Posts

Showing posts from April, 2024

क्रिकेट

 श्रीलंका का एक खिलाड़ी था, उसके दिमाग में बस एक ही चीज चलती थी…. क्रिकेट.क्रिकेट और बस क्रिकेट… अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर उसे श्री लंका की टेस्ट टीम में डेब्यू करने का मौका मिला…. पहली इन्निंग्स…… जीरो पे आउट दूसरी इन्निंग्स……. जीरो पे आउट . . . टीम से निकाल दिया गया…. . practice…practice….practice…. फर्स्ट क्लास मैचेज में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया और एक 21 महीने बाद फिर से मौका मिला। पहली इन्निंग्स…… जीरो पे आउट दूसरी इन्निंग्स……. 1 रन पे आउट … फिर टीम से बाहर। .. प्रैक्टिस….प्रैक्टिस….प्रैक्टिस…. फर्स्ट क्लास मैचेज में हजारों रन बना डाले और 17 महीने बाद एक बार फिर से मौका मिला…. पहली इन्निंग्स…… जीरो पे आउट दूसरी इन्निंग्स……. जीरो पे आउट . . . फिर टीम से निकाल दिया गया…. . प्रैक्टिस… प्रैक्टिस….प्रैक्टिस….प्रैक्टिस… प्रैक्टिस….प्रैक्टिस… और तीन साल बाद एक बार फिर उस खिलाड़ी को मौका दिया गया…..जिसका नाम था मर्वन अट्टापट्टू इस बार अट्टापट्टू नहीं चूका उसने जम कर खेला और ….श्रीलंका की और से 16 शतक और 6 दोहरे शतक जड़ डाले और श्रीलंका का one of the most successful कप्तान बना! सोचि...

गोलमोल भाषा और गोलमोल भाव ही आज की सफल कविता है।

 संभवतः यह 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है। पटना-स्थित  बिहार समाजवादी दल  के कार्यालय में रामवृक्ष बेनीपुरी  राहुल सांकृत्यायन और युवा कवि कलक्टर सिंह केसरी जो पटना कालेज में दिनकर जी के सहपाठी थे, बैठे हुये थे।  "उस दिन जोश मलीहाबादी की अनेक रचनाओं को रामवृक्ष बेनीपुरीजी ने राहुलजी को सुनाया और तब यह शेर- 'कल तो कहते थे कि बिस्तर से उठा जाता नहीं आज दुनिया से चले जाने की ताकत आ गई!' "बोलो केसरी ! तुम हिंदी के कवि लोग इतनी गहरी बात इस सफाई और सरसता के साथ कह सकोगे ?  राहुलजी, आपका क्या खयाल है? हिंदी में इस तरह की आम- फहम भाषा का प्रयोग क्या संभव नहीं?" राहुलजी ने बड़ी देर तक सोचा और फिर कहना शुरू किया-" भाषा के विषय में मैं आपसे भी आगे हूँ, बेनीपुरीजी! मैं तो चाहूँगा कि क्षेत्रीय बोलियों में ज्यादा-से-ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हों। जनता का साहित्य जनता के बौद्धिक स्तर को छूता हुआ नहीं बढ़ेगा, तो जनता पीछे छूट जाएगी और कवि-लेखक अपने आइवरी टावर में सुखपूर्वक निवास करेंगे।" "अच्छा केसरीजी, आप अपनी कितनी रचनाओं को जला चुके हैं ?" इस प्रश्न से ...

छलनी

Image
 “अगर हर आदमी अपनी ज़मीन के टुकड़े पर वह सब करे जो वह कर सकता है तो सारी पृथ्वी कितनी सुन्दर हो जाए...” ये बात अपनी ज़मीन के एक टुकड़े को दिखाते हुए बीसवीं सदी के सबसे महान कहानीकार अन्तोन चेखव एक दूसरे महान कलमकार मक्सिम गोर्की को कह रहे हैं,  “यदि मेरे पास बहुत सारे पैसे होते तो मैं इस ज़मीन पर बीमार ग्रामीण अध्यापकों के लिए एक सेहतगाह बनवा देता। एक बड़ी सुन्दर, बहुत ही उजली इमारत बनवाता, बड़ी बड़ी खिड़कियों और ऊँची-ऊँची छतों वाली। वहां बहुत बढ़िया पुस्तकालय होता, तरह-तरह के साज़, मधुमक्खियों के छत्ते, सब्जियों की क्यारियां, फलों के बाग़... वहां कृषिविज्ञान और मौसमविज्ञान पर व्याख्यान का प्रबंध किया जा सकता। एक अध्यापक को सब कुछ पता होना चाहिए मेरे भाई, सब कुछ।“ सबसे पहले तो इस सपने को देखिये, क्या खूबसूरत सपना है!!!  काश कि ऐसा सपना देखने वालों के पास उसे पूरा करने के पैसे भी होते।   -------------- “एक अध्यापक को सब कुछ पता होना चाहिए... सब कुछ” ये ‘सब कुछ’ क्या है? क्या ‘सब कुछ’ पता हो भी सकता है? अगर नहीं तो इतना महान लेख़क ऐसी ना हो सकने वाली बात क्यूँ कह रहा है? हमारे...