35 वर्ष पहले मेरे बचपन की दिवाली
आज का भ्रम और बचपन की हकीकत 35 वर्ष पहले गाँव का जीवन उतना ही सरल था जितना ग्रामीण संस्कृति की विशेषता बताने वाले समाजशास्त्री अपनी किताबों में लिखते हैं। इस सरल ग्रामीण जीवन में बच्चों का बचपन और भी ज्यादा मासूम था। दिवाली की जैसी उत्सुकता आज के बच्चों में है, वैसी हम में नहीं थी, क्योंकि मिट्टी के बने हमारे कच्चे घर में इस दिन न नये वस्त्र पहने का रिवाज था, न पकवान बनाने का और न ही पटाके फोड़ने का। इस दिन सुबह दादाजी अपने प्रतिदिन की दिनचर्या से हटकर सबसे पहले स्नान कर लेते थे और दादीजी गेंहू के दलिये की खीर (क्योंकि पैसों के अभाव में चावल खरीदना मुश्किल होता था) बनाने का उपक्रम शुरू कर देती थी। हम बच्चे उस घड़ी का इंतजार करते थे जब दादाजी उस खीर का भोग हमारे पितृ देवों को चढ़ाते थे, ताकि प्रसादस्वरूप हमें खीर खाने को मिल सके। पेट भर जाने के बाद भी बालमन को तृप्ति नहीं होती थी तो गाँव के और लोगों के पितृ देवों के चबूतरों पर दौड़कर पहुँच जाते थे, जहॉ पीपल के पत्तों पर और खीर खाने का मौका मिल जाता था। हमारे लिए दिवाली का दिन पितृ देवों के लिए बनी अमावस्य की खीर के स्वाद का आनंद लेत...