एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएँगे और सारे योगी प्रेमी।”
“…और फिर कथा सुनाने वाली बुढ़िया ने कहा, ‘‘देखना ! एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएँगे और सारे योगी प्रेमी।”
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प्रियंवदा को बुद्ध से प्रेम हो गया था। भिक्षाटन के लिए आए बुद्ध के पात्र में हर दिन वह आँसू की दो बूँदें भर देती। गौतम आगे बढ़ जाते। तथागत की दृष्टि अपनी जगह थिर, प्रिया की अपनी जगह। न भगवन आँखें ऊपर करते, न प्रिया नज़रें फेरती। इस तरह दिन-महीने-साल बीतते रहे। प्रियवंदा ठहर गई थी समय के परे किसी बिंदु पर।
धरती पर समय और मन नामक दो दैत्यों के बीच सदा से ही होड़ रही है। क्षत्राणी प्रियवंदा मन और समय दोनों को ही पराजित कर शक्ति के थिर सिंहासन पर आसीन हो चुकी थी। किंतु प्रेम के निहत्थे देवता ने सशस्त्र प्रियवंदा को हरा कर उसे अपने वश में कर लिया। खगोल-विज्ञान, दर्शन, संगीत, वेद-पुराणों की ज्ञाता विदुषी प्रियवंदा की बुद्धि का लोहा मानने वाले विद्वान भी उसकी थिर दृष्टि के रहस्य से अनभिज्ञ थे। उसका मौन प्रकृति ने अपनी संदूकची में सुरक्षित रखा लिया जिसके भेद तक पहुंचना सरल बात न थी। पत्थरों की जकड़ में रहने वाले ईश्वर से बेहतर कौन जानता है कि इस दुनिया में सर्वाधिक अनुवाद मौन का हुआ है। प्रियवंदा का मौन भी इससे अछूता न था। इधर पेड़-पहाड़-पंछियों की आँखों में अचरज भरता जाता, उधर तथागत के कमंडल में समूचा हिंद महासागर भर जाने को आतुर था।
प्रियंवदा के हाथों पराजित समय सदा ही उसे पटकने की ताक में रहता। और अंततः वह घड़ी भी आई जब समय को यह अवसर मिला कि वह प्रियवंदा को सैकड़ों व्याधियों से जूझता देख अट्टहास करता। पीड़ा से तड़पती प्रिया को किसी औषधि से आराम न मिलता।
कुछ महीनों पश्चात प्रियवंदा की इस अवस्था का समाचार मठ तक पहुंचा। यह स्थिति ज्ञात होते ही बुद्ध बीच सत्संग से उठ कर प्रिया के घर की ओर चल पड़े। ज्वर से तपती प्रिया को परिजनों ने घेर रखा था। कोई उसके स्वस्थ होने की प्रार्थना करता तो कोई किसी नए वैद्य का पता बताता। अचानक ही बुद्ध को चौखट के भीतर पाकर परिवार के सदस्य चौंक उठे। प्रिया की शैय्या के निकट जा बैठे बुद्ध की बड़ी-बड़ी आंखों से दो बूँदें छलक कर प्रिया की जलती हथेली पर जा पड़ीं।
प्रिया ने आँखें खोलीं, मुस्कुराई और आँखें मूँद लीं।
तभी वातायन में बैठी चिड़िया पंख फड़फड़ा कर आकाश की ओर उड़ गई।
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