गौरैया



“इतनी दूर जाना ज़रूरी है क्या? और फिर कितना तो खर्चा हो जाएगा। पापा पे इतना बोझ डालना ठीक नहीं है। पहले ही पढ़ाई के खर्चे पे रिश्तेदार सुना देते हैं कि इतने में तो शादी हो जाती।” 

“तो ये सब तो ऐप्लिकेशन डालने के पहले सोचना था ना? और स्कॉलरशिप मिल तो रही है। खर्चा तो पहले से कम ही है। और इतनी चिंता है, तो वहाँ रोज़मर्रा के खर्चे कम कर लेना।” शांत भाव से कपड़े समेटती माँ ने कहा। 

“वो तो खैर मैं कुछ नौकरी भी कर लूँगी। लेकिन इतना दूर!! सब लोग क्या बोलेंगे।” मैं अभी भी आशंकित थी। 

“डर लग रहा है?” माँ अब मुस्कुरा रही थी। 

“मेरी छोड़ो! तुम्हें नहीं लग रहा? इतनी दूर जा के बिगड़ गई मैं तो? और फिर सारी माएँ तो बच्चों को पास रखना चाहती हैं। सुना नहीं था मिश्रा आंटी क्या कह रही थीं चौहान आंटी के बारे में? कि एक भी बच्चा पास नहीं है! क्या मतलब ऐसी औलाद का!” 

अब तक माँ के कपड़े भी समेटे जा चुके थे, और चेहरे पे आई सलवटें भी। मेरे सामने बैठ के बहुत धीर गम्भीर शब्दों में माँ ने कहा, “ध्यान से सुनो! सौ लोगों और हज़ार परिस्थितियों पे शक करने से आसान है एक इंसान पे यक़ीन करना। और मुझे यक़ीन है तुमपे। औलाद इसलिए नहीं होती कि हम उन्हें अपने हिसाब से ढालें, बल्कि उनका हिसाब समझ के उन्हें बेहतर बनाएँ। तुम अगर नहीं जाना चाहती तो ना ऐप्लिकेशन डालती, ना इतनी मेहनत से इम्तिहान निकालती। और जब तुम ये चाहती हो, तो डरो मत! तुम मेरी गौरैया हो, पतंग नहीं। मैं चाहती हूँ तुम मुझ तक लौटो तो अपनी मर्ज़ी से आओ। इसलिए नहीं कि मैंने कभी डोर छोड़ी ही नहीं तुम्हारी। ये घर तुम्हारी डाल है लौट आने के लिए। पिंजरा नहीं!”


और माँ मुस्कुरा के उठ चली चाय बनाने। मुझे आज समझ आया कि बचपन से माँ गौरैया क्यूँ कहती थी।



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