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Showing posts from May, 2022

मीनू

  दस साल की मीनू के कमरे में जब माँ आई तो उन्होंने देखा, मीनू सो गई है, उसका लैपटॉप अभी भी खुला था , बंद करने गई तो उनकी नज़र शीर्षक पर चली गई, लिखा था, ‘ दादाजी का स्कूल’ , वह हैरान हो उसे पढ़ने लगीं । उसे लेख कहूँ या कहानी, मुझे पता नहीं, पर वो कुछ इस प्रकार था ; दो महीने पूर्व मेरे क्लास के बच्चे रवांडा जा रहे थे, गुरीला देखने के लिए, और वहाँ से कांगो का रेनफ़ारेस्ट देखने का कार्यक्रम भी था, यह मेरा स्कूल के साथ पहला अंतरराष्ट्रीय ट्रिप होता, परंतु तभी भारत से दादाजी का फ़ोन आया कि दादी बहुत बीमार हैं । पापा ने अपनी सारी मीटिंग कैंसल कर दी, और मम्मी ने मिनटों में टिकटें बुक कर दीं , और मैं इथोपियन ए्अर लाईनस की जगह एमिरेट के जहाज़ में बैठ गई । दादा दादी पिछले साल पूरे तीन महीने हमारे साथ यहाँ बोस्टन में बिता कर गए थे । दादाजी हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज थे, और तीन साल से अपने गाँव के पुश्तैनी घर में रह रहे थे । हम जब तक घर पहुँचे दादी जा चुकीं थी, वे अंतिम दर्शन के लिए हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे । तब मैंने पहली बार मृतक शरीर देखा, और मुझे लगा, मृतक शरीर में भाव, बुध्दि , शक्ति, कुछ भ...

फिजूलखर्ची

  जलाने वाली गर्मियों में कपड़े के जूते पैर जला देते थे। पूरे दिन जूते पसीने से तरबतर हो जाते थे, श्याम लाल ने इस महीने पहली तारीख को ही मन बना लिया था, इस बार कैसे भी 700 रुपये बचाकर उनसे अच्छी सैंडिल ले लेगा ताकि सारे दिन पैर में पसीना न आये और हवा लगती रहे। उस दिन वो ऑफिस से निकला और मैंन मार्किट की और निकल गया, उसने मन बना लिया था कि बढ़िया क्वालिटी की सैंडिल ही लेगा, सोच रहा था बाटा या लिबर्टी की लेगा ताकि देखने में सुंदर भी लगें और पाँवों को आराम भी मिल जाये। कई साल चल भी जाएंगी वे। सामने एक जूते चप्पलों का बढ़िया शोरूम था, वो जल्दी से उस और बढ़ गया दो स्टेप चढ़कर शीशे का दरवाजा अंदर धकेलने वाला ही था कि उसका मोबाईल बज उठा, घर से फोन आया था उसने फोन रिसीव किया। बेटा था फोन पर,उसने कहा,"पापा, मुझे केमिस्ट्री की गाइड बुक चाहिए है आज ही चाहिए है आपको पता है न जुलाई में मेरा नीट का पेपर है।" सुनते ही श्याम लाल के पैर ठिठक गये, उसने कहा "हाँ बेटे आज ही ले आता हूँ।" वो शोरूम की सीढ़ियों से उतरा और सामने के बुक स्टोर की और बढ़ गया, उसने केमिस्ट्री की गाईड ले ली, जो 620 रुपय...

एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएँगे और सारे योगी प्रेमी।”

 “…और फिर कथा सुनाने वाली बुढ़िया ने कहा, ‘‘देखना ! एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएँगे और सारे योगी प्रेमी।” ॰॰ प्रियंवदा को बुद्ध से प्रेम हो गया था। भिक्षाटन के लिए आए बुद्ध के पात्र में हर दिन वह आँसू की दो बूँदें भर देती। गौतम आगे बढ़ जाते। तथागत की दृष्टि अपनी जगह थिर, प्रिया की अपनी जगह। न भगवन आँखें ऊपर करते, न प्रिया नज़रें फेरती। इस तरह दिन-महीने-साल बीतते रहे। प्रियवंदा ठहर गई थी समय के परे किसी बिंदु पर। धरती पर समय और मन नामक दो दैत्यों के बीच सदा से ही होड़ रही है। क्षत्राणी प्रियवंदा मन और समय दोनों को ही पराजित कर शक्ति के थिर सिंहासन पर आसीन हो चुकी थी। किंतु प्रेम के निहत्थे देवता ने सशस्त्र प्रियवंदा को हरा कर उसे अपने वश में कर लिया। खगोल-विज्ञान, दर्शन, संगीत, वेद-पुराणों की ज्ञाता विदुषी प्रियवंदा की बुद्धि का लोहा मानने वाले विद्वान भी उसकी थिर दृष्टि के रहस्य से अनभिज्ञ थे। उसका मौन प्रकृति ने अपनी संदूकची में सुरक्षित रखा लिया जिसके भेद तक पहुंचना सरल बात न थी। पत्थरों की जकड़ में रहने वाले ईश्वर से बेहतर कौन जानता है कि इस दुनिया में सर्वाधिक अनुवाद मौन का हुआ ह...