बस यूँ ही


दो साल पहले ही शादी हुई है मेरी , यूँ तो सब ठीक है पर एक दिन मेरा ध्यान गया कि मेरी पत्नी धारा कपड़े सुखाने के लिए तार पर डालते समय अधोवस्त्र भी ऐसे ही खुले में फैला दिया करती है । मुझे याद आया कि जब माँ कपड़े सुखाया करतीं थीं तो कभी भी उनके सुखाए अधोवस्त्र यूँ दिखाई नहीं देते थे । क्यों ? मन सोचने लगा तो समझ आया कि वे हमेशा किसी कपड़े के नीचे उन्हें डाला करतीं थीं ताकि वे सबकी नज़र में ना आएँ । माँ की मदद करने के दौरान जब हम दोनों भाई किसी भी अधोवस्त्र को खुले में डाल देते थे तो माँ उन्हें हमेशा दूसरे कपड़े से ढँक देतीं थीं ।

मैंने धारा से कहा कि तुम अधोवस्त्र किसी भी जगह क्यों फैला देती हो ? 

उसने भी बेहद सरलता से उत्तर दिया इसमें हर्ज क्या है ? अधोवस्त्र हैं तो दिखेंगे ही ! 

‘ पर दिखाने की ज़रूरत भी क्या  है ? ‘ मैं ने पूछा 

‘ और छिपाने की ?’ उसने सवाल किया ।

मेरे पास कोई जवाब नहीं था पर फिर भी मैंने उसे बताया कि माँ चूँकि अधोवस्त्र ढँक कर रखतीं थीं तो हमारी आँखें उन्हें यूँ देखने की अभ्यस्त नहीं हैं ।

इसके बाद मैंने सोचा कि अब मुझे ही समय के साथ , धारा के साथ ही बहना है तो उसके अनुसार ही चलना चाहिए । हो सकता है एक पीढ़ी पहले की महिलाओं को अपने या किसी के भी अधोवस्त्र देखना या दिखाना पसंद ना हो तो वे छिपा कर रखतीं हों और अब की महिलाओं को ऐसा करना ज़रूरी ना लगता हो । समय समय की बात …मैंने बात वहीं ख़त्म कर दी । 

पर जाने क्या हुआ कि कुछ दिन बाद मुझे अपने घर में भी अधोवस्त्र ढँके हुए दिखने लगे । मैंने धारा से पूछा कि अब कैसे ? 

वह मुस्कुराई और बोली ,’ बस यूँ ही !’

एक दबी छिपी मुस्कान हम दोनों के ही होंठों पर आ बिराजी ।

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