Posts

Showing posts from January, 2025

ओशो

Image
 दिन के चौबीस घंटों में तुम्हें एक घंटा मौन रहना जरूरी है, जब भी तुम्हारी सुविधा हो।  तुम्हारा आंतरिक संवाद चलता रहेगा लेकिन तुम उसके भागीदार मत बनो। बिना संलग्न हुए सुनो।  कुंजी यह है कि आंतरिक वार्तालाप को इस भांति सुनो जैसे दो व्यक्तियों को बोलते हुए सुनते हो। तटस्थ रहो।  संलग्न मत होओ, दिमाग का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को क्या बता रहा है इसे सुनो। जो भी आ रहा है उसे आने दो, उसे दबाओ मत; सिर्फ साक्षी रहो।  तुमने वर्षों से जो भी कूड़ा इकट्ठा किया है वह निकलेगा। दिमाग को कभी इस कचरे को बाहर फेंकने की इजाजत नहीं दी गई है।        एक बार मौका मिलने पर मन ऐसे दौड़ेगा जैसे लगाम छूटने पर घोड़ा भागता है।उसे भागने दो।        तुम सिर्फ बैठो और अवलोकन करो। इस तरह सिर्फ देखना धीरज की कला है।         तुम उस घोड़े पर सवार होना चाहोगे, उसे दिशा देना चाहोगे इधर या उधर क्योंकि यह तुम्हारी पुरानी आदत है। इस आदत को तोड़ने के लिए तुम्हें धीरज की जरूरत है।        मन जहां भी जाए उसे सिर्फ देखना। इसमें कोई...

ओशो

Image
 जनक ने धर्म सभा बुलाई थी। उसमें बड़े बड़े पंडित आए। उसमें अष्टावक्र के पिता भी गए। अष्टावक्र आठ जगह से टेढ़ा था, इसलिए तो नाम पड़ा अष्टावक्र। दोपहर हो गई। अष्टावक्र की मां ने कहा कि तेरे पिता लौटे नहीं, भूख लगती होगी, तू जाकर उनको बुला ला। अष्टावक्र गया। धर्म सभा चल रही थी, विवाद चल रहा था। अष्टावक्र अंदर गया। उसको आठ जगह से टेढ़ा देख कर सारे पंडितजन हंसने लगे। वह तो कार्टून मालूम हो रहा था। इतनी जगह से तिरछा आदमी देखा नहीं था। एक टांग इधर जा रही है, दूसरी टांग उधर जा रही है, एक हाथ इधर जा रहा है, दूसरा हाथ उधर जा रहा है, एक आंख इधर देख रही है, दूसरी आंख उधर देख रही है। उसको जिसने देखा वही हंसने लगा कि यह तो एक चमत्कार है! सब को हंसते देख कर.. .यहां तक कि जनक को भी हंसी आ गई। मगर एकदम से धक्का लगा, क्योंकि अष्टावक्र बीच दरबार में खड़ा होकर इतने जोर से खिलखिलाया कि जितने लोग हंस रहे थे सब एक सकते में आ गए और चुप हो गए। जनक ने पूछा कि मेरे भाई, और सब क्यों हंस रहे थे, वह तो मुझे मालूम है, क्योंकि मैं खुद भी हंसा था, मगर तुम क्यों हंसे? उसने कहा मैं इसलिए हंसा कि ये चमार बैठ कर यहां क्या क...

ओशाे

Image
 जो जन्म पर ही अटककर रह गया है, वह जीवन से, जानने से वंचित ही रहा। बहुत कम लोग हैं, जो जन्म के बाद बढ़ते हैं। जन्म के बाद बढ़ना चाहिए। जन्म तो सिर्फ शुरुआत है, अंत नहीं है। जन्म तो यात्रा का पहला कदम है, मंजिल नहीं है। जन्म तो सिर्फ अवसर है जीने का, जीवन को जानने का। इस अवसर को लेकर ही मत बैठ जाना। जन्म तो कोरी किताब है। लिखोगे कब इस पर? तुम्हारा गीत कब फैलेगा इस पर? तुम्हारे चित्र कब बनेंगे इस पर? जन्म तो ऐसे है, जैसे अनगढ़ पत्थर। छेनी कब उठाओगे? इस पत्थर को मूर्ति कब बनाओगे? इस पत्थर में प्राण कब डालोगे? अधिक लोग अनगढ़ पत्थर की तरह पैदा होते, अनगढ़ पत्थर की तरह मर जाते। उनकी मूर्ति निखर ही नहीं पाती। उनके भीतर जो छिपा था, छिपा ही रह जाता है। जो गीत गाया जाना था, बिन गाया चला जाता। जो नृत्य होना था, नहीं हो पाता। जो अपना गीत गा लेता है, वही बुद्ध है। जो अपना नाच नाच लेता है, वही बुद्ध है। जो अपनी भीतर छिपी हुई संभावनाओं को अभिव्यक्त कर देता है, अभिव्यंजित कर देता है, गुनगुना लेता है, वही बुद्ध है। और वही कृतकार्य है। वही फल को, फूल को उपलब्ध हुआ। अधिक लोग बीज की तरह मर जाते हैं। कुछ थो...

ओशो. मैं मृत्‍यु सिखाता हू

Image
 रामकृष्ण के जीवन में एक अदभुत घटना है। रामकृष्ण को जो लोग बहुत निकट से जानते थे, उन सबको यह बात जानकर अत्यंत कठिनाई होती थी कि रामकृष्ण जैसा परमहंस, रामकृष्ण जैसा समाधिस्थ व्यक्ति भोजन के संबंध में बहुत लोलुप था। रामकृष्ण भोजन के लिए बहुत आतुर होते थे और भोजन के लिए इतनी प्रतीक्षा करते थे कि कई बार उठकर चौके में पहुंच जाते और पूछते शारदा को, बहुत देर हो गई, क्या बन रहा है आज? ब्रह्म की चर्चा चलती और बीच में ब्रह्म चर्चा छोड्कर पहुंच जाते किचन में और पूछने लगते, क्या बना है आज?  और खोजने लगते। शारदा ने भी उन्हें कहा कि  आप क्या करते हैं ऐसा?  लोग क्या सोचते होंगे कि  ब्रह्म की चर्चा छोड्कर एकदम  अन्न की चर्चा पर आप उतर आते हैं! रामकृष्ण हंसते और चुप रह जाते। उनके शिष्यों ने भी उन्हें बहुत बार कहा कि इससे बहुत बदनामी होती है।  लोग कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति क्या ज्ञान  को उपलब्ध हुआ होगा, जिसकी अभी रसना, जिसकी अभी जीभ इतनी लालायित होती है भोजन के लिए! एक दिन शारदा ने — रामकृष्ण की पत्नी ने बहुत कुछ भला  बुरा कहा तो रामकृष्ण ने कहा कि पागल, तुझे प...

सुभाष चंद्र बोस

Image
 मुझे एक युवक की याद आती है। उनका नाम सुभाष चंद्र बोस था। वह एक महान क्रांतिकारी बन गए और उनके प्रति मेरे मन में अगाध श्रद्धा है, क्योंकि वे भारत के एकमात्र व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गांधी का विरोध किया था; वह देख सकते थे कि यह सब महात्मापन राजनीति है और कुछ नहीं। भारतीय खुद को बहुत धार्मिक मानते हैं। यह सिर्फ एक विश्वास है - कोई भी धार्मिक नहीं है। और महात्मा गांधी देश के बहुसंख्यकों के नेता बनने के लिए एक संत की भूमिका निभा रहे थे। वे सभी लोग जो सोचते थे कि वे धार्मिक थे महात्मा गांधी के पक्ष में थे।  बस एक ही आदमी, सुभाष, ने विरोध किया और तुरंत स्वर स्पष्ट था। जो हुआ था वह यह कि: महात्मा गांधी कहते थे, “मैं प्यार और नफरत से परे हूं। मैं क्रोध, हिंसा से परे हूं”, क्योंकि यही उनका पूरा दर्शन था कि हिंसा के परे जा कर ही अहिंसक बना जा सकता है, इतना के आप अपने दुश्मन से भी प्यार कर सके। सुभाष तो महात्मा गांधी के साथ समझौता नहीं करने के लिए जाने जाते थे, हालांकि वह एक ही पार्टी में थे। केवल एक पार्टी थी जो देश की आजादी के लिए लड़ रही थी, इसलिए सभी स्वतंत्रता प्रेमी पार्टी में ...

मेरे प्यारे बच्चों

Image
 दो अक्षर बेशक कम पढ़ना मेरे बच्चों जीवन से बस प्यार ज्यादा करना। कभी रात फुर्सत में बैठ तारे देखना किसी बुजुर्ग से कोई कहानी सुनना चार दोस्त ज्यादा बनाना खूब सारी बातें करना। जुगनू तो नहीं तुम्हारे हिस्से पर हाँ कभी आग जला सरकंडे को गोल-गोल घुमाना फूलों की खुशबू महसूस करना आस-पास पेड़ों से गुजरती हवा के लिए शुक्र मंद होना कभी नदी में पैर डूबो बैठ जाना यूं ही देर तक सूरज को जाता हुआ देखना यह फिर आएगा पर जीवन में मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं मां तो कहती है, मरना कोई मामा के घर जाना नहीं जहाँ आना-जाना लगा रहेगा। कोई जगह सताए  तो जगह बदल लेना पर जीवन मत छोड़ना। कभी जीने का मन ना भी हो  तब भी जी लेना। कुछ गलत हो भी जाए स्वीकार कर लेना, हाँ गलती हो गई इज्जत जीवन से छोटी है जीवन हर हाल में बड़ा है। जब भी घुटन हो, मरने का ख्याल आए मरना जीवन पर हावी होने लगे तो बात कुछ दिन पर टाल देना। सोचना अपने किसी करीबी का जाना उस मां का विलाप याद करना पिता की झुकी गर्दन याद करना अपने ही बच्चे की पोस्टमार्टम होती हड्डियों पर हथोड़ी से होती चोट सुनना छाती फटती है कितना दर्द होता है इन्हीं हाथों...

विसंगतियों का सच.

Image
 आसाराम हो, रामपाल या हाथरस का बाबा, इन की सबसे ज्यादा भक्त स्त्रियां ही होती हैं. इसके पीछे हमारे सामाजिक बन्धनों में जकड़ी स्त्रियों का मनोविज्ञान सबसे ज्यादा काम करता है. घर में नौकरों की तरह काम, दोयम क्या अंतिम दर्जे का स्थान, वजह-बेवजह अपमान और सौ-सौ बंदिशों में घुट रही स्त्री के लिए बाबा की संगति वो स्पेस है जहाँ वे मुक्त और स्वायत अनुभव करती हैं. एक मर्द जिसके साथ मुक्त भाव से हँस-गा लेती हैं, लोक-लाज के डर से बरी उन्मुक्त भाव से नाच लेती हैं. इस भय से भी मुक्त कि कोई उन्हें फ्लर्ट करता है और वे भी खुले-खिले दिल से किसी को चार्म करती हैं, बिना परिजनों के डर के. कि बाबा ही सही एक मर्द है जो उन्हें सुंदर कहता है, अच्छी कहता है, उनकी बात सखा भाव से सुनता है. उन्हें रिजेक्ट करने या झिड़कने की बजाय प्रेम से अपनाता है. उन्हें प्रेम के बन्धन में बंधने की जगह प्रेम में मुक्ति की राह दिखाता है. दुनिया भर के बाबाओं की फेन फॉलोइंग का ये एक कड़वा लेकिन बहुत बड़ा सच है. हमारी सामाजिक जकड़नों से उपजी विसंगतियों का सच.

मेरी खुद की ज़िन्दगी का एक छोटा सा अनुभव

Image
  बेटे भी घर छोड़ के जाते हैं.. अपनी जान से ज़्यादा..प्यारे माँ बाप भाई बहिन को छोड़ कर... अलमारी के ऊपर रखा...बचपन की जिद्द से मंगाया धूल खाता वो सामान छोड़ कर... बचपन से लेकर स्कूल तक के दोस्तों और पड़ोस के अपनेपन को छोड़कर... मेज़ पर बेतरतीब पड़ी...वर्कशीट, किताबें, काॅपियाँ और खुद के विचारो की लिखी हुई डायरी जो छुपाते थे सबसे सब कुछ यूँ ही छोड़ जाते है... बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!! बचपन की उन गलियो को.. अपनों और परायो के दुःख और सुख को भी छोड़ जाते है...  अपनी मन पसन्द ब्रान्डेड...जीन्स और टीशर्ट  अलमारी में कपड़े जूते...और वो सब अपना सामान जिसको... हाथ नहीं लगाने देते थे... वो सबकुछ छोड़ जाते हैं... बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!! जो तकिये के बिना कहीं...भी सोने से कतराते थे... आकर कोई देखे तो वो... कहीं भी अब सो जाते हैं... खाने में सौ नखरे करने वाले..अब भूखे भी रह लेते है या वेवक्त कुछ भी खा लेते हैं... अपने रूम में किसी को...भी नहीं आने देने वाले... अब हॉस्टल के एक रूम में एक अनजान रूममेट के साथ एडजस्ट हो जाते हैं... बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!! घर को याद करते हैं लेकिन...कहते ह...

श्रीहरि

Image
 ‘‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान’’ भगवान के नाम सब एक से बढ़कर एक अनमोल हैं। भगवान का एक नाम कवि भी है। प्राय: कवि की तुलना ब्रह्मा से की जाती है क्योंकि ब्रह्मा जी की तरह कवि भी अप ने कल्पनालोक की सृष्टि को शब्दों का तानाबाना पहनता है। इसलिए वह भी सृजनकार है। बाबा तुलसीदास ने अपनी जो रामचरित मानस लिखी, वह रामकथा के तीन वर्जन हैं, जो एकसाथ चलते हैं। यानी उन्होंने भगवान शिव, महर्षि याज्ञवल्क्य और भक्त शिरोमणि काकभुशुंडि के मानस जगत में रामकथा की जो छवियां हैं, उन्हें शब्दों में उतारा। विष्णु सहस्रनाम में आया है :- सर्वगः सर्वविद् भानु:विष्वकसेनो जनार्दनः ।  वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। संस्कृत के अनुसार कवि शब्द ‘कु’ से बना है जिसका अर्थ देखना है। कवि का अर्थ है जो परे देख सके अर्थात काल के पर्दे से परे जाकर देख सके, वह कवि है।  महर्षि अरविन्द आधुनिक भारत की न केवल एक आध्यात्मिक मनीषी थे, वरन् वह बहुत उच्च कोटि के अंग्रेजी कवि थे। उनकी कविता और उसके बारे में उनके विचारों को अंग्रेजी में ‘मॉर्डनिस्ट’ धारा के अग्रणी रचनाकार टी एस इलियट ने भी उद्धृत...