विसंगतियों का सच.

 आसाराम हो, रामपाल या हाथरस का बाबा, इन की सबसे ज्यादा भक्त स्त्रियां ही होती हैं.

इसके पीछे हमारे सामाजिक बन्धनों में जकड़ी स्त्रियों का मनोविज्ञान सबसे ज्यादा काम करता है.

घर में नौकरों की तरह काम, दोयम क्या अंतिम दर्जे का स्थान, वजह-बेवजह अपमान और सौ-सौ बंदिशों में घुट रही स्त्री के लिए बाबा की संगति वो स्पेस है जहाँ वे मुक्त और स्वायत अनुभव करती हैं. एक मर्द जिसके साथ मुक्त भाव से हँस-गा लेती हैं, लोक-लाज के डर से बरी उन्मुक्त भाव से नाच लेती हैं. इस भय से भी मुक्त कि कोई उन्हें फ्लर्ट करता है और वे भी खुले-खिले दिल से किसी को चार्म करती हैं, बिना परिजनों के डर के.

कि बाबा ही सही एक मर्द है जो उन्हें सुंदर कहता है, अच्छी कहता है, उनकी बात सखा भाव से सुनता है. उन्हें रिजेक्ट करने या झिड़कने की बजाय प्रेम से अपनाता है. उन्हें प्रेम के बन्धन में बंधने की जगह प्रेम में मुक्ति की राह दिखाता है.

दुनिया भर के बाबाओं की फेन फॉलोइंग का ये एक कड़वा लेकिन बहुत बड़ा सच है. हमारी सामाजिक जकड़नों से उपजी विसंगतियों का सच.




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