हद जिंदगी की
"मम्मा, मुझे एक्सट्रा क्लासेस केलिए देर हो रहा है।मैं चलती हूँ" यह कहके राधिका दरवाजा पीट के हडबडी में चली गयी।"बेटा,नाश्ता करके तो जा" रसोई से मुद्रा ये कहके आने तक राघिका की स्कुटी की ध्वनी क्षीण हो गया था।मुद्रा को राधिका की व्यवहार आज कल अजीब लग रहा था।जो हर माँ बाप को होता है बच्चों की किशोर उम्र में।मन में संदेह की बुंद बडा आकार ले रही थी।"कहीं मेरी बेटी किसी से..." अपने आप से कुछ कहते कहते यकायक से चुप हो गयी मुद्रा।मन की नाव उसे कहीं और लेके जा रही थी।
बिलकुल राधिका की उम्र की ही थी वो। इसी तरह व्यस्त हो कर दौडती थी काॅलेज मानस से मिलने।चुपके चुपके लाइब्रेरी में मिल मिल कर ही उन दोनों का प्रेम परिपक्व हुआ था।हर प्रेमी के तरह वो भी कुछ सोच के अपने आप हसती थी।सबकी तरह वो भी डायरी में गीत की अंतरा लिखती थी,
"पहले भी यूं तो बरसे थे बादल
पहले भी यूं तो भीगा था आँचल
अब के बरस क्यों सजन
सूलग सूलग जाये मन
भीगे आज इस मौसम में
लगी कैसी ये अगन "
काॅलेज के पार्क में इश्क लड़ाना और काॅलेज के बाद मानस के साथ उसका बेपरवाह घुमना जैसे आम हो चला था।घर में बिना बताये फिल्म जाना, आधा दिन रेस्तरां में बैठे रहना और मानस की छिछोरापन पे "धेत तुम भी न" कहकर मुस्कुराने को वो प्यार सोच रही थी।
जब हम जिंदगी में किसी से मिलते हैं तो हमारे बीच एक हद अपने आप तैयार हो जाता है।और कभी कभी वही हद ही रिश्तों की सुलझी गांठ को ओफ़जाई रखने में पूर्ण मदद करती है।पर इश्क़ में कोई हद दिखता हे भला! उम्र की आकर्षण और जज्बाती जवानी ने भी पूरी पूरी सहायता कि थी उन दोनों को सारे हदें लांघ देने के लिए ।बुझते दिये के साथ जो कभी मिलन हुआ था, उसके बाद जिंदगी में दिये कभी जले ही नहीं।जबसे मुद्रा को पता चला कि वो गर्भवती है तबसे तो वो खुशी से पागल होते जा रही थी।पर कहीं न कहीं खटक रहा था उसकी आत्मा को।सारे धुंधलापन को साफ करने केलिए मानस का दो प्यार भरे काफी थे।उसे यकीन था कि मानस उसे कभी धोखा नहीं देगा । घर में शादी की बात छिड चुकी थी और सब खूश भी थे।शादी के दिन अचानक मानस कहीं गायब हो गया।न घर वालों को पता था न दोस्तों को।"The number you have dialed is currently switch up, please call later" 75वां कॅल पे भी यही सुनके मुद्रा जोर से रोकर फ़र्श में गिर पड़ी।फिर हजारों अंगुठे उसे उसकी चरित्र और फूटी किस्मत दिखा रहे थे और सबकी बात उसकी गर्भ में पलती बेटी पे खत्म हो रही था।धैर्य तो तब धराशायी हो गया जब बच्चा गिराने की बात आयी।उसने रातों रात घर छोड दीया था।आते वक्त बस दो ही चीजें उसकी साथ थे;एक शादी में पहनी साडी और उसका आत्मसम्मान।
नाव की कस्ती कहीं किसी और धार पे लगती कि मुद्रा का ध्यान बाहर राधिका की स्कूटी की आवाज़ की तरफ चला गया।दरवाजा खोलते ही मुद्रा राधिका पे बरस पड़ी,"वहीं रूको राधीका, मैंने तुम्हारे सर को फोन लगाया था और तुम वहाँ नहीं थी! कहाँ गयी थी तुम? तुम्हारी जानने की उम्र होते ही मैंने तुम्हे हमारे अतीत के बारेमें सब बता दिया था न।फिर भी तुम ऐसे राह में जा कैसे सकती हो!जिंदगी बहुत कीमती होती हे बेटी और उसमें हदें और भी कीमती"।राधीका में आज मुद्रा खुद को देख रही थी और जिंदगी भर रही खूद से सिकायतों को उगल देना चाहती थी।तभी राधीका सहमी सी बोली,"माँ,प्लिज आप शांत हो जाओ।मुझे आपको कुछ बताना है।माँ ..... बाबा आएहें"।मुद्रा निःशब्द हो गयी।उसका गला और होंठ सूखे जा रहे थे।वो खूद की वश में न रही।तभी राधिका ने आवाज दी
,"बाबा... अंदर आइए"।बाहर खडे सब सुन कर आँखों में नमी,लज्जा और दिल पे जमीर की धिक्कार लिए दरवाजा पे दस्तक दिया मानस नें।राधिका फिर से कहना सूरू किया,"माँ आप जानते नहीं पापा के साथ क्या हुआ था।माँ पापा का accident हो गया था उसदिन और पापा 16 साल कोमा में थे।घर बालों को कुछ नहीं पता था और उन्होनें दो साल से हमें पागलों के तरह ढुंढते रहे हें।कितनी मुस्किलों से वो हमें ढूढ पाये हें।आप के absense में उस दिन एक चिट्ठी आयी थी; और वो पापा की थी।माँ एक महीने से extra classes के नाम पे पापा से ही मिलने जाती थी"
( एक हफ्ते बाद)
"माँ ,प्लिज प्लिज मान भी जाइए न!"जिद करते राधिका ने कहा।मुद्रा हल्की शरम से कही,"धत! इस उम्र में शादी!"।" पापा भी बडे मुस्किल से राजी हुए हैं।आप प्लीज मान जाइए न!प्लीज प्लीज प्लिज"राधिका लग भग रोने को आ गयी थी।"अरे अरे ठीक हे बाबा,मैं तैयार हूँ"।दूर से मानस ये सब देखके बहुत खुश हो रहा था।आज पूराने बरामदे पे फिर से नयी सुबह की किरनें बिखरे पडी है
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