तीसहजारी खौफ और दिल्ली का सुल्तान !!

 


 

 नाम सुन कर आपको दिल्ली की मशहूर अदालत का ख्याल आता होगा । आयेगा भी !


आज दिल्ली में तीसहजारी कोर्ट नामी जगह है । लेकिन ये नाम पड़ा कैसे ?


तो चलिये चलते हैं आज से 243 साल पहले की दिल्ली घूमने ।

 

 मुगलिया सल्तनत ने कई सिख गुरूओं को शहीद किया , और फिर लाल किले के दीवान ए आम में बैठ कर सन 1716 में सिखों के बहादुर योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर को 740 सिखों के साथ शहीद करने का फरमान सुनाया गया था । इस बात की खालसा फौज के मन में कसक रहती थी ।


 फिर आया 1781 खालसा फौजों ने जनरल बघेल सिंह , बाबा जस्सा सिंह की अगुवाई में सोनीपत , से बागपत तक के यमुना पार के हिस्से कब्जा कर लिया, अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर हमले के तुरन्त बाद खालसा फौजें दिल्ली की ओर बढ ने लगीं । उनका इरादा दिल्ली सल्तनत पर कब्जा करना नहीं वरन शहीद गुरूओं के शहीदी स्थलों पर गुरूद्वारा न बनाने की बादशाह की नाफरमानी या टालने की नीति पर उसे सबक सिखाना था । 


खालसा सेनाऐं जनरल बघेल सिंह, बाबा जस्सा सिंह अहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढि़या की कप्तानी में अलग अलग दिशाओं से दिल्ली की ओर बढ़ीं , 1781 में इन फौजों ने बागपत मेरठ के इलाके से लेकर शाहदरा पड़पडगंज तक के इलाके को अपने कब्जे में ले लिया ।


 ये बादशाह को चुनौति थी कि वो शर्तें पूरी करे , लेकिन बादशाह शाह आलम अपने दो चार दरबार चारणों के अलावा किसी की सुनता ही नहीं था ।  


उसके दिन कभी पश्मिना शाल छांटते तो कभी लखनवी चिकन की पोशाकों तो कभी जयपुरी उपहारों की रंग बिरंगी पोशाकों , पगडियों को छांटते ही कट रहे थे ।

 बाकी जो समय उसे मिलता उसमें 3 घंटे वो अपनी लम्बी सफेद रेशमी दाढ़ी की मालिश और ख्रुराखबाजी में लग आ देता । 


 दाढ़ी की मालिश में ढाई साल कब गुजर गया पता भी न चला, बादशाह की बेफिक्री और नाफरमानी से सुलगे खालसा 8 अप्रैल 1783 को बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह आहलुवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया की अगुवाई में 40 हजार सैनिक बुराड़ी घाट पार कर दिल्ली में दाखिल हो गये ।

 

 फिर बनाया गया चक्रव्यूह, 5 हजार सिपाही मजनूं के टिल्ले पर तैनात कर दिए गए, 5 हजार सिपाहियों की दूसरी टुकड़ी अजमेरी गेट पर तैनात की गई और बाकी बची 30 हजार की सेना जिसमें अधिकतर घुड़सवार थे, को सब्जी मंडी व कश्मीरी गेट के बीच की सुनसान जगह पर रोक दिया गया ।


9 मार्च 1783 को अजमेरी गेट और मजनू के टिल्ले वाली फौज ने अजमेरी गेट और मीना बाजार को कब्जे में ले लिया । 11 मार्च को लाल किले पर हमला कर उसे भी कब्जे में ले लिया और किले पर गुरू का घ्वज फहरा दिया ।


 बाबा जस्सा सिंह को बादशाह की गद्दी पर बैठने को कहा गया , बाबा ने कहा खालसा में बादशाह की कोई जगह नहीं, बादशाह की बेगम शमरू को बाबा बहन बोल कर अभयदान दे चुके थे, इस विजय के हीरो जनरल बघेल सिंह और जस्सा सिंह रामगढि़या भी शमरू के भाई हो गये । 


शमरू ने तीनों से अपनी जान और सुहाग की भीख मांगी , भाईयों ने देदी और कहा ये जान इसी शर्त पर बक्शी जायेगी कि वो जगहें जहां गुरु के चरण पड़े जहां गुरु तेग बहादुर शहीद हुए वो सारी जगहें सिखों की होंगीं , बादशाह सात स्थानों पर गुरुद्वारा साहिब के निर्माण के आदेश जारी करे, और गुरूद्वारों के निर्माण के लिये टैक्स वसूली से 6 आना प्रति रूपया काम पूरा होने तक देता रहे ।

 

 जब तक काम पूरा होगा छुपी हुई सेना यहीं पर रहेगी । वो शर्तें मनवा कर चले गये कुल जमा 4 हजार सैनिक किले में छोड गये । 


 बादशाह आलम से मजे लेने वाले उसके खास दोस्त, बादशाह के धोरे जब भी आते बादशाह को बताते कि तीसहजारी फौज खड़ी है, उसे डराते और बदले में जमीन के पट्टे अपने नाम करवा लाते । कोई मंडियों का ही पट्टा करवा लाया कोई चांदनी चौक को ही कब्जा बैठा । 


बादशाह के दोस्तों ने सल्तनत लूटने को जिस जगह को तीसहजारी तीसहजारी कह कह कर डर का फ्रेम बनाया था , आप भी उस जगह को अब बिना डरे तीसहजारी ही कहते है। 


लेकिन 242 साल बाद दिल्ली का सुल्तान अब तीसहजारी से नहीं डरता, वो केवल आमने सामने बात करने से डरता है ।

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