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Showing posts from August, 2025

सब मन का खेल है । जिस ने मन को समझ लिया वो मुक्त हो गया !

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 आज से तीसेक साल पहले की बात बतलाऊँ। तब अमीर भी इतने अमीर नहीं होते थे कि एकदम अलग-थलग हो जावें। अपना लोटा-थाली अलग लेकर चलें। पंगत में सब साथ ही जीमते थे। मिठाइयों की दुकान पर वही चार मिठाइयाँ थीं, बच्चों के लिए ले-देकर वही चंद खिलौने थे। जब बाज़ार ही नहीं होगा तो करोड़पति भी क्या ख़रीद लेगा? अमीर से अमीर आदमी भी तब दूरदर्शन पर हफ्ते में दो बार रामायण, तीन बार चित्रहार और नौ बार समाचार नहीं देख सकता था, क्योंकि आते ही नहीं थे। देखें तो उस ज़माने में तक़रीबन सभी एक जैसे ग़रीब-ग़ुरबे थे। सभी साइकिल से चलते थे। कोई एक तीस मार ख़ां स्कूटर से चलता होगा। हर घर में टीवी टेलीफोन नहीं थे। फ्रिज तो लखपतियों के यहां होते, जो शरबत में बर्फ़ डालकर पीते तो सब देखकर डाह करते। लोग एक पतलून को सालों-साल पहनते और फटी पतलून के झोले बना लेते। चप्पलें चिंदी-चिंदी होने तक घिसी जातीं। कोई लाटसाहब नहीं था। सब ज़िंदगी के कारख़ाने के मज़दूर थे।  जीवन जीवन जैसा ही था, जीवन संघर्ष है ऐसा तब लगता नहीं था। दुनिया छोटी थी। समय अपार था। दोपहरें काटे नहीं कटतीं। पढ़ने को एक उपन्यास का मिल जाना बड़ी दौलत थी। दूरदर्शन पर क...

अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।

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 जब मृत्यु का समय निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धर्मपाल को बुलाकर कहा कि,  बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।  तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी। बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए। अब घर का खर्च बेटे धर्मपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।  धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।  क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।   एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना...

ईश्वर कौन है ?

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कौन चलाता है यह दुनियां को ??? कहाँ है ईश्वर?? तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे, फिर भी जिए। हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो, फिर भी जिए। श्वास लेने का भी उपाय न था, फिर भी जिए। नौ महीने माँ के पेट में तुम थे, कैसे जिए? तुम्हारी मर्जी क्या थी? किसकी मर्जी से जिए? फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया, किसकी मर्जी से? अभी दूध को पीनेवाला आने ही वाला है कि दूध तैयार है, किसकी मर्जी से? गर्भ से बाहर होते ही तुमने कभी इसके पहले साँस नहीं ली थी माँ के पेट में तो माँ की साँस से ही काम चलता था— लेकिन जैसे ही तुम्हें माँ से बाहर होने का अवसर आया, तत्क्षण तुमने साँस ली, किसने सिखाया? पहले कभी साँस ली नहीं थी, किसी पाठशाला में गए नहीं थे, किसने सिखाया कैसे साँस लो? किसकी मर्जी से? फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को जो तुम पीते हो, और तुम्हारे भोजन को? कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है? किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं? कौन जब तुम थक जाते हो तुम्हें सुला देता है? और कौन जब तुम्हारी नींद पूरी हो जाती है तुम्हे...

थाली में परोसा भविष्य 🍛

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प्रातःकाल का वह समय था—लगभग पाँच बजे। जब सारा नगर नींद में डूबा होता था, मैं तब अपने मकान की गैलरी में सैर कर रहा होता था। वही समय होता था जब अख़बार वाला अपनी साइकिल की घंटी के साथ मेरे मुख्य द्वार के सामने से गुजरता, झटपट अख़बार फेंकता और मुझसे कहते हुए निकल जाता—"नमस्ते डॉक्टर साहब!" वक्त बीतता गया और मेरी दिनचर्या में परिवर्तन आ गया। अब मैं सुबह सात बजे उठने लगा। कई दिनों तक वह मुझे न देखकर शायद हैरान हुआ होगा। फिर एक रविवार को वह प्रातः नौ बजे मेरे घर आया। चेहरे पर चिंता, लेकिन स्वर में आदर। “डॉक्टर साहब,” उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “एक बात कहूँ?” मैंने मुस्कराते हुए कहा, “ज़रूर, कहो।” वह बोला, “आपने सुबह जल्दी उठने की आदत क्यों छोड़ दी? आप ही के लिए मैं रोज़ विधान सभा मार्ग से सबसे पहले अख़बार उठाता हूँ और सोचता हूँ कि डॉक्टर साहब मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। इसलिए सबसे पहले आपका घर आता हूँ।” मैं थोड़ा चकित हुआ, “तुम विधान सभा मार्ग से आते हो?” “हाँ, साहब। वहीं से वितरण की शुरुआत होती है।” “तो फिर... जगते कितने बजे हो?” “ढाई बजे। साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ। सात बजे त...

जरा_याद_इन्हें_भी_कर_लो

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  बात फ़रवरी 1963 की है. चीन से लड़ाई ख़त्म होने के तीन महीने बाद एक लद्दाख़ी गड़ेरिया भटकता हुआ चुशूल से रेज़ांग ला जा पहुंचा. एकदम से उसकी निगाह तबाह हुए बंकरों और इस्तेमाल की गई गोलियों के खोलों पर पड़ी. वो और पास गया तो उसने देखा कि वहाँ चारों तरफ़ लाशें ही लाशें पड़ी थीं.... वर्दी वाले सैनिकों की लाशें. जानीमानी सैनिक इतिहासकार और भारतीय सेना के परमवीर चक्र विजेताओं पर मशहूर किताब 'द ब्रेव' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, 'वो गड़ेरिया भागता हुआ नीचे आया और उसने भारतीय सेना की एक चौकी पर इसकी सूचना दी. जब सैनिक वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हर मृत भारतीय सैनिक के शरीर पर गोलियों के कई-कई ज़ख्म थे. कई अभी भी अपनी राइफ़लें थामे हुए थे. नर्सिंग असिस्टेंट के हाथ में सिरिंज और पट्टी का गोला था." उन्होंने कहा, "किसी की राइफ़ल टूट कर उड़ चुकी थी, लेकिन उसका बट उसके हाथों में ही था. हुआ ये था कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद वहाँ भारी हिमपात हो गया और उस इलाके को 'नो मैन्स लैंड' घोषित कर दिया गया. इसलिए वहाँ कोई जा नहीं पाया." रचना बिष्ट अपनी किताब में ...

बहु बिना बुलाए मायके भी नहीं जाना चाहिए*

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 * " मम्मी जी इस बार मैं अपने मायके जा रही हूं इसलिए आप छोटी से कह देना कि वो मेरे आने के बाद मायके चले जाए। वैसे भी मुझे अपने मायके गए हुए दो साल हो गए हैं" बड़ी बहू सोना ने ऊषा जी से कहा। " अरे बहू तू मायके जाकर क्या करेगी, अब तो तेरी मां भी नहीं रही। जब तक माता-पिता होते हैं तब तक ही मायका होता है। भाई भाभी का क्या है? बुलाए तो बुलाए, नहीं तो नहीं बुलाए। और वैसे भी तेरे मायके में कोई प्रोग्राम तो है  नहीं। अभी छोटी को ही जाने दे" ऊषा जी ने कहा। " नहीं मम्मी जी, हर बार में यही सोच कर रह जाती हूं। लेकिन इस बार नहीं। इस बार तो मैं मायके जरूर जाऊंगी। जब छोटी मायके जाती है तो मेरा भी मन करता है मायके जाने का " सोना ने कहा। " देख बहू, मैं तुझे मायके जाने के लिए मना नहीं करती, लेकिन जब तक माता-पिता होते हैं तब तक एक बेटी पर  बेधड़क अपने मायके आ जा सकती है। लेकिन जब गृहस्थी भाई भाभी के जिम्मे आ जाए तो बिना न्यौते के मायके नहीं  जाना चाहिए। इससे अपनी ही इज्जत घटती है"  ऊषा जी ने समझना चाहा। " मम्मी जी भाई भाभी तो मेरे ही है ना। भाई तो मेरे साथ ही ...