Life_in_a_metro

अक्टूबर के महीने में शहर बदल सा जाता है..

रात के वक़्त दूधिया रोशनी से नहायी खाली सड़कें..
किसी ऑफिस के बाहर सड़क के किनारे देर रात तक खुलने वाली चाय की टपरी पर गले मे i-कार्ड लटकाये अपनी ही दुनिया में खोये हुए चार दोस्त..
भीनी भीनी सी किसी खास फूल/पौधे से आती सुगंध..
हल्का सा ठंड का अहसास..

और चारों तरफ फैले सन्नाटे के बीच कभी कभी किसी गाड़ी के गुजरने की आवाज़..

मन करता है कुछ गुनगुनाते हुए ड्राइव करें..
फिर लगता है कि FM पर ही किसी जॉकी को क्रिएटिव होने का काम आउटसोर्स करके उसकी ही बातें सुनें..

समान्यतः इस महीने में दुनियादारी की दिक्कतें कम होती है..
और मिजाज फेस्टिव होता है..

न अप्रेजल का युद्ध..
न फीडबैक का चकल्लस..
शायद सबसे कम रेसिग्नेशन इसी महीने पड़ते होंगे..

हल्की सी ठंडी हवा जब हाफ स्लीव टी शर्ट से टकराती है..
तब अवचेतन मन में अपने आप दीवाली का अहसास होने लगता है..

और जब दीवाली की बात होती है..
तो कभी ये शहर याद नहीं आता जहां रोजी रोटी की तलाश में बसे हैं..

याद आता है वो घर..जहाँ होश संभालते ही दीवाली मनायी थी..

दीवाली के नाम पे अब बस पटाखे चलाने या न चलाने की बहस ही रह गयी है..

वो दो हफ्ते पहले से कॉपी के पट्ठे, जूतों के डब्बे में कागज़ फूँसा भर के बनाये जाने वाला रावण

और चौपाल पर कॉपी/अखबार/गत्ते से बनायी जाने वाली लंका अब कहाँ रह गयी है..

मिट्टी के दिये बटोर कर उनसे तराजू बनाने वाली कला भी अब लुप्त ही हो गयी है..

मैंने कहा न कि अक्टूबर  के महीने में मन शांत से हो जाता है..

और ये किसी फूल/पौधे से आती भीनी सी खुशबू..

कुछ पुरानी यादें कुरेदने पर मजबूर कर ही देती है ❤️


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