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Showing posts from April, 2021

कल और आज

   कल मैं, "मैं" था , आज भी मैं ,मैं ही हूँ, लेकिन कल और आज में , आकाश ,जमीन का अंतर आ गया । कल तक मैं सेवारत था , आज मैं सेवानिवृत हो गया । कल तक जिस कुर्सी पर बैठ कर   साधिकार शासन करता था , आज , उसी कुर्सी के लिए, मैं ,अनधिकृत हो गया । कल तक मैं आदरणीय ,सम्मानीय, पूज्य , माननीय आदि आदरसूचक , शब्दो से संबोधित किया जाता था , आज वही सामान्य हो गया ।   मैं जबतक सेवारत था ,  दिन के सामान प्रकाशित , ज्योतित और आलोकित था , आज मेरा एक तरह से , अवसान हो गया । प्रज्ज्वलित स्वरूप , एकाएक मंद हो गया । मैं सही अर्थ में ,मैं , नही रह गया और वो हो गया । इसी प्रकार तन में , जबतक सांसें रहती हैं , मैं नाम से पुकारा जाता हूँ , और सांसें बंद होने के बाद , मैं मैं नही रह जाता हूँ , लाश या बॉडी हो जाता हूँ । त्याज्य , अस्पर्शीय जो जाता हूँ । या तो जला दिया जाता हूँ , या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता हूँ । स्वर्गीय ,दिवंगत आदि हो जाता हूँ । लगभग यही स्थिति , पदस्थापित और स्थान्तरित पदाधिकारियों की होती है ।  जबतक जिलाधिकारी ,एस पी , अपने पदों...

देश जरूर काम आया

 मैं आने वाली  नस्लों के लिए  ये साफ लिख रहा हूँ कि जरूरत के दौर में  सरकार काम  नहीं आयी किसी के- पर  देश जरूर काम आया- हर गालों के आँसू  अजनबी कांधों पर गिरे- कटे हुए जंगल में  हम सब  एक दूसरे की छाँव में खड़े हुए। बुझते वक़्त में हर घर ने दूसरे घर  के लिए चूल्हा जलाया। मेरे बच्चों- सरकार नहीं आयी काम- देश जरूर काम आया।।

बूढ्ढे बुढ्ढी की नोंक-झोंक

इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ही ख़त्म नहीं होता... एक बार के लिए मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करूं क्यों लड़ते हैं हरवक़्त, आख़िर बात क्या है...  . फिर सोचा मुझे क्या, मैं तो यहाँ मात्र दो दिन के लिए ही तो आया हूँ... मगर थोड़ी देर बाद आंटी की जोर-जोर से बड़बड़ाने की आवाज़ें आयीं तो मुझसे रहा नहीं गया... ग्राउंड फ्लोर पर गया मैं, तो देखा अंकल हाथ में वाइपर और पोंछा लिए खड़े थे... मुझे देखकर मुस्कराये और फिर फर्श की सफाई में लग गए... अंदर किचन से आंटी के बड़बड़ाने की आवाज़ें अब भी रही थीं... कितनी बार मना किया है... फर्श की धुलाई मत करो... पर नहीं मानता बुड्ढा... मैंने पूछा "अंकल क्यों करते हैं आप फर्श की धुलाई?, जब आंटी मना करती हैं तो"... अंकल बोले " बेटा! फर्श धोने का शौक मुझे नहीं इसे है। मैं तो इसीलिए करता हूं ताकि इसे न करना पड़े।"...  "ये सुबह उठकर ही फर्श धोने लगेगी इसलिए इसके उठने से पहले ही मैं धो देता हूं" . क्या!... मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। अंदर जाकर देखा आंटी किचन में थीं। "अब इस उम्र में बुढ़ऊ की हड्डी पसली कुछ हो गई तो क्या होगा? मुझ...

बेटियों का विवाह

 बेटियों का विवाह तय होते ही मातापिता जब तक महज एक अदद डबल बैड, ड्रैसिंग टेबल और सेफ-अलमारी की सोच से निकलकर बाहर नहीं आएंगें , और अपनी बेटी रूपी पौध को ससुराल की मिट्टी में रोपने से पहले उस मिट्टी की उर्वरकता , खाद, पानी , हवा और धूप के साथ साथ माली की कार्य-कुशलता, संवेदनशीलता, गतिशीलता, आत्मनिर्भरता , सहनशीलता , आत्मकेंद्रिता की जाँच पड़ताल करना शुरु नहीं करेंगें तब तक विवाह नामक संस्था अपनी विश्वसनीयता को लेकर संदेह के घेरे में ही रहेगी ! वरना, कुछ नहीं बदलेगा, दूल्हे की मैरून शेरवानी, दुल्हन का लाल लहंगा, बैंड पर "मेरे यार की शादी है" की धुन "बहारों फूल बरसाओ" ट्रैक बजाकर , आने वाले पतझड़ की आहट दबा , बेटियों के हृदय में सचमुच की बहार का भ्रम पैदा करता फिल्मी गीत, विवाह की रस्मों एवं मंत्रोच्चारण को  जैसे तैसे निपटाकर चैन की साँस लेते  'सो काल्ड मनमीत्स!' विवाह तय होते ही किसी भी मायके और ससुराल ने,  कभी सोचा है बेटियों को किताबों की अलमारी देने की ? कभी सोचा है उसको पेंटिंग के लिए कैनवस और ब्रश देने की ? कभी सोचा उसे डायरियाँ और खूबसूरत कलम देने की ? क...

माँ का पल्लू

    मुझे नहीं लगता, कि आज के बच्चे            यह जानते हों , कि            पल्लू क्या होता है ?         इसका कारण यह है, कि            आजकल की माताएं         अब साड़ी नहीं पहनती हैं।      *पल्लू*       बीते समय की बातें हो चुकी हैं।      माँ के पल्लू का सिद्धाँत ... माँ को  गरिमामयी छवि प्रदान करने के लिए था।    इसके साथ ही ... यह गरम बर्तन को     चूल्हा से हटाते समय गरम बर्तन को        पकड़ने के काम भी आता था।          पल्लू की बात ही निराली थी.            पल्लू पर तो बहुत कुछ               लिखा जा सकता है।   पल्लू ... बच्चों का पसीना, आँसू पोंछने,     गंदे कान, मुँह की सफाई के लिए भी            इस्तेमाल किया...

महत्वपूर्ण सीख(Renu)

एक युवा युगल के पड़ोस में एक वरिष्ठ नागरिक युगल रहते थे , जिनमे पति की आयु लगभग अस्सी वर्ष थी , और पत्नी की आयु उनसे लगभग पांच वर्ष कम थी। युवा युगल उन वरिष्ठ युगल से बहुत अधिक लगाव रखते थे , और उन्हें दादा दादी की तरह सम्मान देते थे। इसलिए हर रविवार को वो उनके घर उनके स्वास्थ्य आदि की जानकारी लेने और कॉफी पीने जाते थे। युवा युगल ने देखा कि हर बार दादी जी जब कॉफ़ी बनाने रसोईघर में जाती थी तो कॉफ़ी की शीशी के ढक्कन को दादा जी से खुलवाती थी . इस बात का संज्ञान लेकर युवा पुरुष ने एक ढक्कन खोलने के यंत्र को लाकर दादी जी को उपहार स्वरूप दिया ताकि उन्हें कॉफी की शीशी के ढक्कन को खोलने की सुविधा हो सके। उस युवा पुरुष ने ये उपहार देते वक्त इस बात की सावधानी बरती की दादा जी को इस उपहार का पता न चले ! उस यंत्र के प्रयोग की विधि भी दादी जी को अच्छी तरह समझा दी। उसके अगले रविवार जब वो युवा युगल उन वरिष्ठ नागरिक के घर गया तो वो ये देख के आश्चर्य में रह गया कि दादी जी उस दिन भी कॉफी की शीशी के ढक्कन को खुलवाने के लिए दादा जी के पास लायी !  युवा युगल ये सोचने लगे कि शायद दादी जी उस यंत्र का प्रयोग क...