बस यूं ही


कल बड़े लंबे अंतराल के बाद मेरी अपने चाचा जी से बातचीत हुई ,टेलीफोन पर। वह गांव में रहते हैं और मेरी चचेरी बहन और उसका परिवार उनकी देखभाल करते हैं। जैसा कि लगभग हर किसी के साथ होता है ,जीवन के चौथेपन में लोग अपने बचपन और यौवन को ही अधिक याद करते हैं। मेरे चाचा जी ने अपनी किशोरावस्था अवस्था में,जब मेरा बचपन था, तब मुझे बहुत अधिक स्नेह और दुलार दिया है। मेरी बाल क्रीड़ाओं की यादों को वे अक्सर ही मेरे साथ साझा करते हैं, वे सदा से ही अति क्रियाशील, स्नेही और सामाजिक व्यक्ति रहे हैं। बड़ी से बड़ी मुसीबत में मैंने उन्हें कभी उदास, परेशान नहीं देखा है परंतु अब शारीरिक क्षमताओं के घट जाने से गांव में रहते हुए कभी-कभी एकाकी हो उठाते हैं।कल जब उनसे बात हुई तो उन्होंने मेरे अन्य भाई बहनों के दूर चले जाने और संपर्क टूट जाने की पीड़ा को मेरे साथ साझा किया। एक बात जो परिवार के संबंध में उन्होंने बताई वह मेरे दिल को छू गई वही आप सबके साथ सांझा कर रही हूं। 

चाचा जी ने कहा कि, परिवार को मुर्गे जैसा मुखिया चाहिए, जो प्रातः काल ही चैतन्य हो और साथ-साथ अपने पूरे परिवार को भी चैतन्य करें। मुर्गेऔर मुर्गी को जब चारा मिलता है,, चोंच से जब जमीन की खुदाई कर कुछ अन्न के दाने, कीड़े मकोड़े वे पा लेते हैं तो क्लक,क्लक करके अपने पूरे परिवार को पास बुला लेते हैं और फिर सब मिलकर उस चारे का आनंद उठाते हैं।

इसके विपरीत कुत्ते को यदि भोजन मिलता है तो वह किसी के साथ भी उसको बांट कर नहीं खाना चाहता,रोटी मुंह में दबाकर वह दूर जाकर उसका आनंद लेता है जिससे किसी और के साथ उसे बांटना ना पड़े। आजकल के समाज में लोग मुर्गी को तो मार कर खा जाते हैं और कुत्ते को राजसी सुख के साथ घरों में पाल लेते हैं। जैसा पशु घरों में रहता है वैसा ही स्वभाव घर वालों का हो गया है। लोग अपने सुख -धन को किसी के साथ बांटना नहीं चाहते केवल स्वयं अपने सीमित परिवार के साथ ही उसका आनंद लेना चाहते हैं ।

चाचा जी के द्वारा दिए गए इन दो जीवों के तुलनात्मक दृष्टांत ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। 

शायद इसीलिए कहा गया है:


बिनु सत्संग विवेक न होई,

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

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