स्वाद
लघुकथा
"ताऊजी...आप तो बैठ जाओ आराम से आपकी प्लेट मैं लगाकर लाती हूँ।"
एक विवाह समारोह के भोज में परेशान होते देख नेहा उनकी प्लेट लगाकर ले आई।ताईजी के गुजर जाने के साल भर बाद पहली बार किसी सामाजिक समारोह में शामिल हुए ताऊजी उसे कुछ असहज लग रहे थे।
"तुझे पता है ...मुझे क्या खाना है?" ताऊजी हल्के से मुस्कुरा कर बोले।
"अरे! कैसी बात करते हैं...बचपन में एक यही तो काम करती थी मै परोसने का...आप भूल गए क्या...मुझे पता है आपको ठंडी पूरियाँ पसंद है ।"
"नहीं बेटा,अब नहीं... ।"
"तो क्या अब आपकी पसंद बदल गई है...।" वह उन के पास कुर्सी खींच कर बैठ गई।"
“ तुम्हे तो पता है बेटा...परिवार में पंद्रह सोलह सदस्य थे...पूरियाँ होली,दीवाली पर ही बनती थी तब तुम्हारी ताई सबके लिए तो गर्म-गर्म पूरियाँ तलती थी।सबसे बाद में जब मैं और वह खाना खाते तो मैं यही कहता कि मुझे तो ठंडी पसंद है और गर्म उसकी थाली में रख देता...वरना तो वह गर्म कभी खा ही नहीं पाती...।" पत्नी की याद उनकी आँखों में झिलमिला रही थी।
"ओह...तभी से चल पड़ा कि आप को ठंडी पूरी ही पसंद है...इतने साल आप उनके लिए ठंडी खाते रहे...चलिए अब गरम लाती हूँ...इसका स्वाद देखिए।"
बेटा...स्वाद चीज़ों में नहीं ज़िंदगी में होता है...

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