31 दिसंबर 2025

 



हमारे झगड़े पलंग पर 

गीला तौलिया रखने से 

नहीं होते अब।

न होते हैं झगड़े

गलत ढंग से 

चप्पल जूते रखने पर ।

और बिना नहाए नाश्ता

करने पर या 

खाने के साथ सेंव या 

नमकीन लेने पर भी 

अब नहीं होती कोई

 झंझट या तकरार ।

अलमारी में बेतरतीब कपड़े 

या स्टडी टेबल पर 

बिखरी किताबें भी 

अब खीज नहीं

पैदा करती ।

खाने में क्या पसंद करोगे

ये सवाल अब नहीं लुभाता

बल्कि ये पूछना कि 

खाने में ये पच जाएगा 

अब सुकून देता है ।

शहर से बाहर सफर पर

जाते समय एक दूसरे को

कपड़ों की नहीं 

दवाइयों की याद 

दिलाने का समय 

आ गया है अब।

अपनी अपनी स्पेस 

ढूंढने के लिए झगड़ने 

का नहीं 

अपनी स्पेस 

दूसरे के लिए

छोड़ने का समय 

आ गया है अब।

जिन बच्चों को

समझाबुझाकर 

डांट डपटकर बड़ा किया है

अब उनकी समझाइश 

सुनने का और उनसे 

डांट खाने का समय 

आ गया है अब।

झगड़ों और डांट का

रूठने और मनाने का

समझने और समझाने का

सबका समय अब 

निकलता जा रहा है।

अब तो 

एक दूसरे का 

एक दूसरे के अंदर 

अनंत विस्तार होते 

देखने का समय है।


31 दिसंबर....

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