छलनी

 “अगर हर आदमी अपनी ज़मीन के टुकड़े पर वह सब करे जो वह कर सकता है तो सारी पृथ्वी कितनी सुन्दर हो जाए...”


ये बात अपनी ज़मीन के एक टुकड़े को दिखाते हुए बीसवीं सदी के सबसे महान कहानीकार अन्तोन चेखव एक दूसरे महान कलमकार मक्सिम गोर्की को कह रहे हैं, 


“यदि मेरे पास बहुत सारे पैसे होते तो मैं इस ज़मीन पर बीमार ग्रामीण अध्यापकों के लिए एक सेहतगाह बनवा देता। एक बड़ी सुन्दर, बहुत ही उजली इमारत बनवाता, बड़ी बड़ी खिड़कियों और ऊँची-ऊँची छतों वाली। वहां बहुत बढ़िया पुस्तकालय होता, तरह-तरह के साज़, मधुमक्खियों के छत्ते, सब्जियों की क्यारियां, फलों के बाग़... वहां कृषिविज्ञान और मौसमविज्ञान पर व्याख्यान का प्रबंध किया जा सकता। एक अध्यापक को सब कुछ पता होना चाहिए मेरे भाई, सब कुछ।“


सबसे पहले तो इस सपने को देखिये, क्या खूबसूरत सपना है!!! 


काश कि ऐसा सपना देखने वालों के पास उसे पूरा करने के पैसे भी होते।  


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“एक अध्यापक को सब कुछ पता होना चाहिए... सब कुछ”


ये ‘सब कुछ’ क्या है? क्या ‘सब कुछ’ पता हो भी सकता है? अगर नहीं तो इतना महान लेख़क ऐसी ना हो सकने वाली बात क्यूँ कह रहा है?


हमारे बच्चों का दुर्भाग्य है कि जिस उम्र में उन्हें दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षक मिलने चाहियें, उस उम्र में उन्हें पढ़ाने के लिए घर की चिकचिक से तंग आ चुकी गृहिणियां, सरकारी नौकरी के जुगाड़ में लगे हुए लड़के या अध्यापन की जिंदगी से उकता चुके मास्टर मिलते हैं। 


‘सब कुछ’ जानने की जिजीविषा इनमें से किसी में नहीं होती तो ये बच्चों में क्या जागृत करेंगे। कम से कम आठवीं तक के हर शिक्षक को तो हर विषय की जानकारी होनी ही चाहिए। आप दिनकर पढ़ा रहे हों तो कर्ण की कथा का ज्ञान होना चाहिए, कर्ण पढ़ा रहे हों तो सूर्य सम्बंधित विज्ञान का और सूर्य पढ़ा रहे हों तो फिर गणित भी आनी चाहिए और गणित ही क्या पढ़ाएंगे जब उससे जुड़े इतिहास का ज्ञान ना होगा। 


एक आदर्श अध्यापक तो वो हो जो विज्ञान पढ़ाते हुए कविता सुना सके, और साहित्य पढ़ाते हुए ब्रूनो की कहानी भी बता सके। बच्चे को एहसास ना हो कि कब उसने गणित सीख ली और कब वो कालिदास की दुनिया में पहुँच गया। 


देखिये, हमने भले ही खांचे बना दिए हों लेकिन बच्चा स्वच्छंद रहना चाहता है।      


एक शिक्षक का काम दस-बारह साल के बच्चे के लिए शिक्षा को रुचिकर बनाने का है। उसमें सवाल पैदा करने का है। उसमें सीखने की प्यास पैदा करने का है।   

 

अगर बच्चा सिर्फ़ नंबरों के लिए पढाई करेगा तो सिर्फ़ नौकरी के लिए विषय चुनेगा। सिर्फ़ नौकरी के लिए चुने गए विषय एक सोता हुआ नागरिक तैयार करते हैं।  


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Purushottam Agrawal जी का एक लेक्चर सुन रहा था जहाँ उन्होंने दिनकर का वो प्रसिद्ध वाक्य कहा, “इतिहास को रौशनी उन लोगों से मिलती है जो पुण्य की राह पर चलते हुए हार गए हों। कृष्ण, अशोक, कबीर, अकबर, गांधी और नेहरु – ये पराजित पुण्य के प्रतीक हैं।“


हो सकता है कि ये वाक्य आप कई बार सुन चुके हों लेकिन इसके आगे जो उन्होंने कहा वो मैं आपको बता देता हूँ कि हमें हार-जीत की परवाह किये बिना, उस रास्ते पर चलते रहना चाहिए जो सही है, जो नैतिक है। हार-जीत तो लगी रहती है। ऐसा कई बार देखा गया है कि जो लोग ज़िंदगी में विफल हैं, असफल हैं... वो भी बहुत सार्थक जीवन जी जाते हैं।


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तो फिर ये सार्थकता है क्या? 


ज़ाहिर सी बात है ये सार्थकता, सफलता तो नहीं है। सफलता के मायने तो सबके लिए अलग-अलग होते हैं। अम्बानी के लिए महीने का एक करोड़ रुपया कमाना सफलता नहीं है लेकिन किसी और के लिए तो पूरी जिंदगी में एक करोड़ इकठ्ठे कर लेना जबरदस्त सफलता हो सकती है।


चेखव कहते हैं कि हम इस आस में रहते हैं कि अमीर हो जायेंगे, अच्छा ओहदा पा लेंगे लेकिन अक्लमंद होने की उम्मीद करते मैंने किसी को नहीं देखा।


सार्थकता वैचारिक उन्नति में है। 


चेखव के शब्दों को फिर से दोहराता हूँ, वो साल 1900 के करीब ये बात रुसी जनता के लिए कह रहे हैं आप ये बात आज के भारतीयों पर लागू कर लें।


“रुसी आदमी भी अजीब जीव है। छलनी की भांति उसमें कुछ नहीं टिकता। जवानी में वह उलटी-सीधी सब बातें दिमाग में ठूँसता रहता है और जब तीस पार कर लेता है तो उसमें बस कचरा रह जाता है। एक वास्तुकार दो-तीन अच्छे मकान बना लेने के बाद ताश खेलने में लग जाता है। डॉक्टर की प्रेक्टिस अच्छी चल जाती है तो वो विज्ञान की नयी बातों की ओर ध्यान नहीं देता। मैंने आज तक एक भी सरकारी आदमी नहीं देखा जिसे अपने काम के महत्व की समझ हो। वो राजधानी में बैठकर फाइल पर दस्तखत करता है बिना ये सोचे कि उसके इस फैसले का एक देहाती पर क्या असर पड़ेगा। नाम कमा लेने के बाद वकील को सच्चाई की परवाह नहीं रहती। अभिनेता दो-तीन अच्छी भूमिकाएं करने के बाद नया कुछ नहीं सीखता। सारा रूस कैसे भूखे और आलसी लोगों का देश है जो हद से ज्यादा खाते हैं और सोते हैं। घर बसाने का फ़र्ज़ पूरा करने के लिए शादी करते हैं। उनकी मानसिकता कुत्तों जैसी है – उन्हें पीटा जाता है तो दबी आवाज़ में किंकियाते हैं और पुचकारा जाता है तो पीट के बल लेट कर दुम हिलाते हैं।“ 


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नया सीखने की कोशिश हम नौकरी मिलते ही छोड़ देते हैं। बस उतना ही सीखते हैं जितना नौकरी में बने रहने के लिए काफ़ी है। पूरी जनता ने अपने आपको वैचारिक रूप से उन्नत करना छोड़ दिया है। पूरी जनता सुविधाओं से भरपूर एक खोखला जीवन जी रही है।        


लेकिन ऐसा निरर्थक जीवन जीने का क्या फ़ायदा जो दूसरों की नज़र में हद दर्जे का सफल जीवन हो? या कि हम सब भी अपने चेतन की हत्या कर खोखलेपन को स्वीकार कर चुके हैं? ख़ुशी की एक अंतहीन तलाश में लगे हुए हैं जबकि ख़ुशी असल में एक मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं है जो हाथ में आते ही छिटक कर कुछ दूर चली जाती है।   


सार्थकता तो हर पल अपने आपको, गुज़रे हुए पल से बेहतर बनाने की जद्दोजहद है। रिफाइंड आयल एक बकवास चीज़ है लेकिन रिफाइंड थॉट्स कमाल की बात है। अपने विचारों को महीन, और महीन करते रहने की कोशिश ही सार्थकता है।

 

जाने हम कभी ये


समझ पायेंगे या यूँ ही सोते-सोते जीवन निकालकर मर जायेंगे।

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