थाली में परोसा भविष्य 🍛





प्रातःकाल का वह समय था—लगभग पाँच बजे। जब सारा नगर नींद में डूबा होता था, मैं तब अपने मकान की गैलरी में सैर कर रहा होता था। वही समय होता था जब अख़बार वाला अपनी साइकिल की घंटी के साथ मेरे मुख्य द्वार के सामने से गुजरता, झटपट अख़बार फेंकता और मुझसे कहते हुए निकल जाता—"नमस्ते डॉक्टर साहब!"


वक्त बीतता गया और मेरी दिनचर्या में परिवर्तन आ गया। अब मैं सुबह सात बजे उठने लगा। कई दिनों तक वह मुझे न देखकर शायद हैरान हुआ होगा। फिर एक रविवार को वह प्रातः नौ बजे मेरे घर आया। चेहरे पर चिंता, लेकिन स्वर में आदर।


“डॉक्टर साहब,” उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “एक बात कहूँ?”


मैंने मुस्कराते हुए कहा, “ज़रूर, कहो।”


वह बोला, “आपने सुबह जल्दी उठने की आदत क्यों छोड़ दी? आप ही के लिए मैं रोज़ विधान सभा मार्ग से सबसे पहले अख़बार उठाता हूँ और सोचता हूँ कि डॉक्टर साहब मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। इसलिए सबसे पहले आपका घर आता हूँ।”


मैं थोड़ा चकित हुआ, “तुम विधान सभा मार्ग से आते हो?”


“हाँ, साहब। वहीं से वितरण की शुरुआत होती है।”


“तो फिर... जगते कितने बजे हो?”


“ढाई बजे। साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ। सात बजे तक अख़बार बाँट कर घर लौटता हूँ, फिर कुछ देर सोता हूँ और दस बजे दूसरी नौकरी पर निकल जाता हूँ... साहब! बच्चों को बड़ा करना है, पढ़ाना है... तो ये सब करना ही पड़ता है।”


उसका समर्पण देख मैं स्तब्ध रह गया। केवल “ठीक है, तुम्हारे सुझाव को ध्यान में रखूँगा” कह सका।


समय बीतता गया।


पंद्रह वर्ष बाद, एक सुबह वह मेरे घर आया और एक सुंदर निमंत्रण-पत्र बढ़ाते हुए बोला—“डॉक्टर साहब! बिटिया की शादी है... सपरिवार ज़रूर आइए।”


मैंने कार्ड देखा—एक डॉक्टर बेटी, एक डॉक्टर दामाद। आश्चर्य से पूछा, “तुम्हारी बेटी?”


वह जैसे मेरे भाव पढ़ गया। मुस्कराया और बोला—“क्या कह रहे हैं, डॉक्टर साहब! मेरी ही बेटी है। मेकाहारा से एमबीबीएस की है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एमडी है... और बेटा इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में है।”


उसकी सरलता और सफलता देखकर मैं कुछ क्षणों के लिए मौन रह गया। वह फिर बोला, “अब चलता हूँ... कई कार्ड बाँटने हैं।”


मैंने उसे विदा दी... लेकिन मन में कुछ अजीब-सा भाव उतर आया था।


दो साल बाद फिर वह आया, तब बताया कि बेटा अब जर्मनी में कार्यरत है।


जिज्ञासावश पूछ ही लिया, “इतनी सीमित आय में तुमने ये सब कैसे किया?”


वह हल्की मुस्कान के साथ बोला, “डॉक्टर साहब! अख़बार बाँटने के अलावा भी कुछ न कुछ करता था। सबसे ज़्यादा ध्यान रखा कि खर्चे पर कठोर नियंत्रण हो। खाने में भी वही सस्ती, मौसमी सब्ज़ियाँ—कद्दू, लौकी, बैंगन...।”


थोड़ी देर रुका और फिर धीरे से बोला—

“एक दिन बेटा थाली देखकर रो पड़ा। बोला—‘हर रोज़ यही सूखी-सूखी सब्ज़ी! दूसरों के घर में देखो, क्या-क्या बनता है।’


“मैं पास गया, उसके आँसू पोंछे और कहा—‘बेटा, पहले अपनी थाली देख। दूसरों की थाली देखोगे तो अपनी भी खो बैठोगे। ये रूखी-सूखी थाली नहीं, इसमें मैं तेरा भविष्य परोस रहा हूँ। इसका अपमान मत कर।’


उसने मेरी आँखों में देखा, मुस्कराया, और सब चुपचाप खा लिया। उस दिन के बाद उसने कोई शिकायत नहीं की।”


अब वह शांत था, और मैं भी।


और आज, जब यह स्मृति पन्नों पर उतर रही है, मैं सोचता हूँ 


आज के बच्चे अपने अभिभावकों की आय को जाने बिना उनसे हर वह चीज़ मांग बैठते हैं जो दूसरों के पास है। उन्हें यह कौन समझाए कि कभी-कभी एक रूखी थाली में भी पूरा भविष्य परोसा होता है... बशर्ते कि आँखें देखने लायक हों।


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