सत्य
जिस दिन हम बिना लाग लपेट के सत्य के लिए आग्रहित होना आरंभ कर देंगे, तब उसी दिन से हम ब्रह्मांड के साथ एकाकारिता का अनुभव करने लगेंगे।
कुछ छूटने का डर, कुछ खोने का अवसाद, संबंधों में नाराजगी का भाव, समाज में छद्म सभ्यता का भाव और हमारी आंतरिक कमजोरी ही हमें सत्य से बहुत दूर ले जाती है और असत्य के साथ बहने को विवश कर देती है , जिसके साथ हमने रहना सीख लिया है या यूं कहीं हम इसके आदी हो चुके हैं।
वर्षों तक व्यवस्था की सहते सहते और नियमों का हवाला देते देते हम किस सीमा तक भावना शून्य होकर यंत्र का कलपुर्जा मात्र बन गए हैं , इसे हमारी आत्मा तक ने स्वीकार करना बंद कर दिया है या दूसरे शब्दों में हमारी आत्मा भी मर चुकी है और मरी हुई आत्मा सिर्फ जिंदगी को घसीटती है जीती नहीं है।
सत्य को स्वीकार कर और गलत का सामना करने की क्षमता विकसित करते हुए हम जिंदगी को पल-पल जीना सीख जाते हैं , ठहराव टूट जाता है और हम जीवन और मृत्यु से पार जाकर अपनी सत्ता, अपने अस्तित्व को आनंदित होकर अनुभव करने लगते हैं।
सत्य
के लिए आग्रह कुछ समय के लिए आपको उद्वेलित कर सकता है लेकिन धीरे-धीरे आदी होने पर आपकी सत्ता सत्य के साथ एकाकार होने लगेगी और आप उपयोगी और आनंदित महसूस करोगे । बस आवश्यकता है एक सार्थक कदम उठाने की और छद्म वस्तुओं और संबंधों से पार पाने की ।
सत्य की इस यात्रा में बहुत कुछ सहना भी पड़ेगा और सहन के पश्चात ही स्वयं से साक्षात्कार होना संभव होगा । यह एक आंतरिक यात्रा है इसके लिए बाहरी यात्रा में साहस, सजगता, ठहराव और विराम तीनों ही आवश्यक है।
असत्य स्वयं डरा हुआ है उससे किस बात का डर । वह स्वयं भयभीत है अपनी सत्ता के खो जाने से । जो स्वयं अपने झूठे अस्तित्व के छूटने के भय से छटपटा रहा है उससे किस बात का डर।

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