंट नही बने तो । "सफलता" की परिभाषा एक कागज़ में लिखे कुछ नम्बर कतई कतई.... कतई नही होते । वो तो छोटे बच्चें है जो मार्कशीट को जिंदगी समझ रहे है ।माता पिता तो बच्चें नही है ।
बच्चें की महंगी शिक्षा में किये खर्च का बार बार उल्लेख कर बदले में नम्बर मशीन की चाह उसे एक दब्बू और दुनियादारी से अनभिज्ञ बच्चा बना रही है ।
बच्चें को इस दुनिया में अकेले सरवाइव करने उसका खुशमिजाज होना, लोगों के साथ सामंजस्य बैठाना , तनाव में भी शांतबुद्धि बने रहना , निर्णय लेने की क्षमता और अपनी बात को सही तरीके से रखने की कला जानना बेहद जरूरी है ।
बच्चों पर नम्बर का इतना बोझ मत डालिये कि उन्हें जिंदगी बोझ लगने लगे । उन्हें पढ़ाई के नाम पर शादियों , रिश्तेदारों , प्लेग्राउंड और दोस्तों से दूर कर देना अपराध है । अफसोस है उन बच्चों के लिए जिन्हें ऐसे माता पिता मिले । क्या ऐसे माता पिता आत्महत्या के लिए प्रेरित करने उत्तरदायी नही है ? सही करते है यूरोपियन देश जो बच्चों को माता पिता की संतान से पहले अपने देश की संपदा मानते है ।
बच्चों को इतना खुलापन मिलना ही चाहिए कि वो मन की कह पाए । अपने पक्ष में बहस कर सकने का साहस देना भी माता पिता का काम है । उनकी मुखरता को बदतमीजी कह कर दबाव बनाएंगे तो वो आपसे बातें छिपाने लगेंगे ।भारतीय माता पिता के लिए बहुत कठिन है लेकिन समझिए कि जितना सम्मान आप बच्चें से चाहते है उसे भी आपको उतना ही सम्मान देना होगा । वो आर्थिक रूप से आप पर निर्भर है इसलिए आपकी बात मान भी जाए अभी शायद । यकीन मानिए बच्चें माता पिता की दी मानसिक यंत्रणा को कभी नही भूलते । कब तक हम संस्कारों के नाम पर अपने बच्चों को चुप रहने कहेंगे ।
आप में से सभी अपने स्कूल कालेज़ के टॉपर्स को याद करिए ।एक उम्र के बाद आप और वो संतुष्टि के स्तर पर समान होंगे । जिंदगी को स्वीकारना और खुश रहना ही सबसे बड़ी सफलता है ।
बच्चों को गले लगाकर कहिए - जितना पढ़ लिया बहुत है। मुझे मालूम है तुमने बहुत मेहनत की है । जो भी रिजल्ट हो हमें फर्क नही पढ़ता । तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा ही सबसे बड़ी मार्कशीट है ।
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