गोलमोल भाषा और गोलमोल भाव ही आज की सफल कविता है।

 संभवतः यह 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है। पटना-स्थित  बिहार समाजवादी दल  के कार्यालय में रामवृक्ष बेनीपुरी  राहुल सांकृत्यायन और युवा कवि कलक्टर सिंह केसरी जो पटना कालेज में दिनकर जी के सहपाठी थे, बैठे हुये थे।

 "उस दिन जोश मलीहाबादी की अनेक रचनाओं को रामवृक्ष बेनीपुरीजी ने राहुलजी को सुनाया और तब यह शेर-

'कल तो कहते थे कि बिस्तर से उठा जाता नहीं

आज दुनिया से चले जाने की ताकत आ गई!'


"बोलो केसरी ! तुम हिंदी के कवि लोग इतनी गहरी बात इस सफाई और सरसता के साथ कह सकोगे ? 


राहुलजी, आपका क्या खयाल है? हिंदी में इस तरह की आम- फहम भाषा का प्रयोग क्या संभव नहीं?"


राहुलजी ने बड़ी देर तक सोचा और फिर कहना शुरू किया-" भाषा के विषय में मैं आपसे भी आगे हूँ, बेनीपुरीजी! मैं तो चाहूँगा कि क्षेत्रीय बोलियों में ज्यादा-से-ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हों। जनता का साहित्य जनता के बौद्धिक स्तर को छूता हुआ नहीं बढ़ेगा, तो जनता पीछे छूट जाएगी और कवि-लेखक अपने आइवरी टावर में सुखपूर्वक निवास करेंगे।"


"अच्छा केसरीजी, आप अपनी कितनी रचनाओं को जला चुके हैं ?"


इस प्रश्न से मैं हक्का-बक्का-सा हो गया और चुप्पी में ही अपना निस्तार समझा। राहुलजी कहते गए- "मेरा अपना मत है, हरेक लेखक और कवि तब तक सब्र किए रहे, जब तक उसके भाव और भाषा दोनों जनरुचि के अनुकूल न हो जाएँ। प्रारंभिक रचनाओं में कुहासा रहता है, उसके छूट जाने पर ही भाव स्पष्ट और सुबोध होते हैं। किंतु हिंदी में देखता हूँ कि छपास का रोग फैलता जा रहा है। हरेक लेखक और कवि जो भी लिखता है, उसे छपाने की कोशिश करता है। यह एक राष्ट्रीय अपव्यय है। बेनीपुरीजी चाहें, तो कुछ दूर तक इस छपास के रोग का इलाज कर सकते हैं।"


बेनीपुरीजी ने कहा- "राहुलजी, एक दूसरा पहलू भी है। प्रोत्साहन के अभाव में कभी-कभी प्रतिभाएँ कुंठित हो जाती हैं। अतएव उदीयमान लेखक-कवियों को दुलारने का काम भी करना होता है।"


"ठीक है, किंतु स्वस्थ और तेजस्वी साहित्य के लिए जरूरी है मानसिक स्वतंत्रता और बौद्धिक विकास। '


यह देखकर मुझे दुख होता है कि आज हिन्दी के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान भी धड़ल्ले से ऐसे लेखकों को छाप रहे है जिन्होंने  शब्द-सौष्ठव, वाक्य विन्यास या शैली का मौलिकता का अर्थ नही जाना, क्योंकि हिन्दी भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के लिये उन्होने कभी खून-पसीना नहीं बहाया। दिनकरजी कहा करते थे, उनकी कविताए पाठकों की जिह्वा पर बसती हैं, क्योकि उनमें प्रयुक्त एक-एक शब्द उनकी शब्द-साधना के प्रसाद हैं।

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