भूल
विगत रविवार को गांव गया हुआ था। उफ़!गजब की गर्मी मानो शरीर जल जायेगा। उमस की तो पूछिए मत! पसीने से शरीर सरोबोर जो पूरे शरीर में एक अजब सा चिपचिपाहट पैदा कर रहा था ।खैर, दिन तो किसी तरह गुजर गया। शाम में तपिश थोड़ी कम हुई लेकिन उमस तो जस की तस। बथान के आगे खाट बिछ गई। अचानक सामने पास में ही स्थित पीपल के वृक्ष पर मेरी नज़र चली गई। यह पीपल का पेड़ मेरे जन्म के पहले से है। अभी भी इसकी घनी पत्तियों से लदी डालियां इसके पूर्ण यौवन का अहसास करा रही हैं। सहसा हवा का एक छोटा सा झोंका इन पत्तियों से होता हुआ मेरे शरीर को छू जाता है। ऐसा महसूस हुआ कि यह बूढ़ा पीपल मेरे शरीर को छू कर यह देखना चाहता है कि मुझ में बचपन से अब तक क्या क्या बदलाव आ गए हैं। पीपल के इस आत्मीयता पर मेरे होठों पर अनायास ही मुस्कुराहट फ़ैल गई। सहसा प्रीतम काका की याद आ गई। मैंने ज़ब से होश संभाला काका को इस पीपल की छाँव में अपना पूरा जीवन बिताते देखा है। खेतों में काम कर वे ज़ब लौटते तो स्नान करने के बाद धूपदानी में धूपबती डाल इस पीपल की परिक्रमा करना कभी नहीं भूलते और अंत में बड़े ही श्रद्धा भाव से दोनों हाथ जोड़ इसे प्र...