सब मन का खेल है । जिस ने मन को समझ लिया वो मुक्त हो गया !
आज से तीसेक साल पहले की बात बतलाऊँ। तब अमीर भी इतने अमीर नहीं होते थे कि एकदम अलग-थलग हो जावें। अपना लोटा-थाली अलग लेकर चलें। पंगत में सब साथ ही जीमते थे। मिठाइयों की दुकान पर वही चार मिठाइयाँ थीं, बच्चों के लिए ले-देकर वही चंद खिलौने थे। जब बाज़ार ही नहीं होगा तो करोड़पति भी क्या ख़रीद लेगा? अमीर से अमीर आदमी भी तब दूरदर्शन पर हफ्ते में दो बार रामायण, तीन बार चित्रहार और नौ बार समाचार नहीं देख सकता था, क्योंकि आते ही नहीं थे। देखें तो उस ज़माने में तक़रीबन सभी एक जैसे ग़रीब-ग़ुरबे थे। सभी साइकिल से चलते थे। कोई एक तीस मार ख़ां स्कूटर से चलता होगा। हर घर में टीवी टेलीफोन नहीं थे। फ्रिज तो लखपतियों के यहां होते, जो शरबत में बर्फ़ डालकर पीते तो सब देखकर डाह करते। लोग एक पतलून को सालों-साल पहनते और फटी पतलून के झोले बना लेते। चप्पलें चिंदी-चिंदी होने तक घिसी जातीं। कोई लाटसाहब नहीं था। सब ज़िंदगी के कारख़ाने के मज़दूर थे। जीवन जीवन जैसा ही था, जीवन संघर्ष है ऐसा तब लगता नहीं था। दुनिया छोटी थी। समय अपार था। दोपहरें काटे नहीं कटतीं। पढ़ने को एक उपन्यास का मिल जाना बड़ी दौलत थी। दूरदर्शन पर क...