ठण्ड बहुत है



दिसंबर का महीना अभी
बीता नहीं
ठण्ड भी परवान नहीं चढ़ी
बर्फ यहाँ वहां बिखरी पड़ी है
मुझे याद आता है
मुंशी प्रेमचंद का झबरू
जो पूस की रात में
अपने मालिक से चिपक
दूर करता है ठण्ड का कहर
और मालिक भी बेखबर
फसल के चौपट हो जाने से,

अभी बाकि है
बुखारी में आग का सुलगना
अभी-अभी
चूल्हे की आग ठण्डी पड़ी है
और वो मूंगफली के स्वाद में
भूल गयी है चावल चढ़ाना
लकड़ी की सीलन ने
बढ़ा दी हैं मुश्किलें
अब आग नहीं जलती
उठता है धुआं

मेरी एक साल की बिटिया
कुनमुनाने लगी है
सच में दिसम्बर में
जनवरी सी ठण्ड है


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