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Showing posts from December, 2024

मीनाक्षी

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 मेरे एक मित्र हैं, पहले केवल परिचित थे.. धीरे-धीरे मित्रता हुई.. अब उन्हें मित्र इसलिए भी कह पाती हूँ क्यों कि हज़ारों असहमतियों के बाद भी उन्होंने मेरे साथ बने रहना चुना है.. मैं तो खैर पहले भी ऐसी ही थी.. सहमत होने पर साथ देती हूँ, असहमत होती हूँ तो कह देती हूँ.. मुझमें उनकी असहमतियों को सुनने का धैर्य भी है.. अपने मित्रों को किसी स्केल पर नहीं नापती.. पर कभी यह उम्मीद नहीं करती कि वे भी मेरे जैसे ही हो जाएं.. सबकी अपनी पर्सनैलिटी और निजी चयन हैं.. शायद इसलिए हमारे बीच चीज़ें लंबे समय तक बनी भी रहती हैं..  डेढ़ वर्ष पहले की बात है, मेरा स्थानांतरण जिस स्कूल में हुए वहाँ स्टाफ बड़ा था.. शुरुआत में मुझे एडजस्ट होने में कुछेक महीने लगे.. स्कूल के बिल्कुल सड़क के किनारे होने के कारण यहाँ की धूल-धक्कड़ से मैं परेशान रह रही थी.. मुझे लगातार फ्लू की शिकायत रहने लगी.. कई बार दिक्कत ज्यादा बढ़ जाने पर मुझे दो-चार दिन की छुट्टियाँ भी करनी पड़ती.. मैं जब छुट्टी से वापस आई तो मेरे इन मित्र ने मुझे कहा "क्या बात है? क्यों नहीं आ रहे थे, मरने वाले थे क्या?" अब यह एक बीमारी से उठ कर आए व...

Violin

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 Washington DC एक मेट्रो स्टेशन पर........2007 में जनवरी की एक ठंडी सुबह ......... एक व्यक्ति ने Violin पे लगभग 45 मिनट तक Bach की 6 रचनाएं बजाईं।  उस दौरान, लगभग 2000 लोग उस स्टेशन से गुज़रे, जिनमें से अधिकांश काम पर जा रहे थे। लगभग चार मिनट के बाद, एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने देखा कि वहाँ एक संगीतकार Violin बजा रहा है । उसने अपनी गति धीमी कर दी और कुछ सेकंड के लिए रुक गया, और फिर वह अपने काम को पूरा करने के लिए जल्दी से आगे बढ़ गया। लगभग चार मिनट बाद, वायलिन वादक को अपना पहला डॉलर प्राप्त हुआ। एक महिला ने टोपी में पैसे फेंके और बिना रुके चलती रही। छह मिनट बाद एक युवक वो संगीत सुनने के लिए रुका, दीवार के सहारे झुक के कुछ देर सुना , फिर अपनी घड़ी की ओर देखा और फिर चला गया । दस मिनट पर, एक तीन साल का लड़का रुका, लेकिन उसकी माँ ने उसे जल्दी से खींच लिया। बच्चा फिर से वायलिन वादक को देखने के लिए रुका, लेकिन माँ ने जोर से धक्का दिया और बच्चा पूरे समय अपना सिर घुमाता हुआ चलता रहा।  यह क्रिया कई अन्य बच्चों द्वारा दोहराई गई, लेकिन प्रत्येक माता-पिता ने - बिना किसी अपवाद के - ...

भिखारी

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 अमेरिका में एक बहुत बड़ा अरबपति था, रथचाइल्ड। एक दिन एक भिखारी भीतर घुस गया उसके मकान में और जोर-शोर से शोरगुल करने लगा कि मुझे कुछ मिलना ही चाहिए। बिना लिए मैं जाऊंगा नहीं। जितना दरबानों ने अलग करने की कोशिश की, उतनी उछलकूद मचा दी। आवाज उसकी इतनी थी कि रथचाइल्ड के कमरे तक पहुंच गई। वह निकलकर बाहर आया। उसने उसे पांच डालर भेंट किए और कहा कि सुन, अगर तूने शोरगुल न मचाया होता, तो मैं तुझे बीस डालर देने वाला था। मालूम है उस भिखमंगे ने क्या कहा?  उसने कहा, महानुभाव, अपनी सलाह अपने पास रखिए। आप बैंकर हो, मैं आपको बैंकिंग की सलाह नहीं देता। मैं जन्मजात भिखारी हूं, कृपा करके भिक्षा के संबंध में मुझे कोई सलाह मत दीजिए। रथचाइल्ड ने अपनी आत्मकथा में लिखवाया है कि उस दिन मैंने पहली दफा देखा कि भिखारी का भी अपना चेहरा है। वह कहता है, जन्मजात भिखारी हूं! मैं कोई छोटा साधारण भिखारी नहीं हूं ऐसा ऐरा-गैरा, कि अभी-अभी सीख गया हूं। जन्मजात हूं। और तुम बड़े बैंकर हो, मैं तुम्हें सलाह नहीं देता बैंकिंग के बाबत। कृपा करके तुम भी मुझे भीख मांगने के बाबत सलाह मत दो। मैं अपनी कला अच्छी तरह जानता हूं। ...

अमृता_इमरोज

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 #अमृता_के_इमरोज 97 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गये, अमृता जी की मृत्यु के लगभग 18 साल बाद। इमरोज के नाम के आगे लिखी तमाम उपमाएं उनके किरदार के आगे छोटी पड़ जाती हैं। इमरोज एक निःस्वार्थ प्रेमी थे वह जानते थे कि जिस लड़की पर वह दुनिया लुटा रहे हैं उसकी जिंदगी में कोई और (साहिर) है । फिर भी इमरोज जिंदगी भर एक ऐसे प्रेमी बने रहे जो इस बात से वाकिफ थे कि उनकी प्रेमिका तो किसी और से प्रेम करती है कितना मुश्किल होता होगा यह जानते हुये भी किसी को प्रेम करते रहना शायद इसी का नाम इश्क़ है। ऐसा ही इश्क़ इमरोज ने अमृता से किया था। एक इंटरव्यू में इमरोज बताते हैं कि अमृता की उंगलियां हमेशा कुछ न कुछ लिखा ही करती हैं फिर चाहे उनके हाथों में कलम हो या न हो, बहुत बार मैं स्कूटर चलता और अमृता पीछे बैठ कर मेरी पीठ पर कुछ लिखा करती हैं जो मुझे पता होता हैं कि साहिर का नाम लिखती, लेकिन क्या फर्क पड़ता है अमृता साहिर को चाहती हैं और मैं अमृता को। 2005 में अमृता ने जब इमरोज की बाहों में दम तोडा़ तो इमरोज ने लिखा- हम जीते हैं, ताकि हमें प्यार करना आ जाये, हम प्यार करते हैं ताकि हमें जीना आ...

इकलौती पुत्री

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 चार सौ बीघा जमीन के मालिक ने अपनी इकलौती पुत्री का विवाह बड़े शानो शौकत से किया... बहुत कुछ देकर ससुराल भेज दिया... साल बीतते ही पुत्री को समझ आ गया की पति गाँव में ही किसी लड़की के साथ अनैतिक संबंध में है... बस पुत्री ने ठान लिया जहाँ मान नहीँ प्रेम नहीँ वहां नहीँ रहना... पिता का घर बड़ा है  ढेरों पशु ढेरों नौकर चाकर  चार सौ बीघे के मालिक  उस घर की राजकुमारी है वो... शान से जीवन बिता लेगी  और वह सदा के लिये छोड़ आई ऐसी ससुराल जहाँ वह केवल नाम को पत्नी थी... पर ये क्या मायके में तो सभी के सुर ही बदल गए... भाभी सीधे मुँह बात न करती... माँ अलग रूठी रहती... कहती... स्त्री का जन्म ही समझौते के लिये होता है  तुझे समझौता करके मेल जोल बनाकर रहना चाहिए... एक दिन भाई उसे शहर ले गए... और कुछ कागजों पर हस्ताक्षर ले लिए...  कुछ समय बाद उसे पता चला कि वह जमीन पर से हक छोड़ने के हस्ताक्षर थे... पिता ने समझाया  अभी भी समय है वापिस लौट जा घर अपने सम्मान से  अन्यथा समाज तुझे  ताने दे देकर मार डालेगा... बेटी ने कहा... पिताजी... मुझे समाज ने नहीँ पैदा किया ह...