बड़ों की सेवा करना एक श्रेष्ठ धर्म है।



आज सुगंधा के कदम वापस गाँव की ओर लौटने को आतुर हैं। क्या गाँव की खुशबू उसे अपनी ओर खींच रही है?


पच्चीस वर्ष पहले गाँव छोड़ा था उसने, पति सुनील के साथ, बेहतर ज़िंदगी की तलाश में। बच्चों के पालन-पोषण में ज़िंदगी कब इतना आगे निकल गई पता ही नहीं चला! 


जब सुनील की एक्सीडेंट में मृत्यु हुई थी तो दोनों बच्चे पढ़ ही रहे थे। सुनील की पेंशन आती थी पर वह बढ़ते बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफ़ी था। घरवालों ने वापस लौटने के लिए कहा पर बच्चों का भविष्य बनाने के लिए वह शहर में ही रुक गई। एक स्कूल में नौकरी मिलने से आर्थिक रूप से काफी सहूलियत हो गई थी।


परन्तु ये बातें तो पुरानी हो गई हैं। अब तो दो साल से शिवांगी व शिवम दोनों ही नौकरी कर रहे हैं, एक बंगलौर में, दूजा पुणे। और वह यहाँ मेरठ में अकेले ही रह रही है। सोचा था कि नौकरी व सखियों में मन लग जाएगा परन्तु रोज़ लौटते वक्त खाली घर काट खाने को दौड़ता है। कितना मुश्किल है अकेले रहना! डिप्रेशन सा रहने लगा है उसे! कोई तो हो घर में!


बच्चे पास बुलाते हैं, वह छुट्टियों में गई भी थी पर वह दुनिया रास नहीं आई उसे। छोटे शहर की वो... उस भागते-दौड़ते महानगर में उसका वजूद खो-सा जाता है।


मायके में कोई है नहीं, ससुराल में सास हैं, गाँव में रहती हैं। शिवम कहता है उन्हें बुला ले अपने पास! पर सत्तर से ऊपर की हैं वो, कैसे आएँगी? एक नन्हे-से पौधे को भी उखाड़ कर दोबारा रोपित करो तो हिल जाता है, कभी-कभी नहीं भी संभल पाता। फिर उनकी तो इतनी गहरी जड़ें हैं और क्षीण काया... क्या वह झेल पाएँगी इस स्थानांतरण को? 


परंतु वह तो अभी स्वस्थ है, वह झेल सकती है किसी भी बदलाव को। क्यों न वह चली जाए वापस गाँव... । जिस वजह से आई थी वह मकसद तो पूरा हो गया है। फिर यहाँ, इस शहर में अकेले रहने का कोई कारण ही नहीं बचा!


"पर मम्मा, आपकी तो अभी दस साल से ज़्यादा की नौकरी बची है, ऐसे कैसे चली जाओगी?" शिवांगी ने आपत्ति जताई। 


सोच कर देख किया है उसने। सुनील के पेंशन के पैसे उसके जीवनयापन के लिए पर्याप्त हैं, फिर इतने वर्षों की बचत भी है। 

"ये काम तो मैं गाँव के स्कूल में भी कर सकती हूँ। हाँ, पैसे कम मिलेंगे पर खर्चे भी कम होंगे व सन्तुष्टि कई गुणा अधिक होगी। फिर तुम्हारी दादी को भी तो उम्र के इस पड़ाव पर सहारे की दरकार होगी। यह तो सोचो वह कितना खुश होंगी!"

"पता नहीं मम्मा, देख लो आप। मुझे तो ठीक नहीं लग रहा।"

"तू चिंता न कर। इसी बहाने उनकी सेवा करने का मौका भी मिलेगा। बड़ों की सेवा करना एक श्रेष्ठ धर्म है।"


आज वह लौट रही है गाँव। माँजी को इत्तला दिया है, उनके तो कदम ही ज़मीन पर नहीं पड़ रहे।

"बहु, भगवान ने मेरी तपस्या का फल दे दिया है। अब सब कुछ तुम्हें सौंप कर मैं चैन से मर सकूँगी।"

"मरने-वरने की बात मत कीजिए। मैं तो साथ जीने आ रही हूँ।"


पैरी-पावना के बाद जिस अपनेपन से चिपटाया है माँजी ने उसे, उसका लौटना तो उसी से सफल हो गया। 


आँसू पोछते हुए बोल पड़ी,

"कितना तरसी हूँ मैं अपनों के लिए इतने वर्ष! लगा था अकेले पड़ी-पड़ी ही गुजर जाऊँगी यहाँ पर तूने आकर मेरी ज़िंदगी में रोशनी भर दी।"


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