इकलौती पुत्री

 चार सौ बीघा जमीन के मालिक ने अपनी इकलौती पुत्री


का विवाह बड़े शानो शौकत से किया...

बहुत कुछ देकर ससुराल भेज दिया...

साल बीतते ही पुत्री को समझ आ गया की पति गाँव में ही किसी लड़की के साथ अनैतिक संबंध में है...

बस पुत्री ने ठान लिया जहाँ मान नहीँ प्रेम नहीँ वहां नहीँ रहना...

पिता का घर बड़ा है 

ढेरों पशु ढेरों नौकर चाकर 

चार सौ बीघे के मालिक 

उस घर की राजकुमारी है वो...

शान से जीवन बिता लेगी 

और वह सदा के लिये छोड़ आई ऐसी ससुराल जहाँ वह केवल नाम को पत्नी थी...

पर ये क्या मायके में तो सभी के सुर ही बदल गए...

भाभी सीधे मुँह बात न करती...

माँ अलग रूठी रहती...

कहती... स्त्री का जन्म ही समझौते के लिये होता है 

तुझे समझौता करके मेल जोल बनाकर रहना चाहिए...

एक दिन भाई उसे शहर ले गए...

और कुछ कागजों पर हस्ताक्षर ले लिए...

 कुछ समय बाद उसे पता चला कि वह जमीन पर से हक छोड़ने के हस्ताक्षर थे...

पिता ने समझाया 

अभी भी समय है वापिस लौट जा घर अपने सम्मान से 

अन्यथा समाज तुझे 

ताने दे देकर मार डालेगा...

बेटी ने कहा...

पिताजी...

मुझे समाज ने नहीँ पैदा किया है...

मैं आपके आँगन में पैदा हुई और पली बढ़ी हूँ...

पर आपको ही ऐसा लगता है की मैं बेवजह आपके यहाँ आकर बैठी हूँ...

तो सुनो... मैं जा रही हूँ 

पर मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना...

और वह उस घर को छोड़कर निकल गयी...

आज भी उस लड़की की यादें हर लड़की के जेहन में घूमती हैं...

और वह ससुराल छोड़ने से पहले हजार बार सोचती है l 



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