फिजूलखर्ची

 


जलाने वाली गर्मियों में कपड़े के जूते पैर जला देते थे। पूरे दिन जूते पसीने से तरबतर हो जाते थे, श्याम लाल ने इस महीने पहली तारीख को ही मन बना लिया था, इस बार कैसे भी 700 रुपये बचाकर उनसे अच्छी सैंडिल ले लेगा ताकि सारे दिन पैर में पसीना न आये और हवा लगती रहे। उस दिन वो ऑफिस से निकला और मैंन मार्किट की और निकल गया, उसने मन बना लिया था कि बढ़िया क्वालिटी की सैंडिल ही लेगा, सोच रहा था बाटा या लिबर्टी की लेगा ताकि देखने में सुंदर भी लगें और पाँवों को आराम भी मिल जाये। कई साल चल भी जाएंगी वे।


सामने एक जूते चप्पलों का बढ़िया शोरूम था, वो जल्दी से उस और बढ़ गया दो स्टेप चढ़कर शीशे का दरवाजा अंदर धकेलने वाला ही था कि उसका मोबाईल बज उठा, घर से फोन आया था उसने फोन रिसीव किया। बेटा था फोन पर,उसने कहा,"पापा, मुझे केमिस्ट्री की गाइड बुक चाहिए है आज ही चाहिए है आपको पता है न जुलाई में मेरा नीट का पेपर है।" सुनते ही श्याम लाल के पैर ठिठक गये, उसने कहा "हाँ बेटे आज ही ले आता हूँ।" वो शोरूम की सीढ़ियों से उतरा और सामने के बुक स्टोर की और बढ़ गया, उसने केमिस्ट्री की गाईड ले ली, जो 620 रुपये की आई।


वो एक छोटी चप्पल जूतों की दुकान पर गया, और 80 रूपये में एक नई जोड़ी स्लीपर चप्पल खरीद ली। रस्ते में वो मन को समझाता जा रहा था, "गर्मियां तो दो महीने ही पड़नी है तभी सैंडिल पहनी जाएंगी, दो महीने के लिए सैंडिल लेना समझदारी नहीं, अच्छा किया स्लीपर ले लिया ऑफिस में ही रख लूँगा इन्हें, सुबह जूते पहन कर जाऊंगा और ऑफिस पहुँचते ही स्लीपर पहन लूँगा, गर्मी भी नहीं लगेगी, शाम को वापस जूते पहन कर घर चला जाऊंगा, अच्छा किया स्लीपर ही ली, सैंडिल पर तो बेवजह ही फिजूलखर्ची थी।"

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