लेखकों की दुनिया में से।

 लेखकों के बारे में आज की पोस्ट डिस्टर्ब करने वाली है। 


मनोरोगी या विक्षिप्त हो जाने वाले लेखक


दुनिया में ऐसे लेखकों की बहुत बड़ी तादाद रही है जो लेखन के भीतरी या बाहरी दबाव या इतर सामाजिक और पारिवारिक दबाव झेल नहीं पाये और मानसिक रोग पाल बैठे। कुछ तो एकाधिक बार पागल करार दिये गये और उन्हें पागलखानों में भी भरती कराया गया। 


ऐसे बहुत से लेखक रहे जो अपने मनोरोगों से जीते जी निजात न पा सके और अंततः आत्म हत्या तक कर बैठे। 


कुछेक लेखक अगर मनोरोगी नहीं भी हुए तो भी बायपोलर डिस्आर्डर जैसे गंभीर रोग पाले रहे और इस कारण साहित्य को उतना न दे सके जितना वे दे सकते थे। आगे की पंक्तियों में ऐसे ही कुछ अभागे लेखकों के बारे में बात की गयी है।


अर्नेस्ट हेमिंग्वे आत्महंता परिवार से नाता रखते थे। उनके परिवार में कई लोगों ने आत्महत्या की थी। ऊपर से शराब की लत ने रही सही कसर पूरी कर दी थी। वे मनोरोगी हो गये और बायपोलर डिस्आर्डर के शिकार हो गये तथा दूसरे कई रोग पाल बैठे। उन्हें कम से कम 15 बार बिजली के झटके दिये गये थे। अंततः गोली मार कर खुदकुशी कर ली थी।


अन्ना भाऊ साठे को शराबखोरी की लत के कारण और मनमाफिक जीवन न जी पाने के कारण कई मानसिक रोग लग गये थे। कई बार सड़क पर गिरे पड़े मिलते।


एडगर एलन पो का जीवन बेहद अस्त व्यस्त रहा। सेहत खराब हुई. गरीबी ने आ घेरा और वे होश खो बैठे। आखिरी दिनों में वे बहुत बदहाली में पाये गये थे। कई बीमारियां हो चुकी थी


बहुत कम लोग जानते हैं कि विश्व साहित्य को सैकड़ों की संख्या में अमर पात्र सौंपने वाले लिओ तालस्ताय जब अपने पात्रों के भीतर उतर कर उनके चरित्र की जटिलताओं को कागज पर उकेरते थे तो वे खुद गहरे लंबे और दम घोंटने वाले अवसाद में आ जाते थे। इन जानलेवा अनुभवों से बचने के लिए बुढ़ापे में भी वे यात्राएं करते रहते थे।


गुलिवर की यात्राओं के एंग्लो आइरिश लेखक जोनाथन स्विफ्ट पर लंबे समय तक पागलपन के दौरे पड़ते रहे। वे कई बार सामान्य व्यवहार की और होश में रहने की सीमाएं लांघ जाते। एक बार तो वे अपनी सूजी हुई आँख ही निकालने के लिए छटपटाने लगे थे और उनके पाँच नौकर मिल कर ही उन्हें रोक पाये थे।


देवेन्द्र सत्यार्थी जी की अंतिम दिनों में सिर पर लगी चोट की वजह से याददाश्त चली गयी थी।


भुवनेश्वर का 1948 से मानसिक असंतुलन शुरू हुआ पर विक्षिप्त नहीं कहे जा सकते थे। नवंबर 1957 तक वे लखनऊ, बनारस, शाहजहांपुर और इलाहाबाद में टाट के बोरे पहने फटेहाल घूमते देखे गये।


. मुकदमों ने मंटो को आर्थिक, मानसिक और शारीरिक तौर पर बुरी तरह से तोड़ दिया था। यहां तक कि उन्हें दो बार पागलखाने में भी भर्ती होना पड़ा।


मुक्तिबोध पर्सीक्यूशन मेनिया के शिकार हो गये थे और उन्हें हवा में तलवारें दिखाई देतीं। रात को सपने में मोटी-मोटी छिपकलियां उनके ऊपर गिरतीं, वे पसीने-पसीने हो जाते।


मोपासां को मृत्यु का डर और तरह तरह के काल्पनिक भय परेशान करते। वे जवानी से ही गुप्त रोग से पीड़ित थे और इस चक्कर में एक बार खुदकुशी की भी कोशिश कर चुके थे। सिफलिस ने उन्हें मानसिक तौर पर विक्षिप्त बना डाला था।


राहुल सांकृत्यायन के अंतिम दिन बहुत तकलीफ में गुजरे। मधुमेह और स्मृति लोप। छत्तीस भाषाएं जानने वाले महा पंडित राहुल सांकृत्यायन अंतिम दिनों में अपना नाम भूल गए थे।


वर्जीनिया वुल्फ अक्सर बायपोलर डिस्आर्डर की शिकार हो जातीं। उन्हें तीन बार पागलखाने में रहना पड़ा। अंततः आत्म हत्या की।


शैलेश मटियानी को अंतिम दिनों के संघर्षों ने विक्षिप्त बना दिया था।


निराला जी को तमाम संघर्षों-विरोधों और समझौता-विहीन जीवन ने मानसिक तौर पर तोड़ दिया था।


हिन्दी की समर्थ लेखिका लवलीन को भी कई मानसिक बीमारियों ने घेर रखा था। उन्होंने खुद बताया था कि उनके परिवार के कई सदस्य सामान्य जीवन नहीं जी पाए थे। वे पचास बरस से कम की उम्र  में गुज़र गयी थीं। 


स्वदेश दीपक में बायपोलर डिस्आर्डर के लक्षण दिखायी दिये थे। दो एक बार आत्म हत्या की कोशिश की और बेहद डरावना समय उन्होंने देखा। अपने हाथों की नसें काटी और खुद को जलाने की भी कोशिश की। वे 2006 से लापता हैं।





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