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Showing posts from December, 2019

चाय के नुक्कड़

कभी-कभी नहीं अक्सर ही मेरे दिल में खयाल आता है... कि शहर के हर चौराहे पर, हर एक नुक्कड़ पर.... चाय की एक गुमटी औरतों के लिए भी होनी चाहिए जहाँ खड़ी हो कर कभी अकेले तो कभी अपने दोस्तों के संग बीच बाज़ार, भरे चौराहे, ठहाके लगा सकें साझा कर पाएं अपने घुमक्कड़ी के किस्से नौकरी की परेशानियां नज़रंदाज़ कर दी गयी फब्तियां देश की इकॉनमी पर अपने विचार वायरल हुए जोक और मीम्स और वो सब कुछ जो उनके मन की चारदीवारी में खरबों युगों से ज़ब्त है एक धौल में सारी मायूसी लापता हो जाये चाय की चुस्कियों के मिठास में गुम हो जाये... बेटी के इंजीनियरिंग एंट्रेंस की चिंता नौकरीपेशा बेटे के लिए अपनी जैसी हूबहू बहु लाने का सपना बंद हो जाये... इतनी देर कैसे हो गयी, इतनी देर कहाँ रह गयी घर का कुछ ध्यान है या नहीं जैसे अनगिनत सवालों का गूंजना और सबसे बड़ा सवाल कि ''आज खाने में क्या पकेगा?'' की पकाहट से कुछ पल के लिए सही मिल जाये मुक्ति औरतें अपने सारे फ़िक्र, सारी परेशानियां पास पड़े कूड़े के डब्बे में फेंक दें और मुस्कुराते हुए कहें... चल यार! कल मिलते हैं इसी समय अप...

हद जिंदगी की

          "मम्मा, मुझे एक्सट्रा क्लासेस केलिए देर हो रहा है।मैं चलती हूँ" यह कहके राधिका दरवाजा पीट के हडबडी में चली गयी।"बेटा,नाश्ता करके तो जा" रसोई से मुद्रा ये कहके आने तक राघिका की स्कुटी की ध्वनी क्षीण हो गया था।मुद्रा को राधिका की व्यवहार आज कल अजीब लग रहा था।जो हर माँ बाप को होता है बच्चों की किशोर उम्र में।मन में संदेह की बुंद बडा आकार ले रही थी।"कहीं मेरी बेटी किसी से..." अपने आप से कुछ कहते कहते यकायक से चुप हो गयी मुद्रा।मन की नाव उसे कहीं और लेके जा रही थी।             बिलकुल राधिका की उम्र की ही थी वो। इसी तरह व्यस्त हो कर दौडती थी काॅलेज मानस से मिलने।चुपके चुपके लाइब्रेरी में मिल मिल कर ही उन दोनों का प्रेम परिपक्व हुआ था।हर प्रेमी के तरह वो भी कुछ सोच के अपने आप हसती थी।सबकी तरह वो भी डायरी में गीत की अंतरा लिखती थी,         "पहले भी यूं तो बरसे थे बादल          पहले भी यूं तो भीगा था आँचल              अब के बरस क्यों सजन   ...

ठण्ड बहुत है

दिसंबर का महीना अभी बीता नहीं ठण्ड भी परवान नहीं चढ़ी बर्फ यहाँ वहां बिखरी पड़ी है मुझे याद आता है मुंशी प्रेमचंद का झबरू जो पूस की रात में अपने मालिक से चिपक दूर करता है ठण्ड का कहर और मालिक भी बेखबर फसल के चौपट हो जाने से, अभी बाकि है बुखारी में आग का सुलगना अभी-अभी चूल्हे की आग ठण्डी पड़ी है और वो मूंगफली के स्वाद में भूल गयी है चावल चढ़ाना लकड़ी की सीलन ने बढ़ा दी हैं मुश्किलें अब आग नहीं जलती उठता है धुआं मेरी एक साल की बिटिया कुनमुनाने लगी है सच में दिसम्बर में जनवरी सी ठण्ड है