हंसा उड़ जाएगा सब धरा रह जाएगा






 चौथे माले पर फ्लैट था कर्ण जी का एम 441, लिफ्ट के एकदम सामने। सीढ़ी से अगर कोई चढ़े तो सबसे पहले उनका ही फ्लैट मिलेगा। मिसेज कर्ण को शिकायत थी कि इसमें पीछे की तरफ बालकनी है जबकि सामने होता तो शाम में चेयर लेकर बैठ भी जाते तो आने जाने वाले लोग, खेलते हुए बच्चे दिखते तो थोड़ा बहुत तो मन लग जाता। पर कर्ण जी का वश चलता, तो सोते- उठते भी अपने ज्योतिषाचार्य जी से पूछ कर हीं। फ्लैट बुक करने के पहले वह स्वामी जी से दरभंगा जाकर मिले थे। कितनी देर गणना करने के बाद स्वामी जी इस घर को अति शुभ बताए थे। वरना तीन बार तो उनकी सलाह की वजह से फ्लैट की बुकिंग कैंसिल किए थे कर्ण जी। उनके पिताजी भी दरभंगा में स्वामी जी के बताए शुभ घड़ी के हिसाब से भूमि पूजन और घर की नींव में पहली ईंट रखवाए थे। घर परिवार खूब फला फूला उनका और उसी अनुपात में ज्योतिषाचार्य जी भी फलते फूलते गए। ये बड़ी सी तोंद निकल आई थी उनकी, इस वजह से पालकी पर चलने लगे थे। आजकल पालकी की जगह इनोवा है। भक्तों की श्रद्धा की वजह से। उनके आधा दर्जन बच्चे काम की बारीकी सीख, उनके व्यापार को ऊंचाई पर ले जा रहे इन दिनों ।

  कर्ण जी को थोड़ी हिचकिचाहट थी कि 4 तल्ले से बुढ़ापे में उतरना, घुटनों पर बोझ ना बढ़ा दें पर ज्योतिषाचार्य जी गणना बता रही थी कि-अभी सपत्नीक, सुख-शांति से बरसों गुजारेंगे आप। और बिल्डर का आश्वासन कि "लिफ्ट है 24 घंटे जनरेटर की सुविधा के साथ सर" पर असीम विश्वास करते हुए आफ्टर रिटायरमेंट,वो यहां शिफ्ट कर गए, बस पौन बरस पहले।

  पहले तो घर अक्सर वकील साहब, नेताजी, डॉक्टर साहब, मास्टर साहब या साव जी का घर के नाम से पहचाने जाते थे। कोई नंबर या नाम नहीं होता था बल्कि मोहल्ला होता था। कोई-कोई बाद में घर का नाम भी रखने लगा- शांति सदन, एकता भवन, आनंद निवास जैसा कुछ, पर अब तो नंबर ही सब की पहचान है। रसोईघर पूरब में और पूजा घर फलाना दिशा में सब खत्म क्योंकि एक फ्लोर पर 4-6 फ्लैट तो कोण- दिशा सब एक दूसरे के विपरीत में होगें ना। तो वास्तु शास्त्र का चोखा धंधा मंदा है इन दिनों। 

    करण जी नौकरी में थे तो सारे पड़ोसी एक आय, एक वर्ग, समान पद, लगभग सा स्वभाव भी तो संयुक्त परिवार जैसा लगता था कंपनी द्वारा प्रदत क्वार्टर में ।फ्लैट में तो सब अलग-अलग हैसियत, मिजाज के लोग। रिटायर लोगों से कोई मेलजोल थोड़े ही रखना चाहते हैं ।धारणा यह कि एक तो हमेशा ज्ञान बघारेगे, धीरे-धीरे "हमारे जमाने में"- की अनंत बातें सुनाते रहेंगे। सो फ्लोर वाले पांचो यंग कपल बचते हीं रहते थे इन लोगो से। जितने उत्साह से कर्ण जी आए थे, जल्दी ही दूध के उफान जैसा बैठ भी गया था सब कुछ।

           हम दो, हमारे दो -का एक तो मुंबई में था, दूसरा अमेरिका में। मुंबई चार बार घुम लिए थे,तो इस बार अमेरिका जाने के लिए हां कर दिए। दोस्त कहते थे कि वहां 1 महीने तो बड़े मजे मजे सब कुछ आंख फाड़ कर देखते रहो पर दूसरे महीने से घर की याद आने लगेगी और बाकी 4 महीने तो सजा जैसी कटती है अगर घर में छोटे बच्चें ना हो तो। 'तो कौन यहां बहुत हलचल वाली जिंदगी जी रहे हैं'- यह सोच वह अमेरिका जाने के लिए हामी भर दिए टिकट भेज दिया बेटे ने तुरंत। उसे भी तो माता-पिता के जन्म देने पढ़ाने लिखाने के बोझ से थोड़ा सा मुक्त होने का मौका मिल रहा था। सो कर्ण साहब सारी तैयारी कर लिए 1 महीने में ।कुछ अपने मन से, कुछ बेटे बहू से पूछ कर। मिसेज कर्ण तो साड़ियों का मोह त्याग ही नहीं पा रही थी। तीन अलमारी भर तो साड़ी थी। किसको ले, किसको छोड़ें! कभी शिफॉन की लाईट नीली वाली तो, कभी चटक नीली कांजीवरम ज्यादा अच्छी लगती। कभी फैबइंडिया और नल्ली की सूती साड़ियों में संग्राम छिड़ जाता और भागलपुर की तसर की साड़ी कौन कम है। पहनो तो बौद्धिक हो ना हो, झलकता तो बौद्धिकतापन हीं है । तांत की साड़ी अलग ताना मारती। और ये पीले रंग के ढकाई साड़ी पर सुआपंखी और लाल रंग से अशोक वाटिका में सीता को,मय अशोक वृक्ष उकेर दिया था अनाम कलाकार ने, चित्र सदृश्य कांथा स्टिच से। जब भी यह साड़ी पहनीं, लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी थी वो।इसे कैसे छोड़ दें और फिर साड़ी के चयन में उलझ कर वह बिस्तर पर बैठ जाती और बुदबुदाती- "पुराना जमाना ही अच्छा था। दो बनारसी साड़ी बक्सा में तहा कर, फिनाइल की गोली के साथ धरी रहती थी। खानदान, पड़ोसी, सगे संबंधी की सारी शादियां इसी के भरोसे निबट जाती थी। घर में दो जोड़ी सूती साड़ी और साधारण अवसर के लिए थोड़ा सौफियाना (दादी नानी यही बोलती थी सही शब्द मिसेज कर्ण नहीं जानती) सी दो साड़ी बस। आधा दर्जन साड़ी एक समय में बहुत होती थी। पर अब तो तृष्णा बढ़ती ही जा रही। सौ सही वजह और 200 बेवजह अवसर है साड़ी खरीदने की।पहले एक अलमारी में उनके, कर्ण जी के और बच्चों के भी कपड़े समा जाते थे। एक-एक रैक सबका, फिर नीचे वाला रैक तो तौलिया, मेजपोश, चादर से भर जाता था। बच्चे गए, अलमारी दो से तीन, तीन से चार होती गई ।एक कर्ण जी की रही, बाकि गृहलक्ष्मी की। कम साड़ियां थी तो किसी को देने में दिल भी ज्यादा दुखता नहीं था पर अब नहीं। बाबा ,इतनी तो मंहगी ऊपर से कितनी तो एक या दो बार हीं पहन पाई हैं और कितनी अनछुई हीं है ।अब अचानक से पसंद आ गई और बाहर दिखाने का अवसर ना मिला या फिर मैचिंग ब्लाउज के चक्कर में धरी है अब तक, तो इसका मतलब यह तो नहीं कि बांट दें।पहले सस्ती रहती थी तो बीस तीस बार पहन लें तो देने में मोह नहीं लगता था। हालाँकि करण जी कहते ,व्यंग्य कसते हुए -"क्या फायदा इतनी सारी होने का? जिंदगी तो वही डेढ- दो सौ की नाइटी पहन कर बीत रही। मैं भी तरस जाता हूं घर में तुमको साड़ी में देखने को ।"

    "तो क्या 5000 की तसर सिल्क की साड़ी घर में पहन कर रोटी बनाऊं, मसाला भूने, सब्जी बनाएं?"

जोर से बोलती वो।

 अरे तो साड़ी थोड़ी सस्ती भी ले लिया करो कभी-कभी तो हम भी पुराने दिनों की याद ताजा करें"-कर्ण जी कहते।

               साड़ी की चयन प्रक्रिया में बाधा तब आई जब बेटा फोन किया ज्यादा कपड़े लेकर नहीं आने के लिए। दो-तीन साड़ी रखो बाकी सलवार सूट पहनना ठीक रहेगा घूमने में । यहां आओ तो जींस टीशर्ट ले लेंगे। अब तो 50 निकली साड़ियां मिसेज कर्ण वापस रख दी मायूस होकर । दो-तीन में भी बेस्टम बेस्ट चुन कर रखी वो। दुखी थीं पहली बार जींस टॉप पहनने की बात उनको थोड़ी कमसिन उम्र वाले सपने को सच होने जैसा लग रहा था। भले ही आलोचना करती थी, वह पर जब अपने पहनने की बात आई तो बड़ा भद्र जैसा परिधान लगा।

                     जैसे तैसे सामान के निकालने -रखने की नौटंकी पूरी हुई और जाने का दिन आ गया। कर्ण जी तो दो-तीन घंटे में अपना सारा सामान रख लिए थे, पर सौ मुसीबत तो औरतों को ही होती है ना। बिंदी, चूड़ी, इयरिंग, चेन, चप्पल -सैंडल एक से तो काम चलेगा नहीं। तो कुछ जोड़े में ,कुछ पौना ,कुछ हाफ दर्जन कुछ दर्जनभर मैच कर रखना पड़ा। थक गई थीं वह बुरी तरह पर लग रहा था अब तो जैसे ही जहाज में बैठे आराम ही आराम। घर बंद करने के पहले हर कमरे का तीन तीन बार ताला चेक कीं मिसेज कर्ण। बाहर का दरवाजा बंद करते समय कर्ण जी बोले भी -"इतनी क्यों परेशान हो रही हो? गार्ड है ना, अपार्टमेंट में यह सुविधा है कि घर छोड़कर निश्चिंत होकर रहो।" मगर जिसके पास इतनी साड़ियां और गहने हो, उसका दिल हमेशा अशुभ हीं सोचता हैं। 

     लिफ्ट से कर्ण जी गए यह कहते हुए कि हम नीचे जा रहे हैं। वहां सामान रखवा रहे टैक्सी में , फिर तुम आ जाना। नीचे गए जब दस मिनट हो गए और मिसेज उतरी नहीं तो परेशान हो गए वो। अब यहां सारा सामान रखवा दिए। एयरपोर्ट भी जल्दी पहुंचना होता है और कौन सा वे शहर के दिल में बसते हैं ,एक छोर पर तो अपार्टमेंट है। कहते हैं यहां पहले गेहूं की फसल लहलहाती थी। वे फोन किए तो फोन उनके पास से हीं रिंग कर रहा था। वो उनका हैंड बैग अपने साथ ले आये थे।गुस्से में वो सोचे- कहीं फिर ताला खोल साड़ी तो नहीं दूसरी बदल कर रख रही वो?

        और वक्त होता तो हंस लेते वो पर अभी तो परेशान हो रहे थे।जैसे ही लिफ्ट की ओर वे बढ़े, देखे बिजली बंद है। वॉचमैन को फोन कर, जनरेटर चलवाने में भी दस मिनट निकल गया । उस के बाद लिफ्ट से ऊपर गए तो दरवाजे पर ताला लगा था। अब उनको समझ में आया कि शायद बिजली चली गई थी और उनका मोबाइल हैंड बैग में था जिसे लेकर वह नीचे चले गए थे। इस वजह से वह उनको या गार्ड को फोन नहीं कर पाई होंगी और सीढ़ी से उतर रही होंगी। कर्ण जी को अब बुरा लगा, साथ ही उतरते तो क्या होता । बेचारी को घुटने में दर्द भी तो है और पैकिंग की वजह से थकान भी। वापस नीचे आए तो वहां भी उन्हें ना पाकर घबरा गए। वापस पहले फ्लोर पर गए , वहां नहीं थी तो फिर दूसरे पर रुके। वहां उन्हें उनकी साड़ी की हल्की झलक मिली। लिफ्ट से बाहर आकर देखे तो सीढ़ियों के बीच गिरी पड़ी थी वो। दुर्भाग्य से सारे फ्लैट में ताले झूल रहे थे। डेढ बजे कुछ तो ऑफिस में ही उलझे थे और दो अपने बच्चों को स्कूल से लाने बस स्टैंड गई थी। "सुनती हो, सुनती हो, ना गुड्डू की मम्मी"- कहकर हमेशा पुकारने वाले कर्ण जी "अनु ,अनु,उठो ना" कह कर उनके सिर को हिलाये जा रहे थे पर वह हिलती कैसे, रहती तब ना। हल्के गुलाबी रंग की पटोला साड़ी और उसके साथ वह, दोनों जमीन में धूल धूसरित धोकर पड़ी थी। कर्ण जी को याद आ रहा था कि 3 दिन से वह थकान और गैस से कलेजे में भारीपन की बात कर रही थी। डॉक्टर के यहां जाने के बदले साड़ियों को सहेजने और घर को ठीक-ठाक करके जाने की सोच भारी पड़ गई थी। और यह सीढ़ियों से नीचे उतरना उनको और भी भारी पड़ गया था। साड़ी का पल्लू सीढ़ी के कंगूरे दार रेलिंग में फंसा पड़ा था। ऊपर से थोड़ी हाई हील की सैंडल साड़ी में उलझ गई होगी कर्ण जी तो वहीं बैठ गए, गोद में उनका खून से सना सिर लिए हुए। कब गार्ड आया , कब फ्लोर वाले,कब कौन ऊपर ले गया उन दोनों को, किसने घर के सारे ताले खोले, कौन अंदर लाया,डाक्टर बुलाया- कर्ण जी को होश नहीं था बिल्कुल। बाद में मुंबई वाला बेटा आया, अमेरिका वाला नहीं आ पाया सब हो जाने के बाद वो फोन पर बोला-"आप मेरे पास आ जाइए ।अकेले नहीं रहना है आपको वहां"।   

 कहकर फिर से टिकट भेज दिया था एक महीना बाद का। श्राद्ध कर्म हो जाने के बाद देसी बेटा मुंबई चला गया, करण जी रुक गए। अब घर उन्हें ही सहेज के जाना था। जब साड़ी वाली अलमारी खोले तो बहुत देर तक छूने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। लगता था अनु ही साड़ी में खड़ी हो सामने। लाल वाली साड़ी देखकर याद आया उनको ।खरीद कर बस आधा घंटा पहन कर रख दी थी कि थोड़ा ज्यादा ही लहकता सा लाल है। कर्ण जी बोले- " काम वाली की बेटी की शादी है, दो चार अच्छी साड़ी के साथ इसे भी दे दीजिए। गरीब की कुछ सहायता हो जाएगी" यह सुनते ही साड़ी से भी ज्यादा लाल होते हुए बोली थीं-"खबरदार मेरे जीते जी, कोई मेरी साड़ी को हाथ भी लगाएगा ।हम अपने में से एक भी साड़ी नहीं देंगे "

आंखें भर आई उनकी।कैसा मोह किए बैठी थी पर सब छोड़कर एक झटके में चल दी खाली हाथ। अचानक से कुछ साड़ियों को उतारकर अटैची में बंद कर कामवाली के मोहल्ले में गाड़ी लेकर गए। वहां आवाज देकर बुलाए जो उनके घर काम करती थी। आने पर कर्ण जी भर्राई सी आवाज में बोले -"यह साड़ियां है मेम साहब की, ले लो और भी हैं घर में ।सो जो भी लेना चाहे साथ में लेकर आना घर और ले जाना। अभी बात खत्म हीं किए थे कि हाथ जोड़कर फूलमती बोली- "साहब हम लोग गरीब है, तो पुराना- उतरा -नया ,जो भी देते हैं हम खुशी से ले लेते हैं पर मरे आदमी का कपड़ा ! नहीं साहब ,अशुभ होता है ज़िन्दगी ही नहीं रहेगी तो साड़ी का क्या करेंगे। हमारे यहां कहता है लोग कि मरे का भूत लग जाता है उसका कपड़ा पहनो तो।"

कर्ण जी को तो जैसे काठ मार गया। अलमारी के सामने खड़े हुए थे तो क्या सचमुच साड़ी पकड़े खड़ी थी? वहम नहीं था? मरने के बाद भी साड़ी उसी की रहेगी क्या ?

अगले दिन सारी साड़ियों का गट्ठर बना, कार में भरकर श्मशान चल दिए कर्ण साहब,तेरा तुझको अर्पण गुनगुनाते हुए।..... अमेरिका जाने से पहले एक और जरूरी काम करना था। ज्योतिषाचार्य की खबर लेनी थी अच्छे से। साल भी नहीं हुआ और..............।

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