"मोरपांखी शाम का इतिहास तेरे नाम लिख दिया है उम्र का मधुमास तेरे नाम"
जिस उम्र में यह फिल्म देखी थी और इस फिल्म का यह दृश्य देखा था, उस उम्र में न मोहब्बत हुई थी और ना ही उसका स्वाद चखा था.
पर इस दृश्य को देखकर हृदय के किसी कोने में, उसके चटकने की आवाज़ तो आई थी. यह जरूर समझ में आ गया था कि इस नायक के साथ जो भी हो रहा है वह ठीक नहीं हो रहा है और वो ये डिजर्व नहीं करता है.
कुछ फिल्में बेहद प्रिय होती है पर उसका अंत देखा नहीं जाता है और यह फिल्म इसी श्रेणी में आती है. फिल्म ने भले औपचारिक रूप से अंत में the end लिख दिया हो पर यह कहानी खत्म नहीं हुई थी. होश संभालने के बाद जब फिल्म फिर से देखी तो ऐसा लगा जैसे काश मेरे हाथों में इस फिल्म के क्लाइमेक्स को लिखने के लिए कलम थमा दी जाती तो सोमू को यूं लाचार और बेबस मैं उस स्टेशन पर कभी ना छोड़ता.
मैं इस बात को पूरी तरीके से मानता हूं कि इस फिल्म का क्लाइमेक्स ही इसकी जान थी पंरतु मैं इस कहानी को कोई और मोड ही देता.
इस फिल्म को देखकर लगता है कि कुछ फिल्में कितनी भी प्रिय हो जाएं पर उनसे दूरी ही भली होती है क्यूंकि ऐसा अंत देखने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती है.

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